Saturday, June 21, 2014

फुटबाल के धंधे में बालश्रम

नरेन्द्र देवांगन

Courtesy -www.seppo.net

10 साल की सांवरी, दुर्गंध मारते चमड़े के ढेर के पास बैठी हुई। झुका हुआ सिर, एक चीज पर जमी नीचीं नजरें। छोटे-छोटे हाथ और दर्द करती पतली सूजी उंगलियां। तेजी से चमड़े की फुटबाल की सिलाई करती उंगलियों से पकड़ी दो भारी सुइयां। सांवरी का पूरा दिन और थोड़ी रात अक्सर इसी काम में बीत जाती है। यही उसकी दिनचर्या है। इसमें न तो स्कूल जाने के लिए कोई जगह है, न ही साथियों के साथ खेलने-कूदने के लिए समय। गरीब है। यही कारण है कि 14 साल से कम उम्र में भी मजदूरी का दंश झेल रही है।

संवरी जैसी दूसरी लड़कियों की भी कुछ ऐसी ही कहानी है, जो आस्ट्रेलियन फुटबाल लीग(एएफएल) के लिए फुटबाल बनाती हैं। यूं तो इन लड़कियों की शिक्षा, पोषण आदि के लिए बहुतेरे कानून बने हैं, लेकिन यह कानून गरीबी की मार खाते इन बच्चों के लिए कितने सहायक साबित होते हैं, इसका दर्द किसी से छिपा नहीं है।

आस्ट्रेलियन फुटबाल लीग आस्ट्रेलिया में खेले जाने वाले उच्च स्तरीय प्रोफेशनल टूर्नामेंट है। 1897 से शुरू होने वाले इस टूर्नामेंट का पुराना नाम विक्टोरियन फुटबाल लीग(वीएफएल) है।
स्पोट्र्स बाल इंडस्ट्री का भारत में विशाल व्यवसाय है। एक अनुमान के अनुसार यह व्यापार एक अरब डॉलर प्रतिवर्ष का है। आकलन है कि पिछले वर्ष लगभग एक करोड़ फुटबाल भारत से तैयार करा कर आस्ट्रेलिया भेजी गई थीं। यूं तो यह व्यवसाय भारत के कई शहरों और उनकी गरीब आबादी में फैला हुआ है, लेकिन पंजाब का जालंधर शहर इसकी सबसे अधिक चपेट में है। इसे बनाने वाले कामगारों में भी सर्वाधिक संख्या बच्चों की है।

 आस्ट्रेलियन फुटबाल लीग में जो अंतर्राष्ट्रीय स्पोट्र्स बाल कंपनियां फुटबाल सप्लाई करती हैं, उनमें शैरीन और केंटरबरी का नाम प्रमुख है। यह कंपनियां फुटबाल निर्माण का प्रमुख केंद्र जालंधर में कोई फैक्टरी संचालित नहीं करती, बल्कि यह भारतीय निर्माता कंपनियों से करार करती हैं। यह दिखावा भी बेहतरीन ढंग से करती हैं। यह कंपनियां एक बेहतरीन वातावरण वाला स्टिचिंग सेंटर बनाती भी हैं, जिसमें आरामदायक कुर्सियां और एयर कंडीशनर भी लगे होते हैं। यहां काम करने वाले लोगों को स्वास्थ्य संबंधी सेवाएं और अच्छी आय दी जाती हैं। लेकिन यह तो सिर्फ दिखाने के दांत होते हैं, क्योंकि इन्हीं स्टिचिंग सेंटर की आड़ में यह शहर की दूसरी बस्तियों या कच्ची बस्तियों के गरीब मजदूरों से काम करवाती हैं।

एएफएल की एक बाल तैयार होने और अंतर्राष्ट्रीय कंपनी का ठप्पा लगने के बाद जहां कई आस्ट्रेलियाई डॉलर में मिलती हैं, वहीं इन मजदूरों को एक बाल तैयार करने की एवज में 5 से लेकर 15 रूपए ही मिलते हैं। 'द सटरडे एज' की रिपोर्ट के अनुसार मधुबाला कहती हैं कि कभी उनका परिवार 30 रूपए कमा पाता है तो कभी 40 रूपए। वह कहती है कि एक बाल को तैयार करने के 10 रूपए भी तब मिलते हैं, जब उन्हें फैक्टरी से सीधा कलेक्ट किया जाता है। अन्यथा फैक्टरी का सब कॉन्ट्रेक्टर जो उन्हें सुबह पैनल की डिलीवरी करने से लेकर और शाम को तैयार बाल ले जाने का कार्य करता है, वह उन्हें केवल 5 रूपए ही देता है। सांवरी एक बाल को सीने के तुरंत बाद बिना रूके दूसरी बाल को सिलने में जुट जाती है।

बाल पर छपे चैनल नाइन के लोगो और लिखे 'सपोर्टिंग लोकल फूटी' को न तो सांवरी समझ सकती है और न ही उसकी मां। दरअसल दोनों ही निरक्षर हैं। ऐसे में 14 साल से कम उम्र की सांवरी जैसी बालिकाओं के लिए भारत सरकार की ओर से सुनिश्चित किया जाने वाला अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कहीं बेमानी सा प्रतीत होता है।

 आस्ट्रेलियाई फुटबाल लीग की फुटबाल बनाने में जालंधर की बस्ती दानिशमंदन के लगभग सभी घर शामिल हैं। लेकिन इसमें सर्वाधिक दुख की बात यह है कि बस्ती के जिन बच्चों को अपना बचपन पढ़ाई करते और खेलते-कूदते बिताना चाहिए, वे बाल मजदूरी कर रहे हैं। उनकी नम-सूखी आंखें और कटी-फटी अंगुलियां उनके दर्द की कहानी आसानी से कह जाती हैं।

 इस व्यवसाय से जुड़ी महिलाओं का कहना है कि जब युवा महिलाओं को ही लगातार फुटबाल सिलने से आंखों की समस्याएं, मोम के बीच काम करने से एलर्जी, लगातार रहने वाला सिरदर्द और पीठदर्द जैसी समस्याएं हो जाती हैं तो इस काम में लगे 14 साल से कम उम्र के बच्चों की स्थिति क्या होती होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। सात साल की शमा कहती है कि बेहद ध्यान केंद्रित करने वाले इस काम की एवज में जो धन मिलता है वह सही नहीं होता है। वह कहती है कि अमूमन एक फुटबाल को सिलने में एक घंटा या उससे अधिक समय लगता है। वह कहती है कि कंपनी को पता है कि हम कैसी मेहनत कर रहे हैं, लेकिन फिर भी वह हमारी मदद नहीं कर रही है। यह तो अनुचित और अन्याय है।

 बाल श्रम अधिनियम में स्पष्ट व्याख्या की गई है कि बच्चे स्कूल घंटों के दौरान या उनके बाद धन/आमदनी/दैनिक मजदूरी के लिए कार्य नहीं कर सकेंगे। ऐसी स्थिति में किसी भी प्रकार की नियोक्ता-कर्मचारी व्यवस्था को अंजाम नहीं दिया जा सकेगा। केंद्र सरकार ने 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम करवाने पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी है। इसके बावजूद यदि कोई व्यक्ति 14 साल से कम उम्र के बच्चे से काम करवाता पाया गया तो उसे अधिकतम तीन साल की सजा और 50 हजार रूपए का जुर्माना हो सकता है। इसके साथ ही खतरनाक उद्योगों में काम करने वालों की न्यूनतम आयु 18 साल कर दी गई है।


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