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Wednesday, November 29, 2017

सरकारी स्कूल में बेटी के साथ खाना खाते कलेक्टर की तस्वीरें एक मिसाल हैं



2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक तड़कता-भड़कता निर्देश आया. यूपी के पूरे सरकारी महकमे में हड़कंप मच गया. निर्देश था ही खतरनाक. कहा गया था कि सभी सरकारी कर्मचारी और अधिकारी अपने बच्चों का एडमिशन सरकारी स्कूलों में करवाएं. आम आदमी के लिए तो ये खबर जैसे राम राज्य का आगमन था. मगर सरकारी अधिकारी जिनके बच्चे एकदम भौकाली अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ रहे थे, वो टेंशन में आ गए. हाईकोर्ट की मंशा ये थी कि अधिकारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे तो वहां के हालात खुद ही सुधर जाएंगे. मगर न कोई अधिकारी ही इस निर्देश पर सामने आया और न ही कोई ऐसा एडमिशन हुआ. ये तो बात हो गई उत्तर प्रदेश की और वहां के अधिकारियों की.


जुलाई में अवनीश ने अपनी बेटी का एडमिशन प्राइमरी स्कूल में करवाया था.

अब बात छत्तीसगढ़ की. जुलाई 2017 की बात है. जगह बलरामपुर. यहां के कलेक्टर अवनीश कुमार शरण ने वो कर दिखाया जो यूपी के अधिकारी निर्देश के बावजूद नहीं कर पाए थे. उन्होंने अपनी बच्ची का एडमिशन बलरामपुर के ही सरकारी स्कूल में करवाया. अवनीश की इस पहल की हर तरफ तारीफ हुई. अब एक बार अवनीश फिर चर्चा में हैं. उनकी एक फोटो वायरल हो रही है. इसमें वो अपनी बेटी के साथ सरकारी स्कूल में बैठकर ही मिड डे मील खा रहे हैं और बच्ची को भी खिला रहे हैं.
अवनीश ने अपनी इस पहल पर कहा था कि ये बात मीडिया के लिए एक खबर हो सकती है, लेकिन मेरे लिए तो सिर्फ एक कर्तव्य है. इस पहल से हो सकता है लोग सरकारी स्कूलों की शिक्षा से जुड़ें. अवनीश ने इससे पहले अपनी बच्ची को एक साल तक आंगनबाड़ी में भी पढ़ने के लिए भेजा था. भरोसा करना मुश्किल होता है, पर अवनीश ने ऐसा ही किया है.

कलेक्टर अवनीश को एक साफ छवि का अधिकारी माना जाता है.

सच कहें तो ये पहल इतनी अच्छी है कि जितनी तारीफ की जाए कम है. सरकारी स्कूलों की खराब हालत के पीछे साफ तौर पर सरकारी अमला ही जिम्मेदार होता है. अगर हर जिले के बड़े अधिकारी मसलन डीएम, एसपी, डीआईओएस वगैरह अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़वाएं तो नीचे बैठे अधिकारियों पर खुद दबाव बनेगा कि वो स्कूलों पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान दें. कोई बड़ा मंत्री या अधिकारी किसी जगह दौरे पर जाता है तो वहां सारी चीजें एकदम टनाटन हो जाती हैं. सड़कें बन जाती हैं. रजिस्टर मेनटेन हो जाते हैं. वगैरह-वगैरह. यही स्कूलों में भी हो सकता है. बशर्ते हर जिले के बड़े अधिकारी और नेता मुहिम छेड़ें. ऐसा करने में मुश्किल लग रही हो तो अवनीश को देख लें.

Wednesday, November 22, 2017

संवरने दें बच्चों को

जावेद अनीस



20 नवम्बर 1989 को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा द्वारा बाल अधिकार समझौतेको पारित किया था. जिसके बाद से हर वर्ष 20 नवम्बर को अंतरराष्ट्रीय बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है. बाल अधिकार संधि ऐसा पहला अंतरराष्ट्रीय समझौता है जो सभी बच्चों के नागरिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकारों को मान्यता देता है. इस समझौते पर विश्व की अधिकतर सरकारों ने हस्ताक्षर करते हुए अपने देश में सभी बच्चों को जाति, धर्म, रंग, लिंग, भाषा, संपति, योग्यता आदि के आधार पर बिना किसी भेदभाव के संरक्षण देने का वचन दिया है. भारत ने भी संयुक्त राष्ट्र संघ बाल अधिकार संधि को 1992 में हस्ताक्षर कर अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की है.

इसमें कोई शक नहीं कि इस संधि ने भारत सहित दुनिया भर के लोगों में बच्चों के प्रति नजरिये और विचारों को बदला है, लेकिन स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है पिछले पचीस वर्षों में मानवता आगे बढ़ी है और इसने कई ऊचाईयां तय किये हैं, परंतु अभी भी हम ऐसी दुनिया नहीं बना पाए हैं जो बच्चों के हित में और उनके लिए सुरक्षित हो.

भारत द्वारा बाल अधिकार समझौते को अंगीकार किये जाने के इस साल 25 साल पूरे हो रहे हैं लेकिन 25 साल बीत जाने के बावजूद आज भी हमारे देश में समाज और सरकारों का बच्चों के प्रति नजरिया उदासीन बना हुआ है. राज्य की तरफ से तो फिर भी बच्चों के पक्ष में सकारात्मक पहल किये गये हैं, लेकिन एक समाज के रूप में हम अभी भी बच्चों और उनके अधिकारों को लेकर गैर-जिम्मेदार और असंवेदनशील बने हुए हैं. पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कुछ क्षेत्रों में अभूतपूर्व तरक्की की हैं, लेकिन बाल अधिकारों को लेकर विभिन्न इंडिकेटर इस उजले तस्वीर में काले दाग की तरह हैं, हमारा मुल्क अभी भी भूण हत्या, बाल व्यापार, यौन दुर्व्यवहार, लिंग अनुपात, बाल विवाह, बाल श्रम, स्वास्थ्य, शिक्षा, कुपोषण, मलेरिया, खसरा और निमोनिया जैसी बीमारियों से मरने वाले बच्चों के हिसाब से दुनिया के कुछ सबसे बदतर देशों में शामिल है, हम एक राष्ट्र और समाज के रूप में अपने बच्चों को हिंसा, भेदभाव, उपेक्षा शोषण और तिरस्कार से निजात दिलाने में विफल साबित हुये हैं.

हालांकि यू.एन.सी.आर.सी. को स्वीकार करने के बाद भारत ने अपने कानूनों में काफी फेरबदल किया है, बच्चों को ध्यान में रखते हुए कई नए कानून, नीतियाँ और योजनायें बनायीं गयी हैं. इसकी वजह से बच्चों से सम्बंधित कई सूचकांकों में पहले के मुकाबले सुधार देखने में आया है, लेकिन इन सब के बावजूद भारत को अभी भी संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकार संधि के तहत किये गये वादों को पूरा करने के लिए लम्बा सफर तय करना बाकी है. इस सफ़र में कई कानूनी, प्रशासनिक एवं वित्तिय बाधाऐं है, जिन्हें दूर करना होगा और सबसे जरूरी एक राष्ट्र के रुप में हमें बच्चों को अधिकार देने के लिए ओर अधिक सकारात्मक दृष्टिकोण एवं माहौल बनाने की जरुरत है.

अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार समझौताबच्चों के चार मूल सिद्धांतों पर आधारित हैं जिसमें जीने का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार, विकास और सहभागिता का अधिकार शामिल है. आमतौर पर पहले तीनों अधिकारों की महत्ता समाज में स्थापित हो गयी है लेकिन अभी यह सोच नहीं बन पायी है कि बच्चों का भी अपना स्वतन्त्र विचार और नजरिया हो सकता है जिसे जगह और सम्मान मिलना चाहिए. बच्चों को लेकर हम बड़ों के बीच यह नजरिया हावी है कि वे खुद से सोचने, समझने, निर्णय लेने और किसी बात पर अपने विचार व्यक्त करने में सक्षम नहीं होते, हम उन्हें देश का भविष्य मानते हैं लेकिन वे वर्तमान भी तो है. माना कि वर्तमान में भले ही वे वोटर ना हों लेकिन वे भविष्य के नागरिक नहीं है. 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 0 से 18 आयु समूह के 472 मिलियन बच्चे हैं जो कि भारत के वर्तमान बाशिंदे हैं और उनको इसे नजरिये से देखने की जरूरत है.
 
राज्य की तरफ से इस दिशा में जरूर प्रयास देखने को मिले हैं जिसमेंराष्ट्रीय बाल नीति 2013” सबसे महत्वपूर्ण है जिसमें जीवन से जुड़े हर क्षेत्र में ऐसा तंत्र विकसित करने की वकालत की गयी है जहाँ बच्चे बिना किसी डर के अपनी बात रख सकें. इसी तरह से राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा इस सम्बन्ध में राज्यों को यह निर्देश जारी किया गया है कि वे बच्चों से संबंधित संस्थानों जैसे स्कूल, होस्टल, होम आदि में ऐसे फोरम की स्थापना सुनिश्चत करें जहाँ बच्चे अपने विचारों को रख सकें. लेकिन अगर भारत जैसे देशों में जब तक बाल सहभागिता को लेकर लोगों की सोच में व्यापक रूप बदलाव नहीं होगा इस तरह के प्रयास महज कागजी कवायद ही साबित होंगें .
दुर्भाग्य से हमारे समाज में बच्चों की सोच के लिये कोई मूल्य है हमें यह समझना होगा कि अगर बच्चों को मौका मिले तो वे खुद को अपनी पूरी स्वाभिकता और सरलता के साथ अभिव्यक्त करते हैं और ऐसा करते हुये वे हम बड़ों की दुनिया को चुनौती देते भी नजर आते है. उनकी मौलाकिता बहुमूल्य है जो हमारी दूनिया को और खूबसरत बना सकती है. हम उनसे सीख सकते हैं कि कैसे अपनी स्वाभिकता को बरकरार रखते हुए मौलिकता को साधा जाता है.

पिछले दिनों सामाजिक संस्था वि‍कास संवाद और साथी संस्‍थाओं द्वारा “बच्‍चों की आवाज” पर आधारि‍त रि‍पोर्ट जारी की गयी है जिससे पता चलता है कि अगर बच्चों को सहज मौका और मंच दिया जाये तो वे हम बड़ों को आईना दिखा सकते हैं. यह रिपोर्ट मध्यप्रदेश के 2300 बच्चों के साथ गतिविधि आधारित सर्वेक्षण पर आधारित है जिसमें 78 प्रतिशत बच्चों ने कहा है कि सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए. क्या यह जवाब सुनकर हमें बच्चों को अपनी तरह बनाने की कोशिश छोड़ कर खुद उनकी तरह बननी की कोशिश नहीं करनी चाहिये.

22 November 2017, Peoples Samachar, Bhopal 



Tuesday, November 21, 2017

प्रारंभिक शिक्षा का संकट


इंडिया टुडे

    दुर्दशा का प्रदर्शन: उत्तर प्रदेश के शिक्षा मित्र दिल्ली में जंतर मंतर पर प्रदर्शन करते हुए
    उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर के बरगदवा ब्लॉक के छपरहा प्राइमरी विद्यालय में सहायक शिक्षक रहे 45 वर्षीय इंद्रजीत यादव को अब कुछ सूझ नहीं रहा है. दरअसल, इस साल जुलाई में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद वे फिर से शिक्षा मित्र के पद पर काम करने को मजबूर हैं. नाराजगी और हताशा उनके चेहरे पर साफ नजर आती है. इंद्रजीत बताते हैं, ''इस फैसले ने मेरे परिवार को भुखमरी के कगार पर पहुंचा दिया है."
    प्रारंभिक शिक्षा में शिक्षकों की कमी, शिक्षा मित्रों की हालतदो साल पहले शिक्षा मित्र से सहायक शिक्षक के पद पर समायोजित होने पर उन्हें करीब 35 हजार रु. मिलने लगे थे लेकिन अब सरकार की ओर से उन्हें महज 10 हजार रु. मासिक वेतन देने का फैसला लिया गया. अब हाल यह है कि उनके बेटे और बेटी को सरकारी स्कूल में बेसिक ट्रेनिंग सर्टिफिकेट (बीटीसी) की पढ़ाई के लिए 42-42 हजार रुपयों की जरूरत थी, पर वे इसका इंतजाम नहीं कर सके. लिहाजा इस साल सितंबर में बच्चों के बीटीसी परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद भी इंद्रजीत सरकारी स्कूल में उन्हें दाखिला नहीं दिला सके.
    शिक्षा मित्रों और शिक्षकों के संकट पर प्रकाश जावडेकरयह किस्सा सिर्फ इंद्रजीत तक सीमित नहीं है बल्कि उत्तर प्रदेश में हजारों शिक्षा मित्र इसी तरह की स्थितियों से दो-चार हैं. 25 जुलाई को जब सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा मित्रों के सहायक शिक्षक के रूप में समायोजन रद्द करने के इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा तो उत्तर प्रदेश के हर जिले में उनका गुस्सा फूट पड़ा और विरोध-प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया. राज्य में कानून-व्यवस्था चरमरा गई. सबसे ज्यादा संकट में तो करीब 10 हजार के वे प्राथमिक स्कूल आ गए थे, जो सहायक अध्यापक बने इन शिक्षा मित्रों के भरोसे ही चल रहे हैं. इनमें ताला लटक गया.  
    इंद्रजीत की तरह ही परेशान गोरखपुर के बेलपार ब्लॉक में मौजूद प्राइमरी स्कूल भिनाखिनी में शिक्षा मित्र 41 वर्षीय बेचन सिंह बताते हैं, ''समायोजन रद्द होने का शिकार बने शिक्षा मित्रों पर चौतरफा मार पड़ी है. अब हमें अध्यापक पात्रता परीक्षा (टीईटी) के बाद अध्यापक चयन परीक्षा भी पास करनी होगी." दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि शिक्षा मित्र दो बार में पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ही अध्यापक पद की नई भर्तियों के लिए आवेदन करके योग्यता के आधार पर चयनित हो सकते हैं.
    इलाज ही बन गया मर्ज
    उत्तर प्रदेश की प्रारंभिक शिक्षा राजनैतिक दांवपेच के भी गवाह रहे हैं. इसी की बानगी हैं शिक्षा मित्र. प्रदेश में बदहाल पड़ी प्रारंभिक शिक्षा की गाड़ी को पटरी पर लाने के लिए 1999 में ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा मित्र तैनात करने की योजना तैयार की गई थी. इन शिक्षा मित्रों का चयन ग्राम शिक्षा समितियों के जरिए किया गया जिसके अध्यक्ष ग्राम प्रधान थे. प्राइमरी स्कूलों में तैनात होने वाले इन शिक्षा मित्रों के संबंध में जारी शासनादेश में साफ लिखा गया कि इसे किसी तरह का सेवायोजन नहीं माना जाएगा. 2010 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद शिक्षकों की तैनाती का मानक तय करने का जिम्मा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) के हाथ में आ गया.
    एनसीटीई ने एक अधिसूचना जारी कर शिक्षकों की तैनाती के लिए टीईटी को पास करना अनिवार्य कर दिया. इससे पहले तक उनमें शिक्षकों की तैनाती का सामान्य मानक स्नातक के साथ बीटीसी प्रशिक्षण था. 2014 में राज्य सरकार ने कानून में संशोधन करके स्नातक की योग्यता रखने वाले शिक्षा मित्रों को प्राइमरी स्कूलों में सहायक शिक्षक के तौर पर नियुक्त करने का रास्ता साफ कर दिया.
    शिक्षा मित्रों की हालत यूपी की लालता देवीकभी 2,250 रु. मासिक मानदेय पाने वाले शिक्षा मित्र सातवां वेतनमान लागू होने के बाद से सहायक शिक्षक के रूप में 35 हजार रु. से अधिक तनख्वाह पाने लगे. माध्यमिक शिक्षक संघ के सचिव डॉ. आर.पी. मिश्र कहते हैं, ''सरकार ने इस संशोधन के जरिए शिक्षकों की तैनाती की न्यूनतम योग्यता टीईटी को भी हटा दिया. जबकि ऐसा करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार की संस्था एनसीटीई को है." इसी तर्क को ध्यान में रखते हुए इलाहाबाद हाइकोर्ट ने 12 सितंबर, 2015 को शिक्षा मित्रों का सहायक अध्यापक पद पर किया गया समायोजन रद्द कर दिया. कुछ ही दिन बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाइकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी.
    फिर इस साल सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा मित्रों को दो बार में पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ही अध्यापक पद नियुक्त करने की बात कही. शिक्षा मित्रों के भारी विरोध-प्रदर्शन के बाद डैमेज कंट्रोल के लिए सरकार ने 5 पांच सितंबर को कैबिनेट बैठक में शिक्षा मित्रों को पहली अगस्त से दस हजार रु. मानदेय देने का फैसला लिया.  
    उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षा मित्र संघ ने इस पूरे प्रकरण पर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है. संघ के अध्यक्ष गाजी इमाम आला का कहना है, ''कोर्ट ने अपने निर्णय में शिक्षा मित्रों को पात्रता परीक्षा में आयु में छूट देने, भारांक देने की बात कही थी लेकिन सरकार ने इस पर कोई फैसला नहीं लिया है. इसके अलावा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद में भी शिक्षकों की पात्रता परीक्षा कराने का नियम तो है लेकिन शिक्षक चयन प्रक्रिया का कोई जिक्र नहीं है. ऐसे में अध्यापक चयन प्रक्रिया शुरू करना नियमों से परे है." हालांकि बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री, स्वतंत्र प्रभारी अनुपमा जायसवाल कहती हैं, ''सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुपालन में शिक्षा मित्रों को हर संभव रियायत दी जा रही है."
    यहां भी तकरार
    शिक्षा मित्रों को लेकर जंग सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है. 2003 में बिहार में भी शिक्षा मित्रों की बहाली के बाद से लगातार उनका विरोध-प्रदर्शन भी होता रहा है. अब एक बार फिर से यहां नियोजित शिक्षक और सरकार टकराव की राह पर हैं. उन्होंने आंदोलन की चेतावनी भी दी है. इन नियोजित शिक्षकों में शिक्षा मित्र भी शामिल हैं. 2005 में शिक्षा मित्रों को नियोजित शिक्षक बना दिया गया था. दरअसल, एक ओर जहां उत्तर प्रदेश में अदालती फैसला शिक्षा मित्रों पर गाज बनकर टूटा, तो बिहार में उम्मीद की किरण बनकर आया है.
    शिक्षा मित्रों की हालत, बिहार के शिक्षा मित्र31 अक्तूबर को पटना हाइकोर्ट ने अपने फैसले में सरकार को इन नियोजित शिक्षकों को ''समान काम के बदले समान वेतन" देने का आदेश दिया है. बिहार परिवर्तनकारी शिक्षक संघ के नवादा जिलाध्यक्ष प्रभाकर कुमार कहते हैं, ''नियोजित शिक्षकों से बच्चों को पढ़ाने के अलावा मिड डे मील, जगगणना, पशुगणना, बाल पंजी संधारण, बीएलओ, जागरूकता कार्यक्रम समेत कई तरह के कामों में मदद ली जाती है, लेकिन उन्हें पुराने शिक्षकों के समान वेतन भुगतान नहीं किया जाता है." दरअसल अन्य पुराने शिक्षकों का वेतन इन नियोजित शिक्षकों से करीब ढाई गुना ज्यादा है.
    लेकिन हाइकोर्ट के फैसले के बाद इन शिक्षकों में जहां उम्मीद जगी है तो दूसरी ओर राज्य सरकार इसे टालने के मूड में है. राज्य के शिक्षा मंत्री कृष्णनंदन प्रसाद वर्मा कहते हैं, ''हम फैसले का गंभीरतापूर्वक अध्ययन करेंगे, फिर राज्य सरकार कदम उठाएगी. जरूरी हुआ तो इस फैसले के खिलाफ हम सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे." सरकार की चिंता है कि फैसले को लागू करने से राज्य पर आर्थिक बोझ बढ़ जाएगा. पर पटना विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर नवल किशोर चौधरी इस दलील को खारिज करते हैं, ''शिक्षकों के वेतन के मसले पर बजट का बहाना नहीं बनाया जा सकता. जरूरत हो तो अन्य मदों में कटौती करके शिक्षा मद में खर्च किया जाना चाहिए."
    प्रारंभिक, प्राथमिक शिक्षा में अब गुणवत्ता पर हो जोर, प्रथम की सीईओ रुक्मिणी बनर्जीनियोजित शिक्षकों के कई संघ राज्य सरकार की इस रणनीति के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं. 12 नवंबर को 23 शिक्षक संघों के नेताओं की बैठक हुई और समान वेतनमान के आंदोलन को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया गया. परिवर्तनकारी प्रारंभिक शिक्षक संघ के बिहार प्रदेश अध्यक्ष वंशीधर ब्रजवासी कहते हैं, ''हमारी मांग 9,300-34,800 रु. वेतनमान की है, जो पुराने शिक्षकों को मिलता है. इसके लिए कानूनी लड़ाई से लेकर सड़क तक आंदोलन किया जाएगा." टकराव की स्थिति यहां तक है कि राज्य सरकार की ओर से उनके पक्ष में तीन माह के भीतर फैसला नहीं लेने पर शिक्षक संघों ने अगले साल के शुरुआती महीनों में होने वाली बोर्ड परीक्षाओं के बहिष्कार की भी चेतावनी दी है.
    उधर, राजस्थान में 6 नवंबर को अजमेर में ''विद्यार्थी मित्र" सफेद टोपियों पर बेरोजगार लिखकर घर-घर घूमे. वे अजमेर उप-चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को वोट न देने की अपील करके अपना विरोध जता रहे थे. दरअसल शिक्षा मित्रों की तरह ही राजस्थान में विद्यार्थी मित्र हैं. पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में भी शिक्षा मित्र ऐसी परिस्थितियों से गुजरते रहे हैं. राज्य में अब टीईटी और सीटीईटी उत्तीर्ण शिक्षा मित्रों को स्थायी नियुक्ति मिलने की हरी झंडी मिलने के बाद बेसिक शिक्षा निदेशालय ने शिक्षा सचिव को प्रस्ताव भेज दिया है.
    फिर भी नहीं गई बदहाली
    इन शिक्षकों के संकट ने प्रारंभिक शिक्षा की बदहाली को भी बेपर्दा कर दिया है. दरअसल बीते वर्षों में शिक्षकों की भारी कमी को पाटने के लिए ही इनकी भर्ती की गई थी मगर एक तो ये खुद सियासी दांवपेच और अदालती हथौड़े के शिकार हो गए, तिस पर शिक्षकों की कमी अब भी बड़ी संख्या में है. देशभर में जहां प्रारंभिक शिक्षा में करीब नौ लाख शिक्षकों के पद रिक्त पड़े हैं. वहीं सबसे ज्यादा बिहार और उत्तर प्रदेश में कमी है (देखें ग्राफिक).
    पिछले साल नवंबर में संसद में एक सवाल के जवाब में मानव संसाधन विकास मंत्रालय में केंद्रीय राज्यमंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने बताया कि मध्य प्रदेश के 4,837 प्राथमिक स्कूल ऐसे हैं जहां कोई भी शिक्षक नहीं है. और ऐसे स्कूलों की संख्या पिछले चार साल में लगातार बढ़ती जा रही है. इसी तरह कुछ राज्यों में प्रशिक्षित शिक्षकों की भी भारी कमी है. यहां तक कि देशभर में डिस्ट्रिक्ट इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन और ट्रेनिंग (डीआईइटी) जैसे शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों में भी करीब 45 प्रतिशत पद रिक्त हैं. इसी तरह बीते वर्षों में स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं में सुधार तो हुआ है लेकिन कुछ राज्यों में स्थिति अब भी अच्छी नहीं है (देखें ग्राफिक).
    शिक्षकों के संकट का मुफ्त शिक्षा है समाधान, अनिल सदगोपालशिक्षा विभाग के एक अनुमान के मुताबिक यूपी में करीब दस हजार के करीब प्राइमरी स्कूलों के पास या तो अपना अपना भवन नहीं है या फिर वे जर्जर हैं. इतना ही नहीं 46 हजार स्कूल ऐसे भी हैं जिनके पास बिजली का कनेक्शन भी नहीं है. राज्य के प्राइमरी स्कूलों में पिछले छह साल के दौरान छात्रों की संक्चया घटती गई. बेसिक शिक्षा विभाग में एक संयुक्त निदेशक बताते हैं, ''बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए सरकार मुक्रत पुस्तकें, यूनिफॉर्म, स्कूल बैग, जूते-मोजे तो बांट रही है लेकिन स्कूल की मूलभूत सुविधाओं पर कोई ध्यान नहीं है. अब अभिभावक अपने बच्चों को जमीन पर बिठाकर नहीं पढ़ाना चाहते." लेकिन बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अनुपमा जायसवाल बताती हैं, ''इस वर्ष बेसिक स्कूलों में पढऩे आने वाले छात्रों की संख्या में कम से कम 25 हजार का इजाफा हुआ है."
    आगे की राह क्या
    शिक्षक और प्राथमिक शिक्षा के संकट के समाधान पर अलग-अलग राय है. अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच के अध्यक्ष मंडल के सदस्य और प्रख्यात शिक्षाविद् डॉ. अनिल सदगोपाल कहते हैं, ''शिक्षा का संकट तब तक रहेगा जब तक गैर-बराबरी की सेवा शर्तों पर नियुक्त करने वाली नीतियां खत्म नहीं की जाएंगी." केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर भी मानते हैं कि डिप्लॉयमेंट की दिक्कतें रही हैं और सरकार ने इसको लेकर राज्यों को निर्देश भी दिए हैं ताकि ऐसी स्थितियां खत्म हो. जाहिर है, ठेके और गैर-बराबरी पर आधारित नियुक्तियों को बंद करते हुए सही नीतियां नहीं बनाई गई और उन्हें सही तरीके से लागू नहीं किया गया, तो यह संकट भी खत्म नहीं होगा. और यह महज शिक्षा मित्रों या नियोजित शिक्षकों का मामला भर नहीं है बल्कि प्रारंभिक शिक्षा ऐसी नींव है, जहां बच्चों को गढ़कर देश के भविष्य तैयार किए जाते हैं.
    —साथ में आशीष मिश्र, अशोक कुमार प्रियदर्शी, अखिलेश पांडे और विजय महर्षि

    इंडिया टुडे से साभार 

    Saturday, September 30, 2017

    दुनिया में सबसे 'घटिया' शिक्षा वाली इन सूचियों में भारत कहीं दूसरे नंबर पर तो कहीं अव्वल है



    विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में भारत उन 12 देशों की लिस्ट में दूसरे नंबर पर है जहां दूसरी कक्षा का कोई छात्र एक छोटे से वाक्य का एक शब्द भी नहीं पढ़ पाता


    विश्व बैंक की एक नई रिपोर्ट भारत में शिक्षा के स्तर पर गंभीर सवाल उठाती है. मंगलवार को जारी हुई संस्था की ‘वर्ल्ड डिवेलपमेंट रिपोर्ट 2018’ में भारत उन 12 देशों की लिस्ट में दूसरे नंबर पर है जहां दूसरी कक्षा का कोई स्टूडेंट एक छोटे से वाक्य का एक शब्द भी नहीं पढ़ पाता. इस श्रेणी में भारत से ऊपर केवल मलावी है. इसके अलावा भारत उन सात देशों की लिस्ट में पहले स्थान पर है जहां दूसरी कक्षा के छात्र दहाई के अंकों का घटा भी नहीं जानते.
    रिपोर्ट में विश्व बैंक ने कहा है, ‘ग्रामीण भारत में तीसरी कक्षा के तीन-चौथाई छात्र दहाई के अंकों का घटा (जैसे 46 में से 17 घटाना) नहीं कर पाते, और कक्षा पांच के आधे स्टूडेंट ऐसा नहीं कर पाते.’ रिपोर्ट के मुताबिक़ 2010 में आंध्र प्रदेश के एक स्कूल में पांचवीं कक्षा के छात्र पहली कक्षा के एक सवाल का सही जवाब नहीं दे पाए. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि स्कूल में सालों बिताने के बाद भी लाखों बच्चों को पढ़ना-लिखना नहीं आता और वे मूल गणित तक नहीं जानते. इसमें लिखा है, ‘सीखने का संकट सामाजिक खाइयों को कम करने के बजाय उन्हें बढ़ा रहा है.’
    रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2016 में ग्रामीण भारत में पांचवीं कक्षा के बच्चे अपनी स्थानीय भाषा की दूसरी कक्षा के पाठों के वाक्य भी बिना रुके नहीं पढ़ सकते. विश्व बैंक का कहना है कि बिना कुछ सीखे स्कूली शिक्षा न सिर्फ़ व्यर्थ है, बल्कि यह दुनियाभर के बच्चों के साथ अन्याय भी है. रिपोर्ट में उसने कहा है कि इन देशों में लाखों छात्र मौक़े तलाशते रहते हैं और बाद में कम आय में जीवन बिताते हैं. ऐसा इसलिए कि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा उन्हें जीवन में सफल होने की शिक्षा देने में असफल हो रही है. रिपोर्ट जारी करने के मौके पर विश्व बैंक के अध्यक्ष जिम योंग किम ने कहा कि इन बच्चों को सही शिक्षा देने में वे समाज असफल हुए हैं जिन्हें अच्छी शिक्षा देने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.
    किम ने कहा कि सीखने का यह संकट ही ‘नैतिक और आर्थिक संकट है.’ उन्होंने कहा, ‘अच्छी तरह से मिली शिक्षा युवाओं को रोज़गार, बेहतर आय, अच्छा स्वास्थ्य और बिना ग़रीबी का जीवन देती है.’ रिपोर्ट में लिखा है कि ग़रीबी, संघर्ष, लिंग या अक्षमता की वजह से पहले वंचित स्टूडेंट सबसे ज़रूरी मूल योग्यताओं के बिना ही युवा हो जाते हैं. बैंक ने इन विकासशील देशों के इस संकट को दूर करने के लिए एक मज़बूत नीति बनाए जाने की सिफ़ारिश की गई है.
    सत्याग्रह से  साभार 

    Thursday, September 21, 2017

    Child Rights at India’s Third Universal Periodic Review at the UN Human Rights Council



    Government of India’s Response

    child rights

    A total of 73 recommendations were made on child rights by different countries on a range of issues. Of these,Government of India (GOI) has accepted 59 and noted 14.


    If one were to compare the status of the recommendations with the UPR II cycle, it is encouraging to see the increase of interest on issues concerning children.  During the second Universal Periodic Review in May 2012 at the UN Human Rights Council, India had received 50 recommendations.



    It is interesting to see this new usage of the term NOTED as in UPR I and UPR II, GOI would either say ACCEPTED or NOT ACCEPTED. What is the significance of NOTED? Does it mean GOI will take action or consider taking action? Or does it mean Noted but no action!



    There does not seem to be a pattern that GOI has followed while deciding whether or not to accept a recommendation on an issue.  The GOI has given different response for the same recommendation floated by different countries on the same issue. For example, Recommendation No 161.14 by Ireland on Ratification of ILO convention 138 and 182 was ‘Noted’ while the same recommendation from Slovania and Uruguay (161.38 and 161.40) was ‘Accepted’. Similarly, while some recommendations by some countries pertaining to honour crimes are ‘Accepted’, the same in the case of other countries are ‘Noted’.



    The government has very clearly decided not to accept the recommendations related to repealing of the proviso that allows children to work in family based occupations in the Child and Adolescent Labour (Prohibition and Regulation) Act 1986.



    GOI has accepted all recommendations received on Education, except the one on inclusion of Human Rights Education in the education policy (recommendation from Zambia) although it has accepted the recommendation to include the same in the curriculum (recommendation from Slovakia).



    While GOI has stated its acceptance to take steps to ‘combat child marriage’ it is not yet ready to Endharmful practices such as child, early and forced marriage.



    Similarly the non –acceptance of the need  address “honour killings”, selective abortion on thebasis of the foetus’ sex, the Sati, Devadasi, early and enforced marriage,foeticide and infanticide is also a matter of concern. Perhaps it is due to the fact that the recommendation includes marital rape and the government has a strong opinion on that already.



    We are sure that the GOI has its own logic and reasons for deciding what it has ACCEPTED and what it has NOTED, but it is not always clear from the reading of it. Perhaps it is do with the combination of recommendations from a country in one statement, rather than the individual elements in them is the reasoning behind why it is either accepted or noted. 




    Following is the detailed table of recommendations and status of acceptance by the GOI. 
    S. NO.COUNTRYRECOMMENDATIONNOTED /ACCEPTED
    UNCRC COMMUNICATION PROCESS
    161.10PORTUGALRatify the Optional Protocol to the Convention on the Rights of the Child on a communications procedures.NOTED
    NATIONALITY/ STATELESSNESS OF CHILDREN
    161.32.KENYAAccede and implement the Article 7 of the Convention on the Rights of the Child to end statelessness and guarantee nationality for affected childrenNOTED
    161.151SLOVAKIAEnsure children’s rights to acquire a nationality in accordance with Article 7 of the Convention on the Rights of the Child, regardless of the parents’ legal status or ethnicityNOTED
    CHILD LABOUR
    161.14IRELANDRatify the International Labour Organization Conventions 138 and 182 on child labour.NOTED
    161.37UNITED KINGDOM OF GREAT BRITAIN & NORTHERN IRELANDDevelop a national strategy to tackle exploitative labour practices and to ratify the 2014 ILO protocol to the Forced Labour Convention and continue to strengthen protections for childrenNOTED
    161.38SLOVENIARatify International Labour Organization Convention 182 on Worst Forms of Child Labour and International Labour Organization Convention 138 on Minimum Age.ACCEPTED
    161.40URUGUAYConsider accessing the 182 ILO Convention on the worst Forms of Child LabourACCEPTED
    161.227SPAINProhibit child work in the family enterprises and extend the list of dangerous activities in line with the recommendations of the Committee on the Rights of the Child.NOTED
    161.228SLOVAKIAConsider repealing the provision that allows children to work in family based occupationsNOTED
    161.229BRAZILContinue strengthening national strategies to combat child labourACCEPTED
    161.236FRANCEIncrease efforts to improve the rights of the child, notably through the effective application of the prohibition of child labour, as well as the rights of womenACCEPTED
    161.237THAILANDEstablish a monitoring mechanism to oversee the effective implementation of the Child Labour Amendment Act, the National Child Labour Policy and the Accessible India Campaign to prevent exploitationofchildren and protect the rights of persons with disabilitiesACCEPTED
    161.231CHILEContinue strengthening institutions to protect children and adolescent girls and boys, with a view to eradicating child labour.ACCEPTED
    CHILD MARRIAGE
    161.60PERUContinue efforts to eradicate child and forced marriageACCEPTED
    161.196CANADAEnd harmful practices such as child, early and forced marriage.NOTED
    161.197CZECHIAImprove the enforcement of the legal provisions prohibiting harmful and discriminatory practices against women and girls, in particular child marriages, dowry-related murders and honour killings, and ensure that all women without discrimination have access to public Services.ACCEPTED
    161.218.ISRAELStep up its efforts to eradicate child marriage and so-called “honour crimes”ACCEPTED
    161.219SIERRA LEONEStep up efforts to combat and eliminate child, early and forced marriagesACCEPTED
    161.220HONDURASAdopt legislative measures and policies to prevent early or forced marriages.ACCEPTED
    161.221GABONContinue and intensify the actions to prohibit child marriage.ACCEPTED
    161.195ARGENTINATake urgent measures to put an end to harmful traditional practices such as the so-called “honour killings”, selective abortion on the basis of the foetus’ sex, the Sati, Devadasi, early and enforced marriage,bringing the perpetrators before justice, and guaranteeing assistance for victimsNOTED
    161.217ICELANDEnsure that legislation defining the minimum legal age of marriage at 18 is enforced at all levels, everywhere in the countryACCEPTED
    161.231CHILEContinue strengthening institutions to protect children and adolescents girls and boys, with a view to eradicating the practice of child marriageACCEPTED
    (SEXUAL) VIOLENCE AGAINST CHILDREN
    161.201KYRGYZSTANTake additional serious measures to eliminate violence against women and children, including sexual violence.ACCEPTED
    161.202VIETNAMContinue and strengthen measures to prevent and repress offences and violence against women and girls, including through early childhood education, awareness raising and enhancing effective mechanisms of reparationACCEPTED
    161.214TIMOR-LESTEStrengthen legislations to combat sexual offences against children and women.ACCEPTED
    161.216KENYAImplement the Protection of Children from Sexual Offences Act to increase the protection of Children from Sexual AbuseACCEPTED
    161.230PORTUGALContinue to take all necessary measures to enhance the effectiveness of the protection of children, in particular in cases of sexual violence against childrenACCEPTED
    161.232SLOVAKIADevelop specific guidelines for protection and support to the victims of child sexual abuse and their families undergoing trialACCEPTED
    161.57ZAMBIACriminalize of all forms of sexual abuse of girls under 18 years of age, including marital rape and “honour crimes”NOTED
    161.196CANADAImplement existing laws on all forms of violence and sexual violence against women and girls, including: “honour” crimes, female foeticide, and female infanticide; expand the definition of rape and sexual assault to include marital rape;NOTED
    161.198GREECEStep up efforts for a comprehensive protection of women and girls, in  particular against sexual violenceACCEPTED
    161.200JAPANTake more effective measures to protect and promote the rights of women and girls, as they continue to be subjected to widespread violence, discrimination and exploitationACCEPTED
    161.205CHILEContinue strengthening institutions to protect children and adolescents girls and boys, with a view to eradicating sexual exploitation.ACCEPTED
    CHILD HEALTH
    161.87NORWAYAllocate adequate resources to realise the Sustainable Development Goals targets to reduce maternal mortality and end preventable deaths of newborns and children under five.ACCEPTED
    161.177ZIMBABWETake steps towards improving access to health, especially access to maternal health, to adequate obstetric delivery services so as to reduce maternal and child mortalityACCEPTED
    JUVENILE JUSTICE
    161.238BOTSWANATake all appropriate measures in the implementation of the 2015 Juvenile Justice Act to give opportunity for rehabilitation to children at 18 years and belowACCEPTED
    HUMAN (CHILD) TRAFFICKING
    161.117BELARUSContinue with relevant consultations and adopt a law on combating trafficking in personsACCEPTED
    161.118CUBAContinue the consultation process with all concerned parties to elaborate a new project of the law against trafficking in personsACCEPTED
    161.119LIECHTENSTEINContinue and redouble its efforts to combat trafficking in persons and modern slavery, including through better law enforcement to end impunityfor human traffickers and through initiatives aimed at destigmatizing andrehabilitating victims of traffickingACCEPTED
    161.120HOLY SEEContinue to implement measures to stop the flow of trafficking in personsACCEPTED
    161.121LEBANONStrengthen the national mechanisms to combat human trafficking and support victims and their rehabilitation.ACCEPTED
    161.122PHILIPPINESAccelerate efforts towards combatting human trafficking, particularly in protecting and rehabilitating victims.ACCEPTED
    161.123SENEGALContinue combatting human traffickingACCEPTED
    161.125UKRAINEContinue improving the national legislative framework on the rehabilitation of victims of traffickingACCEPTED
    CORPORAL PUNISHMENT
    161.233LIECHTENSTEINIntroduce legislation to prohibit corporal punishment of children in the home and in all other settings, including as a sentence under traditionalforms of justiceACCEPTED
    161.234LIECHTENSTEINIntroduce comprehensive and continuous public education, awareness raising and social mobilization programs on the harmful effects, of corporal punishmentACCEPTED
    161.235ZAMBIAEstablish a database of all case of violence against children and explicitly prohibit all forms of corporal punishment of children under 18 of age in all settingsACCEPTED
    BIRTH REGISTRATION
    161.152BAHRAINRemove barriers prohibiting scheduled castes and schedule tribes from registering their births and obtaining birth certificates of their childrenNOTED
    161.150MEXICOPromote and facilitate universal access to birth registration, especially for people living in extreme poverty, belonging to religious minorities or living in the remote areas of the country through the implementation ofmobile units and carrying out awareness-raising campaignsACCEPTED
    FOOD SECURITY AND MALNUTRITION
    161.153LIBYAContinue strengthening efforts aimed at promoting food security anderadicate all forms of malnutrition, in particular among children under the age of five.ACCEPTED
    CHILDREN WITH DISABILITIES
    161.244AUSTRALIAEnsure that girls with disabilities are afforded the same right to education as all childrenACCEPTED
    CHILD EDUCATION/ RIGHT TO EDUCATION
    161.182LAO PEOPLE’S DEMOCRATIC REPUBLICContinue its efforts to ensure that all children have access to education at all levels and all categoriesACCEPTED
    161.63SLOVAKIAExpand the scope of Right to Free and Compulsory Education Act and to promote human rights education in school curriculum.ACCEPTED
    161.64ZAMBIAInclude human rights education in the draft new education policy.NOTED
    161.183MYANMARContinue to take steps on providing inclusive and quality education for all.ACCEPTED
    161.184QATARContinue its efforts in implementing its comprehensive policies to ensure quality education for all children.ACCEPTED
    161.185VIET NAMPromote children’s right to education, especially the education on climate change adaptation and mitigation.ACCEPTED
    161.186BRUNEI DARUSSALAMStep up its efforts to carry out the second phase of its Education for All programmes to focus on providing affordable and quality secondary education in the countryACCEPTED
    161.187MEXICOIncrease investment in the universal, mandatory and free education by giving priority to measures to eradicate discrimination and exclusion that affect girls, children with disability, the Dalits group and marginalized personsACCEPTED
    161.188KYRGYZSTANAccept more efforts to increase girls’ secondary education, includingensuring that schools are girl-friendly in all parameters.ACCEPTED
    161.189HOLY SEEContinue to ensure access to education for all, especially children ofscheduled castes and tribes.ACCEPTED
    161.181IRAQIncrease the government expenditure in the field of education.ACCEPTED
    CAPACITY BUILDING/ TRAINING
    161.68MEXICOStrengthen capacity-building with regard to human rights for civil servants involved in the protection of women, girls and boys victims of violence and sexual abuseACCEPTED
    161.212THAILANDFurther the implementation of relevant laws and policies as well astraining for public officials, to tackle sexual offenses and unfair treatment to womenACCEPTED
    161.65EGYPTContinue and step up national efforts to train and guide security staffand other law enforcement officials in the field of human rightsACCEPTED
    MISCELLANEOUS RECOMMENDATIONS
    161.69HONDURASAdopt a comprehensive national plan on inclusion in order to combat persisting inequality, paying particular attention to persons in vulnerable situations such as women, children, persons with disabilities and minorities.ACCEPTED
    161.168BULGARIAContinues its fight against poverty, lack of adequate food, safe water and sanitation, while paying special attention to the need to introduce a child rights-based approach in all policies.ACCEPTED
    161.190COLUMBIAStrengthen the integration of the gender perspective in the formulation and implementation of policies.ACCEPTED
    161.191SOUTH AFRICAEnsure implementation of the Gender Budgeting Scheme in all states and union territories.NOTED
    161.226TURKEYAccelerate work on the protection of the rights of children and women in particular.ACCEPTED
    161.124MALDIVESContinue efforts to improve social services that provide support to victims of human trafficking, forced labour, and those who have been sexually
    exploited
    ACCEPTED
    161.193TIMOR-LESTERedouble efforts on ensuring gender equality and take measures to prevent gender discriminationACCEPTED