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Friday, September 14, 2018

देश के 100 जिलों में सबसे ज्यादा होता है बाल विवाह, MP के आठ जिले भी शामिल


देश में बाल विवाह को लेकर सरकार कई जागरूकता अभियान संचालित कर रही है। वहीं, राज्य सरकारें भी इस काम में कई मुहिम चला रही हैं। लेकिन इन सब के बावजूद इन अभियानों का असर होता दिखाई नहीं दे रहा। दरअसल, नेशनल फैमली हेल्थ सर्वे-4 में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। देश के 100 जिलों में 18 साल की उम्र से पहले ही बाल विवाह कर दिया गया। इनमें से 8 जिले मध्यप्रदेश के भी हैं। ये रिपोर्ट साल 2015-16 में किए गए सर्वे में सामने आई है। 
प्रदेश के आठ जिलों में सबसे अधिक बाल विवाह के मामले झाबुआ के हैं। यहां पर बाल विवाह की दर 31.2 फीसदी है जो प्रदेश में सबसे ज्यादा है। शाजापुर 26.7, राजगढ़ 26.1, मंदसौर 25.2, टीकमगढ़ 25, शिवपुरी 19.7, उज्जैन 19.1 रतलाम 19 फीसदी पर है। विवाह की कानूनी तय उम्र से पहले बाल विवाह के मामले सबसे ज्यादा ग्रामीण इलाकों के हैं। 
रिपोर्ट में  बाल विवाह के लिए परिवार की आर्थिक स्थिति को अहम कारण बताया गया है। दरअसल, ग्रामीण क्षेत्रों में जिन परिवारों की आय गरीबी रेखा से नीचे है ऐसे परिवारों में बाल विवाह के ज्यादा मामले सामने आए हैं। बाल विवाह के मामलों में 40 फीसदी से ज्यादा परिवार संपत्ती सूचकांक में सबसे नीचे हैं। वहीं, एमपी में 61 फीसदी मामलों में 18 साल की उम्र से पहले ही युवतियां माध्यमिक शिक्षा पूरी कर लेती हैं।  

साभार /mpbreakingnews.in

Tuesday, July 31, 2018

कंपनियों के कब्जे में बच्चों का पोषण आहार



जावेद अनीस



पिछले करीब दो सालों से मप्र में आंगनबाड़ी केंद्रों से मिलने वाले पूरक पोषण आहार सप्लाई को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है. जिसकी वजह से पोषण आहार वितरण व्यवस्था प्रभावित रही है. मध्यप्रदेश में इसके करीब 95 लाख हितग्राही हैं जिसमें बच्चे, किशोरियां और गर्भवती महिलायें शामिल हैं. इस दौरान प्रदेश के कई जिलों में टेक होम राशन का स्टॉक खत्म होने, महीनों तक आंगनबाड़ियों में पोषण आहार नहीं पहुँचने के मामले सामने आये हैं जबकि खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के बाद से अब यह एक कानूनी हक है, जिसकी वजह से आंगनबाड़ी केंद्रों से बच्चों व महिलाओं को मिलने वाले पोषण आहार को किसी भी स्थिति में रोका नहीं जा सकता है.

दरअसल मध्यप्रदेश में आंगनवाड़ियों के जरिए कुपोषित बच्चों और गर्भवती महिलाओं को दी जाने वाली पोषणाहार व्यवस्था को लेकर लम्बे समय से सवाल उठते रहे हैं. करीब 12 सौ करोड़ रुपए बजट वाले इस व्यवस्था पर तीन कंपनियों-एमपी एग्रो न्यूट्री फूड प्रा.लि., एम.पी. एग्रोटॉनिक्स लिमिटेड और एमपी एग्रो फूड इंडस्ट्रीज का कब्जा रहा है. जबकि 2004 में ही सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि आंगनवाड़ियों में पोषण आहार स्थानीय स्वंय सहायता समूहों द्वारा ही वितरित किया जाये. सुप्रीमकोर्ट द्वारा इस व्यवस्था को लागू करने की जिम्मेदारी मुख्य सचिव और गुणवत्ता पर निगरानी की जिम्मेदारी ग्राम सभाओं को दी गई थी. लेकिन कंपनियों को लाभ पहुँचाने के फेर में इस व्यवस्था को लागू नही किया गया. इस दौरान कैग द्वारा भी मध्यप्रदेश में पोषण आहार व्यस्था में व्यापक भ्रष्टाचार होने की बात लगातार उजागर किया जाता रहा है जिसमें 32 फीसदी बच्चों तक पोषण आहार ना पहुँचने, आगंनबाड़ी केन्द्रों में बड़ी संख्या में दर्ज बच्चों के फर्जी होने और पोषण आहार की गुणवत्ता खराब होने जैसे गंभीर कमियों की तरफ ध्यान दिलाया जाता रहा है लेकिन सरकार द्वारा हर बार इस पर ध्यान नहीं दिया गया.

इसी पृष्ठभूमि में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान द्वारा 6 सितंबर  2016 को प्रदेश में पोषण आहार का काम कम्पनियों के बजाय स्वंय सहायता समूहों को दिये जाने की घोषणा की गई जिसके बाद महिला एवं बाल विकास द्वारा 15 दिनों के भीतर में नयी व्यवस्था तैयार करने की बात कही गयी थी. लेकिन इन सबके बावजूद ठेका लेने वाली कंपनियों,अफसरों और नेताओं की साठगांठ ने नया रास्ता निकाल ही लिया और फिर तैयारी के नाम पोषण आहार की पुरानी सेंट्रलाइज्ड व्यवस्था को ही 31 दिसंबर 2016 तक लागू रखने का निर्णय ले लिया गया, जिसके बाद बाद 1 जनवरी 2017 से अंतरिम नई विकेंद्रीकृत व्यवस्था लागू  करने की समय सीमा तय की गयी .

लेकिन इस दौरान पोषण आहार का काम सहायता समूहों को दिये जाने के फैसले को चुनौती देते हुये इंदौर हाईकोर्ट में एक याचिका लगाई गई जिसके बाद पोषण आहार सप्लाय करने वाली संस्थाओं को स्टे मिल गयी. कंपनियां की रणनीति इस पूरे मामले को कानूनी रूप से उलझाये रखने की रही जिससे पोषणाहार सप्लाई करने का काम उनके हाथों में बना रह सके और वे इसमें कामयाब भी रहीं. इस दौरान पोषाहार की पुरानी व्यवस्था को बनाये रखने में सरकार का भी सहयोग उन्हें मिलता रहा. पोषण आहार की पुरानी व्यवस्था निरस्त कर सरकार को नई व्यवस्था की प्रक्रिया शुरू करने को लेकर सितंबर 2017 में हाई कोर्ट द्वारा आदेश भी दिये गये थे जिसका पालन नहीं किये जाने पर कोर्ट द्वारा महिला बाल विकास के प्रमुख सचिव, एमपी एग्रो को अवमानना का नोटिस भी जारी किया जा चूका है. इस साल 9 मार्च को इस मामले की सुनवाई करते हुये हाईकोर्ट की डिवीजन बैंच ने इस पूरे मामले में मध्यप्रदेश की भूमिका पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि आदेश के बावजूद निजी कंपनियों से पोषण आहार लेना यह साबित करता है कि सरकार उन्हें लाभ पहुंचाना चाहती है.

बहरहाल वर्तमान स्थिति यह है कि बीते 25 अप्रैल को सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया है कि शॉर्ट टर्म टेंडर के तहत सात कंपनियों को पोषण आहार सप्लाई का काम दे दिया दिया गया है जो अगले पांच महीनों तक ये काम करेंगी. शॉर्ट टर्म टेंडर की समय सीमा आगामी सितम्बर माह में पूरी हो रही है इसे बाद स्व-सहायता समूहों के माध्यम से पोषण आहार बांटा जाना है लेकिन ऐसा लगता है कि हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद अफसरशाही और निजी कंपनियों का  गठजोड़ सितम्बर के बाद भी पोषण आहार वितरण में कंपनी राज को ही बनाये रखना चाहती है. स्व-सहायता समूहों को वितरण का काम देने से पहले सात सरकारी प्लांट बनाया जाना था जिसमें से अभी तक एक भी प्लांट तैयार नहीं हो सका है और अब इन्हें तैयार होने में 6 माह से ज्यादा का समय लग सकता है ऐसे में सितम्बर के बाद निजी कंपनियों को दिये गये टेंडर की समय-सीमा आगे बढ़ाने के बहाने पहले ही तैयार है, इसके बाद मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव के चलते आचार संहिता लग जायेगी और इस तरह से नयी सरकार के गठन तक यह मामला अपने आप अटक जायेगा और कंपनी राज चलता रहेगा.

इस दौरान पोषण आहार की नई व्यवस्था लागू होने तक वितरण जारी रखने के लिये बुलाई गयी शॉर्ट टर्म टेंडर भी सवालों के घेरे में आ चुकी है, इसको लेकर महाराष्ट्र की वेंकटेश्वर महिला सहकारी संस्था ने सुप्रीमकोर्ट में एक याचिका दाखिल की है जिसे सुप्रीमकोर्ट ने मंजूर करते हुये मध्यप्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है और यथास्थिति को बनाये रखने को कहा है.

मध्य प्रदेश के लिये कुपोषण एक ऐसा कलंक है जो पानी की तरह पैसा बहा देने के बाद भी नहीं धुला है, पिछले दस-पंद्रह सालों से मध्यप्रदेश में कुपोषण की भयावह स्थिति लगातार  सुर्खियाँ बनती रही हैं, इसको लेकर विपक्ष और राज्य सरकार पर लापरवाही और भ्रष्टाचार का आरोप लेकर घेरे में लेता रहा है.
साल 2005-6 में जारी तीसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में मध्यप्रदेश 60 फीसदी बच्चे काम वजन के पाये गए थे और अब ऐसा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 (एनएफएचएस-2015-16) के अनुसार यहाँ अभी भी 42.8 प्रतिशत प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं. एनुअल हेल्थ सर्वे 2016 के अनुसार शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) के मामले में मध्यप्रदेश अग्रणी है जहाँ 1000 नवजातों में से 47 अपना पहला जन्मदिन नहीं मना पाते हैं.

सुधार की धीमी रफ़्तार
(राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 और 4 की तुलनात्मक स्थिति )

सूचकांक
2005-06
एनएफएचएस-3
2015-16
एनएफएचएस-4
कम वजन के बच्चे
60


42.8
गभीर कुपोषित बच्चे
12.6
9.2
ठिगने बच्चे
50
42
बच्चों में खून की कमी
74.1


68.9
महिलाओं में खून की कमी
56

52.5

जाहिर है तमाम योजनाओं, कार्यक्रमों और बजट के बावजूद बदलाव की स्थिति धीमी है.
भाजपा के बुजुर्ग नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर भी मानते हैं कि सरकार कुपोषण को मिटाने के लिए धीरे धीरे काम कर रही है साथ ही उन्होंने मांग की है कि पोषण आहार के लिए दी जाने वाली राशि को लेकर भी सवाल उठाते हुये कहा है कि “8 रूपये में चाय नहीं आती दूध और दलिया कहां से आएगा यह राशि काफी कम है, इसे बढ़ाकर कम से कम 20 रुपए प्रति बच्चा प्रतिदिन के मान से निर्धारित की जाए.”

बीते 26 जून को विधानसभा के मानसून सत्र में बाबूलाल गौर द्वारा पूछे गये सवाल पर महिला और बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनीस ने बताया है कि ‘मध्यप्रदेश में अति कम वजन वाले बच्चों की संख्या करीब एक लाख से ज्यादा है और सूबे में कुपोषण सहित अन्य बीमारियों से  औसतन 61 बच्चे हर रोज मौत का शिकार हो रहे हैं.’

सितम्बर 2016 कुपोषण की स्थिति पर मध्यप्रदेश सरकार ने श्वेतपत्र लाने कि जो घोषणा की थी उसका भी कुछ आता-पता नहीं है. इसके लिये समिति का गठन किया जा चुका है लेकिन इसकी अभी तक एक भी बैठक भी नहीं हो पायी है .

तमाम प्रयासों के बावजूद मध्यप्रदेश आज भी शिशु मृत्यु दर में पहले और कुपोषण में दूसरे नंबर पर बना हुआ है जो कि सरकार की लापरवाही,  अक्षमता और यहां जड़ जमाये भ्रष्टाचार की स्थिति को दर्शाता है. जाहिर है इसमें भ्रष्टाचार का बड़ा खेल है जिसका जिक्र अदालत द्वारा अपनी सुनवाई और कैग की रिपोर्टों में लगातार किया जाता रहा है .


 Hum Hindustani (27 July to 2 August 2018)



Wednesday, July 25, 2018

भ्रष्टाचार नौनिहालों का निवाला तक खा रहा है


नीलेश द्विवेदी

अभी पिछले महीने की ही बात है. मध्य प्रदेश के विदिशा जिले से निकली एक खबर ने राज्य से केन्द्र तक मौजूद सरकारी तंत्र पर तमाचे सरीखी चोट की. इस जिले का एक गांव है, भिलाय. यहां रहने वाले दयाराम के सालभर के बेटे सुरेश की तबीयत उस रोज ज्यादा बिगड़ गई थी. आनन-फानन में उसे विदिशा के जिला अस्पताल लाया गया. मेडिकल स्टाफ ने यहां इलाज से पहले उसके खून का नमूना लेने की कोशिश. मगर उसकी रगों से खून का एक क़तरा भी न निकला. उसी रात उसकी मौत हो गई. वह कुपोषण का शिकार था. अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ एके गोयल ने खुद माना कि बच्चे के शरीर में खून और पानी की बेहद कमी थी. इस उम्र के बच्चे का वजन 10 किलो होना चाहिए था, लेकिन उसका सिर्फ 3.9 किलो ही था.
लेकिन यह कहानी सिर्फ इकलौते सुरेश की नहीं है. खबरों के मुताबिक, विदिशा जिले में ही करीब एक महीने में 45 से ज्यादा बच्चों की कुपोषण से मौत हो चुकी है. प्रदेश का श्योपुर जिला कुपोषण को लेकर अक्सर सुर्खियों में रहता है. इसी जिले से ताल्लुक रखने वाले कांग्रेस के विधायक हैं, रामनिवास रावत. उनके मुताबिक जिले में अप्रैल से अगस्त के बीच करीब 116 बच्चे कुपोषण के कारण जान से हाथ धो बैठे हैं. श्योपुर के अलावा झाबुआ, अलीराजपुर, खंडवा, गुना, रीवा, शिवपुरी आदि जिलों से भी कुपोषण की वजह से बच्चों की मौतों की खबरें आती रहती हैं. यहां तक कि राजधानी भोपाल के ग्रामीण इलाके भी कुपोषण से होने वाली मौतों की मार से अछूते नहीं हैं.
इस सिलसिले में रावत ने जुलाई के दौरान विधानसभा में सरकार से जवाब तलब किया था. तब लोक-स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री रुस्तम सिंह से जानकारी मिली कि ‘प्रदेश में जनवरी से मई 2016 के बीच छह साल तक के करीब 9,167 बच्चों की मौत कुपोषण से हुई है. जबकि नीमच में जिले में सबसे ज्यादा 22 फीसदी बच्चे कुपोषित पाए गए.’ ऐसे ही एक अन्य जवाब में सरकार ने माना कि प्रदेश के 51 जिलों में कराए गए सर्वे में करीब 13.31 लाख बच्चे कुपोषित मिले हैं.
मध्य प्रदेश के पड़ोसी राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र भी इस मामले में पीछे नहीं हैं
इसी साल फरवरी की बात है. टाइम्स ऑफ इंडिया ने खबर दी थी कि राजस्थान के करीब 13 जिलों में बच्चों में कुपोषण की स्थिति गंभीर है. बीते दो महीने में हद दर्जे के कुपोषण के कारण इन जिलों के 25 बच्चों की तो मौत भी हो चुकी है. इनमें 19 बच्चियां थीं. ऐसे ही 14 जून को जारी हुई ‘विश्व पौष्टिकता रिपोर्ट-2016’ के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस ने बताया कि गुजरात में करीब 1.45 लाख बच्चे कुपोषित हैं. और अभी चार अक्टूबर की ही बात है. मीडिया में आई इन खबरों पर कि महाराष्ट्र में कुछेक महीनों में करीब 500-600 आदिवासी बच्चों की मौत हुई है, सुप्रीम कोर्ट राज्य सरकार को डांट लगाई थी.
कोर्ट ने तल्ख अंदाज में सवाल पूछा, ‘आपको क्या लगता है, हम यहां मजे लेने के लिए बैठे हैं? क्या आप यह मानते हैं कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में कुछ बच्चों के मर जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता?’ लेकिन सच मानिए, फर्क शायद नहीं ही पड़ता होगा. क्योंकि विश्व पौष्टिकता रिपोर्ट के ही मुताबिक, ‘कुपोषण के कारण पांच साल से कम उम्र के बच्चों का विकास रुकने के मामले में भारत 132 देशों में 114 नंबर पर खड़ा है. जबकि एशिया के 39 देशों में 34वें (कुपोषित बच्चों की लंबाई के मामले में) और 35वें (कुपोषित बच्चों के वजन के लिहाज से) पायदान पर. यानी एशिया के सिर्फ चार-पांच देशों की हालत ही भारत से खराब है.
कुपोषण इसलिए क्योंकि पोषण तो भ्रष्टाचारियों का हो रहा है
इसी अगस्त में दैनिक भास्कर ने मध्य प्रदेश में पोषाहार वितरण व्यवस्था में चल रही बड़ी घपलेबाजी को उजागर किया था. इसके मुताबिक, राज्य में कई साल से सिर्फ तीन निजी कम्पनियों का ही ‘पोषण’ हो रहा है. ये हैं- एमपी एग्रो न्यूट्री फूड, एमपी एग्रो फूड इंडस्ट्रीज और एमपी एग्रोटॉनिक्स. सरकारी कम्पनी एमपी स्टेट एग्रो ने इन तीनों के साथ करार किया हुआ है, राज्य में पोषण आहार की आपूर्ति के लिए. लेकिन यह ‘आपूर्ति’ वास्तव में हुई किस तरह? एमपी स्टेट एग्रो साल-दर-साल अपना उत्पादन घटाती गई जबकि बाकी तीनों निजी कम्पनियों का उत्पादन बढ़ता गया.
खबरों के मुताबिक, 2007 में प्रदेश में पोषण आहार का बजट करीब 160 करोड़ रुपए था जो अब करीब 1,200 करोड़ रुपए हो चुका है. लेकिन इस बजट का अधिकांश हिस्सा ‘बंदरबांट’ में ही खर्च हो जाता है. इस बंदरबांट के लिए आंकड़ों की हेराफेरी कैसे की जाती है, इसकी मिसाल हैं प्रदेश के महिला एवं बाल विकास विभाग के हास्यास्पद आंकड़े. इनके मुताबिक राज्य में 2015-16 में 1.05 करोड़ बच्चों को पोषण आहार बांटा गया है. यानी इस हिसाब से राज्य के हर सातवें व्यक्ति को पोषाहार मिला है. क्योंकि प्रदेश की आबादी ही इस वक्त सात करोड़ के लगभग है.
कुछ और इस आंकड़े इस गड़बड़झाले की गंभीरता को उजागर करते हैं. मसलन, पिछले 12 साल में करीब 7,800 करोड़ रुपये का पोषण आहार राज्य में बांट दिया गया. लेकिन जैसा कि नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्टें (2006-07, 2008-10 और 2012-13) बताती हैं, राज्य के 32 फीसदी से ज्यादा बच्चों तक पोषाहार पहुंचता ही नहीं है. शायद इसीलिए बच्चों में कुपोषण और उससे हो रही मौतों के मामले में बिहार के बाद मध्य प्रदेश का नंबर देश में दूसरा है. फिलहाल मध्य प्रदेश सरकार ने इस मामले की जांच के लिए एक समिति बना दी है. सबसे ताज्जुब की बात है इस समिति के सामने एमपी एग्रो के जीएम रविंद्र चतुर्वेदी ने वर्तमान व्यवस्था को ही सबसे बेहतर बताया था. अब अगर सरकार इस रवैए पर चलेगी तो जाहिर है कि इस समिति से पोषण आहार की व्यवस्था में कोई विशेष सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती.
ऐसे ही, राजस्थान में ‘राजस्थान पत्रिका’ ने इस साल मार्च में करीब 85 लाख रुपए के पोषण आहार घोटाले को उजागर किया था. इसमें तुरंत ही आठ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज भी हुआ, लेकिन इसके बाद छोटे-मोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई के साथ ही मामला रफा-दफा कर दिया गया. यही हाल महाराष्ट्र का है. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी(एनसीपी) के प्रवक्ता नवाब मलिक ने जुलाई में राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री पंकजा मुंडे पर 12,000 करोड़ रुपए के पोषण आहार घोटाले का आरोप लगाया. उनके मुताबिक, राज्य की करीब 10,000 आंगनबाड़ियों में पोषण आहार की आपूर्ति के लिए फरवरी में पक्षपातपूर्ण तरीके से अपने अपनों को ठेके दिए गए.
यह सिर्फ आरोप ही होते तो दूसरी बात थी. लेकिन जब जुलाई में ही बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने इन ठेकों के आवंटन में हुई अनियमिताओं को स्वीकार करते हुए इन्हें रद्द कर दिया, तो इन आरोपों की गंभीरता का भी अहसास हुआ. हालांकि पंकजा को ऐसा कोई अहसास हुआ होगा, ऐसा नहीं लगता. उन्होंने भगवानगढ़ में हुए दशहरा समारोह के दौरान जो बयान दिया, उससे तो यही लगता है. पंकजा ने अपने समर्थकों के बीच कहा, ‘मैं हमेशा अपना इस्तीफा साथ लेकर घूमती हूं. जिस समय मुझे लगेगा कि मैंने कुछ गलत किया है, मैं सरकार में नहीं रहूंगी.‘
गुजरात में इसी तरह का घोटाला उस वक्त ही सामने आ चुका है, जब नरेन्द्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. नियंत्रक महालेखा परीक्षक ने इसे उजागर किया था. खबरोंके मुताबिक, आंगनबाड़ियों में बांटे जाने वाले पोषण आहार की आपूर्ति के लिए ठेके देने में नियमों को ताक पर रख दिया गया. इसकी वजह से एक कम्पनी को तीन इलाकों का ठेका मिला, जबकि दूसरी को सिर्फ दो क्षेत्रों का ही. सरकारी खजाने को इस घपले से 92 करोड़ रुपए की चपत लगी वह अलग.
आखिर इन चार राज्यों का ही जिक्र क्यों?
एक सवाल हो सकता है कि पोषण आहार घोटाले या कुपोषण से होने वाली मौतों जिक्र करते हुए इन चार राज्यों का ही संदर्भ क्यों लिया गया. तो इसकी वजहें, जिनके आपस में अंतरसंबंध हैं. पहला- मध्य प्रदेश ऐसा राज्य है, जो पिछले चार साल से लगातार केन्द्र सरकार की ओर से दिया जाने वाला ‘कृषि कर्मण पुरस्कार’ जीत रहा है. यह पुरस्कार सबसे ज्यादा कृषि उत्पादन करने वाले राज्य को दिया जाता है. इसीलिए यह विरोधाभास किसी को भी चुभ सकता है कि ‘अन्न और अन्नदाता’ के राज्य में मासूम बच्चे भूख से सूख-सूख कर दम तोड़ रहे हैं.
राजे-रजवाड़ों की धरती राजस्थान क्षेत्रफल के लिहाज से देश का सबसे बड़ा राज्य है. हर साल सबसे ज्यादा विदेशी सैलानियों को अपनी तरफ खींचने वाला यह देश का छठवां (2015 में आए पर्यटकों के हिसाब से) राज्य है. महाराष्ट्र देश का सबसे अधिक औद्योगीकृत राज्य है. जबकि गुजरात के बहुप्रचारित ‘विकास मॉडल’ के दम पर ही नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे हैं. इसके अलावा, ये चारों राज्य भाजपा शासित हैं. इनमें भी गुजरात मोदी का गृह राज्य है. महाराष्ट्र में भाजपा उनके नाम पर ही सत्ता में आई है. जबकि मध्य प्रदेश-राजस्थान के मुख्यमंत्रियों (शिवराज सिंह चौहान-वसुंधरा राजे) को एक समय कद के लिहाज से किसी भी तरह मोदी से कम नहीं समझा जाता था और आज वे उनका अनुसरण करते हुए ही लग रहे हैं.
इसलिए कुपोषण का सवाल सीधे मोदी की तरफ
चूंकि मामला किसी एक राज्य का नहीं बल्कि राज्यों का है. उन नौनिहालों की जिंदगी से जुड़ा है जो देश का भविष्य कहे और समझे जाते हैं. जिनकी तरफ प्रधानमंत्री मोदी अक्सर ही अपने कार्यक्रमों के दौरान खिंचे चले जाते हैं. उन बच्चों के पोषण के लिए सुरक्षित किए गए जनता के उस पैसे में भ्रष्टाचार का है, प्रधानमंत्री खुद जिसकी चौकीदारी करने का दम भरते हैं. और भ्रष्टाचार भी कहां? उन राज्यों में, जहां उस पार्टी का शासन है, जिसके शीर्ष नेता खुद नरेन्द्र मोदी हैं. और फिर आशंका यह भी है कि अगर राष्ट्रीय स्तर की किसी एजेंसी से जांच कराई जाए तो देश के अन्य राज्यों में भी पोषण आहार के घपले-घोटाले पकड़ में आ सकते हैं. कुपोषण की भयावह वजहें सामने आ सकती हैं. या ओडिशा-छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की कामयाबी का सच भी. इसीलिए इस मामले में सवाल सीधे प्रधानमंत्री मोदी से किया जा रहा है.
मध्य प्रदेश में पोषण आहार घोटाले का भंडाफोड़ होने के बाद अगस्त में ही दिल्ली में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने मीडिया से बातचीत में प्रधानमंत्री की तरफ सवाल दागा था. उन्होंने कहा था, ‘प्रधानमंत्री जी कहते हैं कि मैं न खाऊंगा, न खाने दूंगा. सरकारी खजाने के चौकीदार की तरह काम करूंगा. तो क्या अब वे इस मामले की जांच कराएंगे?’ लेकिन इस सवाल का जवाब अब तक मिला नहीं है!
satyagrah से साभार 

Monday, April 9, 2018

शिक्षा के अधिकार कानून ने बढ़ाया निजीकरण: अनिल सदगोपाल




विकास संवाद और एमपीएलएसएसएम की ओर से व्याख्यान आयोजित




भोपाल, 5/4/2018 शिक्षा के अधिकार कानून ही बच्चों की शिक्षा को छीनने वाला कानून बन चुका है। इस कानून में जो प्रावधान किए गए हैं, उनका असर आज दिखाई दे रहा है। सार्वजनिक स्कूल बर्बाद होने को हैं और निजी स्कूलों की कहानी किसी से छिपी नहीं है, ऐसे में सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को बचाने की बड़ी चुनौती हमारे सामने खड़ी है। इसे समझना होगा। ख्यात शिक्षाविद् अनिल सद्गोपाल ने यह विचार व्यक्त किए। वह मीडिया एडवोकेसी संस्था विकास संवाद और मध्यप्रदेश लोक सहभागी साझा मंच की ओर से आयोजित एक परिचर्चा में बोल रहे थे।

पर्याप्त बजट का प्रावधान ही नहीं

अनिल ने बताया कि 1966 में कोठारी आयोग बना तो उसने अनुमान लगाया कि देश में अच्छी शिक्षा व्यवस्था के लिए जीडीपी का अभी जो ढाई प्रतिशत खर्च हो रहा है उसे 1986 तक छह प्रतिशत तक ले जाना होगा। लेकिन 1986 में यह केवल साढ़े तीन प्रतिशत ही था। शिक्षा का अधिकार कानून लागू करने से पहले 2006 में एक समिति बनाई गई और उस समिति ने भी अनुमान लगाया कि अगले दस सालों में शिक्षा का अधिकार देने के लिए जीडीपी का 10 प्रतिशत तक ले जाना होगा, लेकिन सरकार ने इस रिपोर्ट को गायब ही कर दिया गया। शिक्षा पर सरकार जीडीपी का केवल तीन प्रतिशत हिस्सा ही खर्च करती है।

अभी तक जनगणना के काम में लगे शिक्षक

शिक्षा के अधिकार कानून में लिखा है कि शिक्षकों को गैर शिक्षकीय कार्यों में नहीं लगाया जाएगा, लेकिन इसमें जनगणना, चुनाव और राष्टीय आपदा आदि को छोड़ दिया गया। लेकिन देखिए कि जनगणना का स्वरूप 2011 में बदलने के बाद अब भी कई तरह की जनगणना में शिक्षक लगे हुए हैं, और जब स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती है तो उसका नुकसान देश के सबसे गरीब बच्चों का होता है, क्योंकि प्राइवेट स्कूल के किसी मास्टर को इस काम में नहीं लगाया जाता है। उन्होंने बताया कि कोठारी आयोग की रिपोर्ट में जिस पड़ोस स्कूल का जिक्र था शिक्षा के अधिकार कानून में उसकी अवधारणा भी बदल दी गई है।

खतरनाक है दिल्ली के स्‍कूलों का यह नजरि‍या

दिल्ली में स्कूलों के वर्तमान मॉडल पर उन्होंने कहा कि जिस तरह के विजन को लेकर काम कि‍या जा रहा है वह बहुत खतरनाक है। उन्होंने बताया कि दिल्ली के स्कूलों में पिछले तीन सालों से पहली कक्षा को दो भागों में ​बांट दिया है, एक हाईपरफार्मेंस और दूसरा लो परफार्मेंस। हाई परफार्मेंस वाले बच्चे इंग्लिस में पढ़ते हैं और लो परफार्मेंस वाले हिंदी में। इस तरह से बच्चों के बंटवारा की अवधारणा समाज के लिए घातक है।

केलीफोर्निंया में खोजने से नहीं मिलता प्राइवेट स्कूल: 

अनिल ने बताया कि जब वह 2008 में कुछ मित्रों के आग्रह पर केलीफोर्निंया में शिक्षा के सिस्टम को समझने के लिए गए तो उन्होंने वहां पर कुछ प्राइवेट स्कूल मे विजिट करवाने का निवेदन किया। इसके लिए उनके मित्रों को बहुत परिश्रम करना पड़ा, क्योंकि वहां पर सरकार ने स्कूल शिक्षा व्यवस्था को बचाए रखा है। बहुत खोजने पर एक स्कूल मिला, तो वहां जाते ही गेट पर बच्चे बर्तन मांजते मिले। इस बारे में जब उन्होंने उस स्कूल के प्राचार्य से पूछा तो उन्होंने बताया कि इसे तो हमने आपके देश से ही सीखा है। सेवाग्राम में महात्मा गांधी की बुनियादी तालीम के मॉडल को देखकर उन्होंने इसे अपने स्कूल में लागू किया और इसे वहां बुरा नहीं माना जाता। वहां बारीबारी से मिड डे मील भी बच्चे मिलकर बनाते हैं, हमारे यहां इससे ठीक उलट नजरिया है।


व्याख्यान का विडियो



इस वीडियो में प्रोफेसर अनिल सदगोपाल  बता रहे हैं कि कैसे एक तयशुदा एजेंडे के साथ भारत में शिक्षा के निजीकरण को बढ़ाया गया है।


Tuesday, April 3, 2018

सरकार शिक्षा का अधिकार की जिम्मेदारी से बचाना चाहती है

शिक्षा के अधिकार (आरटीई) कानून लागू हुए आठ साल पूरे हो चुके हैं


हेमंत कुमार पाण्डेय


आज देश में शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लागू हुए आठ साल हो चुके हैं. संयोग है कि इन्हीं दिनों शिक्षा व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार सवालों के घेरे में है. बीते महीने केंद्र द्वारा 60 शिक्षण संस्थाओं को स्वायत्तता देने और सीबीएसई पेपर लीक मामले को लेकर छात्र सड़क पर उतर चुके हैं. छात्रों और शिक्षकों के एक बड़े तबके का मानना है कि स्वायत्तता देने के फैसले के बाद उच्च शिक्षा और महंगी हो जाएगी.
इससे पहले बीते जनवरी में जारी एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) के बाद देश के ग्रामीण इलाकों में शिक्षा के हाल पर सवाल उठ खड़े हुए थे. इसमें यह बात सामने आई थी कि आठवीं में पढ़ रहे आधे से अधिक बच्चे साधारण गुणा-भाग के सवाल हल नहीं कर सकते. प्राथमिक शिक्षा बच्चों और नतीजन देश के भविष्य की भी बुनियाद मानी जाती है. आजादी के आंदोलन के दौरान इसे लेकर महात्मा गांधी का कहना था, ‘जो कांग्रेसजन स्वराज्य की इमारत को बिलकुल उसकी नींव या बुनियाद से चुनना चाहते हैं, वे देश के बच्चों की उपेक्षा नहीं कर सकते.’
माना जाता है कि इस बात को ध्यान में रखते हुए ही संविधान के शिल्पकारों ने शिक्षा का अधिकार को राज्यों के लिए नीति निदेशक तत्वों में शामिल किया था. इसके बाद साल 2002 में 86वें संविधान संशोधन के जरिए छह से 14 साल के बच्चों को शिक्षा के मौके उपलब्ध करवाने को लेकर इसे नागरिकों के मूल कर्तव्य की सूची में जोड़ा गया. हालांकि, इसके करीब आठ के साल बाद ही सरकार ने इसकी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली और एक अप्रैल, 2010 से शिक्षा का अधिकार कानून लागू कर दिया गया. इस कानून को देश के इतिहास में मील का पत्थर माना गया.
शिक्षा के अधिकार कानून में कई ऐसे प्रावधान शामिल किए गए हैं, जिनसे प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में आमूलचूल बदलाव का रास्ता खुलता हुआ दिखता है. हालांकि, आधिकारिक आंकड़ों के साथ बीते साल नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट को देखें तो इस कानून के जमीनी अमल पर कई सवाल खड़े होते दिखते हैं.
बजट आवंटन और खर्च
केंद्रीय बजट में आरटीई के लिए अलग से कोई आवंटन नहीं किया जाता. इसे साल 2000-01 से चल रहे सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए) के साथ ही जोड़ा गया है. इस कानून के तहत केंद्र द्वारा राज्यों को 65 फीसदी मदद देने का प्रावधान शामिल किया गया था. हालांकि, साल 2014-15 में केंद्र ने अपना हिस्सा घटाकर 60 फीसदी कर दिया. पूर्वोत्तर के आठ राज्यों के साथ हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड (विशेष राज्यों) के लिए यह आंकड़ा 90 फीसदी है.


सर्व शिक्षा अभियान के लिए केंद्रीय बजट आवंटन | साभार : सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च
सर्व शिक्षा अभियान के लिए केंद्रीय बजट आवंटन | साभार : सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च

साल 2018-19 के बजट में एसएसए के लिए 26,129 करोड़ रुपये आवंटित किए गए. यह 2017-18 के मुकाबले 11 फीसदी अधिक है. हालांकि, यह रकम केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा जरूरी संसाधनों के लिए आकलित रकम 55,000 करोड़ रुपये से काफी कम है. हालांकि बीते वित्तीय वर्ष में कुल आवंटित बजट का केवल 66 फीसदी ही खर्च किया गया. इससे पहले साल 2015-16 में यह आंकड़ा 70 फीसदी था. मई, 2017 में इस बारे में मंत्रालय का कहना था कि बाकी बची रकम को राज्यों के लिए जारी फंड में शामिल किया जाएगा. हालांकि, इस अभियान के लिए जारी फंड में से बड़ी रकम खर्च न हो पाने को लेकर सरकार ने चुप्पी साधे रखी.
केंद्र सरकार सर्व शिक्षा अभियान के लिए बजट में रकम राज्यों द्वारा सौंपी गई वार्षिक कार्य योजना और बजट के आधार पर तय करती है. हालांकि, देखा गया है कि केंद्र, राज्यों द्वारा प्रस्तावित रकम से कम ही आवंटित करता है. साल 2015-16 में राज्यों ने कुल 91,485 करोड़ रुपये की योजना रखी थी लेकिन, केंद्र ने केवल 63,485 करोड़ रुपये की ही मंजूरी दी. यही नहीं, मंजूर की गई रकम का भी केवल 55 फीसदी ही बजट में आवंटित किया गया. साल 2016-17 में यह आंकड़ा घटकर केवल 48 फीसदी रह गया था. दूसरी ओर, साल 2013-14 में यह 86 फीसदी था.


राज्यों द्वारा सर्व शिक्षा अभियान पर खर्च रकम (फीसदी में) | साभार : सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च
राज्यों द्वारा सर्व शिक्षा अभियान पर खर्च रकम (फीसदी में) | साभार : सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च

राज्यवार देखें तो महाराष्ट्र इस अभियान के लिए आवंटित राशि को खर्च करने में सबसे आगे है. राज्य ने 2016-17 में कुल रकम का 84 फीसदी खर्च किया था. इसके बाद राजस्थान और उत्तर प्रदेश ने 77-77 फीसदी हिस्सा खर्च किया. दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल में इस मामले में फिसड्डी रहा है. ममता बनर्जी की नेतृत्व वाली सरकार कुल आवंटित रकम का केवल 37 फीसदी ही खर्च कर पाई है.
बुनियादी संसाधनों और ढांचे की कमी
आरटीआई कानून की धारा- आठ और नौ में कहा गया है कि यह राज्य सरकार और स्थानीय प्राधिकरण की जिम्मेदारी है कि वे शिक्षा के लिए बुनियादी संसाधान और ढांचे उपलब्ध कराएं. इनमें स्कूल की इमारत, शौचालय, स्वच्छ पेयजल, खेल का मैदान, चारदीवारी, शिक्षक और सीखने के लिए अध्ययन सामाग्री शामिल हैं. इस कानून की धारा 19 (1) कहती है कि जरूरी बनियादी संसाधनों के अभाव में किसी स्कूल को मान्यता नहीं दी जा सकती. साल 2010 में जब इस कानून को लागू किया गया था तो बुनियादी संसाधन और ढांचे को तीन साल के अंदर उपलब्ध कराने की बात कही गई थी. हालांकि, अब तक इस लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सका है.
सीएजी द्वारा सात राज्यों में ऑडिट के दौरान पाया गया कि 105 स्कूल बिना किसी इमारत के चल रहे हैं. इसके अलावा 858 स्कूलों को किराए के मकान में चलाया जा रहा है. आरटीआई कानून के मुताबिक स्कूल में प्रत्येक शिक्षक के लिए कम से कम एक क्लासरुम होना चाहिए. सीएजी द्वारा साल 2012-13 से लेकर 2015-16 के बीच ऑडिट में पाया गया कि इस शर्त को केवल 66 फीसदी स्कूल ही पूरा कर पाए हैं. जहां तक स्कूलों में बिजली की सुविधा उपलब्ध कराने की बात है तो इसे केवल 58 फीसदी स्कूल ही हासिल कर पाए हैं. इसके अलावा करीब आधे स्कूलों में ही खेल के मैदान और चारदीवारी मौजूद हैं.


स्कूलों में बुनियादी ढ़ांचे की उपलब्धता | साभार : सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च
स्कूलों में बुनियादी ढ़ांचे की उपलब्धता | साभार : सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च

शिक्षा का अधिकार कानून में बच्चों को सरकार की ओर मुफ्त यूनिफॉर्म और किताबें देने का भी प्रावधान है. हालांकि, इसे लेकर कई तरह की अनियमितता और भ्रष्टाचार के मामले सामने आए हैं. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि साल 2013-14 में पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर स्थित 13 स्कूलों में खराब गुणवत्ता की यूनिफॉर्म देने की शिकायत की गई. इसके अलावा कुछ समय पहले बिहार में बच्चों को समय पर किताबें नहीं दिए जाने की शिकायतें सामने आई हैं. इसे देखते हुए बिहार सरकार ने किताबों की जगह इसे खरीदने के लिए पैसे दिए जाने का ऐलान किया है. इसके अलावा सरकारी मशीनरी की लेटलतीफी का आलम यह है कि उत्तर प्रदेश में ठंड बीतने के बाद भी बच्चों को स्वेटर और जूते-मोजे नहीं बांटे जा सके.
शिक्षा के अधिकार को लेकर एक नागरिक संगठन आरटीआई फोरम की मानें तो 15 लाख सरकारी और निजी स्कूलों में से केवल आठ फीसदी ही कानून में तय मानकों को पूरा करते हैं. इनका कहना है कि स्कूलों की संख्या में लगातार कमी आई है. साथ ही, शिक्षकों के 13 लाख पद खाली हैं. इसके अलावा करीब 20 फीसदी अप्रशिक्षित शिक्षकों के साथ शिक्षा व्यवस्था को खींचा जा रहा है.
शैक्षणिक गुणवत्ता पर कम जोर
सर्व शिक्षा अभियान के लिए जारी रकम का तीन-चौथाई से भी ज्यादा हिस्सा शिक्षकों के वेतन और मकान सहित बाकी ढांचे को खड़ा करने में खर्च किया जा रहा है. साल 2017-18 में आवंटित रकम में इनकी हिस्सेदारी 76 फीसदी रही थी. दूसरी ओर शिक्षक प्रशिक्षण, नवाचार, पुस्तकालय जैसी गुणवत्ता संबंधी मदों पर केवल 10 फीसदी रकम खर्च की गई. इसके अलावा किताबों, यूनिफॉर्म और समावेशी शिक्षा के उठाए जाने वाले कदमों के लिए यह आकंड़ा 14 फीसदी ही था.
कानून के प्रावधानों के मुताबिक शिक्षकों को जनगणना, आपदा राहत और चुनावी कार्यों के अलावा और किसी गैर-शैक्षणिक गतिविधियों में नहीं लगाया जा सकता. इसके बाद भी शिक्षकों की भारी कमी के बीच उन्हें प्रशासनिक कार्यों की जिम्मेदारी दे दी जाती है. मसलन सीएजी ने उत्तराखंड में पाया कि 268 शिक्षकों को क्लस्टर रिसोर्स कोऑर्डिनेटर (सीआरसी) की जिम्मेदारी संभालनी पड़ रही है.
स्कूल प्रबंधन समति को लेकर अनियमितता और लेटलतीफी
इस कानून के मकसदों को पूरा करने के लिए स्थानीय समाज को साथ लाने की भी बात कही गई है. आरटीआई कानून के मुताबिक इसके लागू होने के छह महीने के अंदर स्कूल प्रबंधन समिति (एसएमसी) का गठन किया जाना था. इस समिति का मकसद स्कूल और स्थानीय समुदाय के बीच एक पुल का काम करना है. साथ ही, इसे स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं को लेकर भी सचेत रहने की जिम्मेदारी दी गई है. लेकिन, सीएजी द्वारा 12 राज्यों के ऑडिट में पाया गया कि अलग-अलग राज्यों में तीन से 88 फीसदी स्कूलों में इसे गठित नहीं किया जा सका है. इसके अलावा जिन स्कूलों में इसे गठित किया गया है, वहां भी स्कूल के विकास को लेकर होने वाली बैठकों में अनियमितता पाई गई है.


राज्यों में स्कूल प्रबंधन कमिटी की स्थिति | साभार : सीएजी
राज्यों में स्कूल प्रबंधन कमिटी की स्थिति | साभार : सीएजी

निजी स्कूलों में नामांकन को लेकर समस्याएं
आरटीआई कानून के मुताबिक निजी स्कूलों में गरीब परिवार के बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटें आरक्षित रखने का प्रावधान है. निजी स्कूलों में सीमित सीट और नामांकन के लिए मारामारी के बीच किसी गरीब के लिए अपने बच्चों के कदम इनके दरवाजे के अंदर करवाना टेढ़ी खीर जैसा होता है. इस साल डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन (डीपीआई) के पास 1.58 लाख सीटों के लिए 2.28 लाख आवेदन आए हैं.
उधर, गरीब बच्चों को नामांकन देने के बाद भी निजी स्कूलों द्वारा सरकार से वित्तीय मदद हासिल करने में समस्याओं का सामना करने की बात सामने आई है. महाराष्ट्र स्थित फेडरेशन ऑफ स्कूल एसोसिएशन ने आरटीआई फंड हासिल न होने की वजह से दिल्ली के रामलीला मैदान और मुंबई के आजाद मैदान में विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया है. फेडरेशन का कहना है कि स्कूलों का करीब 12,000 करोड़ रुपये सरकार के ऊपर बकाया है. दूसरी तरफ, सरकार की ओर से वित्तीय मदद न मिलने से नाराज उत्तर प्रदेश के करीब 2,000 निजी स्कूलों ने 2018-19 शैक्षणिक सत्र के लिए आरटीई कोटे से नामांकन न करने की बात कही है.
निजी स्कूलों में आरक्षित कोटे से आने वाले बच्चों के साथ भेदभाव के साथ किताबों, यूनिफॉर्म और अन्य सुविधाओं के लिए पैसे वसूलने की शिकायतें भी सामने आई हैं. कर्नाटक स्थित बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने इस बारे में कई शिकायतें मिलने के बाद निजी स्कूलों को चेतावनी जारी की है. आयोग ने आरटीआई कानून के प्रावधानों का उल्लंघन किए जाने पर सख्त कार्रवाई की बात कही है. उधर, स्कूलों का कहना है कि उन्हें सामान्य और आरक्षित कोटे से आने वाले बच्चों को मुफ्त सुविधाएं उपलब्ध कराने में परेशानी का सामना करना पड़ता है. साथ ही, स्कूलों ने आयोग पर उत्पीड़न करने का भी आरोप लगाया है.
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सत्याग्रह से साभार