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Monday, April 9, 2018

शिक्षा के अधिकार कानून ने बढ़ाया निजीकरण: अनिल सदगोपाल




विकास संवाद और एमपीएलएसएसएम की ओर से व्याख्यान आयोजित




भोपाल, 5/4/2018 शिक्षा के अधिकार कानून ही बच्चों की शिक्षा को छीनने वाला कानून बन चुका है। इस कानून में जो प्रावधान किए गए हैं, उनका असर आज दिखाई दे रहा है। सार्वजनिक स्कूल बर्बाद होने को हैं और निजी स्कूलों की कहानी किसी से छिपी नहीं है, ऐसे में सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को बचाने की बड़ी चुनौती हमारे सामने खड़ी है। इसे समझना होगा। ख्यात शिक्षाविद् अनिल सद्गोपाल ने यह विचार व्यक्त किए। वह मीडिया एडवोकेसी संस्था विकास संवाद और मध्यप्रदेश लोक सहभागी साझा मंच की ओर से आयोजित एक परिचर्चा में बोल रहे थे।

पर्याप्त बजट का प्रावधान ही नहीं

अनिल ने बताया कि 1966 में कोठारी आयोग बना तो उसने अनुमान लगाया कि देश में अच्छी शिक्षा व्यवस्था के लिए जीडीपी का अभी जो ढाई प्रतिशत खर्च हो रहा है उसे 1986 तक छह प्रतिशत तक ले जाना होगा। लेकिन 1986 में यह केवल साढ़े तीन प्रतिशत ही था। शिक्षा का अधिकार कानून लागू करने से पहले 2006 में एक समिति बनाई गई और उस समिति ने भी अनुमान लगाया कि अगले दस सालों में शिक्षा का अधिकार देने के लिए जीडीपी का 10 प्रतिशत तक ले जाना होगा, लेकिन सरकार ने इस रिपोर्ट को गायब ही कर दिया गया। शिक्षा पर सरकार जीडीपी का केवल तीन प्रतिशत हिस्सा ही खर्च करती है।

अभी तक जनगणना के काम में लगे शिक्षक

शिक्षा के अधिकार कानून में लिखा है कि शिक्षकों को गैर शिक्षकीय कार्यों में नहीं लगाया जाएगा, लेकिन इसमें जनगणना, चुनाव और राष्टीय आपदा आदि को छोड़ दिया गया। लेकिन देखिए कि जनगणना का स्वरूप 2011 में बदलने के बाद अब भी कई तरह की जनगणना में शिक्षक लगे हुए हैं, और जब स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती है तो उसका नुकसान देश के सबसे गरीब बच्चों का होता है, क्योंकि प्राइवेट स्कूल के किसी मास्टर को इस काम में नहीं लगाया जाता है। उन्होंने बताया कि कोठारी आयोग की रिपोर्ट में जिस पड़ोस स्कूल का जिक्र था शिक्षा के अधिकार कानून में उसकी अवधारणा भी बदल दी गई है।

खतरनाक है दिल्ली के स्‍कूलों का यह नजरि‍या

दिल्ली में स्कूलों के वर्तमान मॉडल पर उन्होंने कहा कि जिस तरह के विजन को लेकर काम कि‍या जा रहा है वह बहुत खतरनाक है। उन्होंने बताया कि दिल्ली के स्कूलों में पिछले तीन सालों से पहली कक्षा को दो भागों में ​बांट दिया है, एक हाईपरफार्मेंस और दूसरा लो परफार्मेंस। हाई परफार्मेंस वाले बच्चे इंग्लिस में पढ़ते हैं और लो परफार्मेंस वाले हिंदी में। इस तरह से बच्चों के बंटवारा की अवधारणा समाज के लिए घातक है।

केलीफोर्निंया में खोजने से नहीं मिलता प्राइवेट स्कूल: 

अनिल ने बताया कि जब वह 2008 में कुछ मित्रों के आग्रह पर केलीफोर्निंया में शिक्षा के सिस्टम को समझने के लिए गए तो उन्होंने वहां पर कुछ प्राइवेट स्कूल मे विजिट करवाने का निवेदन किया। इसके लिए उनके मित्रों को बहुत परिश्रम करना पड़ा, क्योंकि वहां पर सरकार ने स्कूल शिक्षा व्यवस्था को बचाए रखा है। बहुत खोजने पर एक स्कूल मिला, तो वहां जाते ही गेट पर बच्चे बर्तन मांजते मिले। इस बारे में जब उन्होंने उस स्कूल के प्राचार्य से पूछा तो उन्होंने बताया कि इसे तो हमने आपके देश से ही सीखा है। सेवाग्राम में महात्मा गांधी की बुनियादी तालीम के मॉडल को देखकर उन्होंने इसे अपने स्कूल में लागू किया और इसे वहां बुरा नहीं माना जाता। वहां बारीबारी से मिड डे मील भी बच्चे मिलकर बनाते हैं, हमारे यहां इससे ठीक उलट नजरिया है।


व्याख्यान का विडियो



इस वीडियो में प्रोफेसर अनिल सदगोपाल  बता रहे हैं कि कैसे एक तयशुदा एजेंडे के साथ भारत में शिक्षा के निजीकरण को बढ़ाया गया है।


Tuesday, April 3, 2018

सरकार शिक्षा का अधिकार की जिम्मेदारी से बचाना चाहती है

शिक्षा के अधिकार (आरटीई) कानून लागू हुए आठ साल पूरे हो चुके हैं


हेमंत कुमार पाण्डेय


आज देश में शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लागू हुए आठ साल हो चुके हैं. संयोग है कि इन्हीं दिनों शिक्षा व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार सवालों के घेरे में है. बीते महीने केंद्र द्वारा 60 शिक्षण संस्थाओं को स्वायत्तता देने और सीबीएसई पेपर लीक मामले को लेकर छात्र सड़क पर उतर चुके हैं. छात्रों और शिक्षकों के एक बड़े तबके का मानना है कि स्वायत्तता देने के फैसले के बाद उच्च शिक्षा और महंगी हो जाएगी.
इससे पहले बीते जनवरी में जारी एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) के बाद देश के ग्रामीण इलाकों में शिक्षा के हाल पर सवाल उठ खड़े हुए थे. इसमें यह बात सामने आई थी कि आठवीं में पढ़ रहे आधे से अधिक बच्चे साधारण गुणा-भाग के सवाल हल नहीं कर सकते. प्राथमिक शिक्षा बच्चों और नतीजन देश के भविष्य की भी बुनियाद मानी जाती है. आजादी के आंदोलन के दौरान इसे लेकर महात्मा गांधी का कहना था, ‘जो कांग्रेसजन स्वराज्य की इमारत को बिलकुल उसकी नींव या बुनियाद से चुनना चाहते हैं, वे देश के बच्चों की उपेक्षा नहीं कर सकते.’
माना जाता है कि इस बात को ध्यान में रखते हुए ही संविधान के शिल्पकारों ने शिक्षा का अधिकार को राज्यों के लिए नीति निदेशक तत्वों में शामिल किया था. इसके बाद साल 2002 में 86वें संविधान संशोधन के जरिए छह से 14 साल के बच्चों को शिक्षा के मौके उपलब्ध करवाने को लेकर इसे नागरिकों के मूल कर्तव्य की सूची में जोड़ा गया. हालांकि, इसके करीब आठ के साल बाद ही सरकार ने इसकी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली और एक अप्रैल, 2010 से शिक्षा का अधिकार कानून लागू कर दिया गया. इस कानून को देश के इतिहास में मील का पत्थर माना गया.
शिक्षा के अधिकार कानून में कई ऐसे प्रावधान शामिल किए गए हैं, जिनसे प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में आमूलचूल बदलाव का रास्ता खुलता हुआ दिखता है. हालांकि, आधिकारिक आंकड़ों के साथ बीते साल नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट को देखें तो इस कानून के जमीनी अमल पर कई सवाल खड़े होते दिखते हैं.
बजट आवंटन और खर्च
केंद्रीय बजट में आरटीई के लिए अलग से कोई आवंटन नहीं किया जाता. इसे साल 2000-01 से चल रहे सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए) के साथ ही जोड़ा गया है. इस कानून के तहत केंद्र द्वारा राज्यों को 65 फीसदी मदद देने का प्रावधान शामिल किया गया था. हालांकि, साल 2014-15 में केंद्र ने अपना हिस्सा घटाकर 60 फीसदी कर दिया. पूर्वोत्तर के आठ राज्यों के साथ हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड (विशेष राज्यों) के लिए यह आंकड़ा 90 फीसदी है.


सर्व शिक्षा अभियान के लिए केंद्रीय बजट आवंटन | साभार : सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च
सर्व शिक्षा अभियान के लिए केंद्रीय बजट आवंटन | साभार : सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च

साल 2018-19 के बजट में एसएसए के लिए 26,129 करोड़ रुपये आवंटित किए गए. यह 2017-18 के मुकाबले 11 फीसदी अधिक है. हालांकि, यह रकम केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा जरूरी संसाधनों के लिए आकलित रकम 55,000 करोड़ रुपये से काफी कम है. हालांकि बीते वित्तीय वर्ष में कुल आवंटित बजट का केवल 66 फीसदी ही खर्च किया गया. इससे पहले साल 2015-16 में यह आंकड़ा 70 फीसदी था. मई, 2017 में इस बारे में मंत्रालय का कहना था कि बाकी बची रकम को राज्यों के लिए जारी फंड में शामिल किया जाएगा. हालांकि, इस अभियान के लिए जारी फंड में से बड़ी रकम खर्च न हो पाने को लेकर सरकार ने चुप्पी साधे रखी.
केंद्र सरकार सर्व शिक्षा अभियान के लिए बजट में रकम राज्यों द्वारा सौंपी गई वार्षिक कार्य योजना और बजट के आधार पर तय करती है. हालांकि, देखा गया है कि केंद्र, राज्यों द्वारा प्रस्तावित रकम से कम ही आवंटित करता है. साल 2015-16 में राज्यों ने कुल 91,485 करोड़ रुपये की योजना रखी थी लेकिन, केंद्र ने केवल 63,485 करोड़ रुपये की ही मंजूरी दी. यही नहीं, मंजूर की गई रकम का भी केवल 55 फीसदी ही बजट में आवंटित किया गया. साल 2016-17 में यह आंकड़ा घटकर केवल 48 फीसदी रह गया था. दूसरी ओर, साल 2013-14 में यह 86 फीसदी था.


राज्यों द्वारा सर्व शिक्षा अभियान पर खर्च रकम (फीसदी में) | साभार : सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च
राज्यों द्वारा सर्व शिक्षा अभियान पर खर्च रकम (फीसदी में) | साभार : सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च

राज्यवार देखें तो महाराष्ट्र इस अभियान के लिए आवंटित राशि को खर्च करने में सबसे आगे है. राज्य ने 2016-17 में कुल रकम का 84 फीसदी खर्च किया था. इसके बाद राजस्थान और उत्तर प्रदेश ने 77-77 फीसदी हिस्सा खर्च किया. दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल में इस मामले में फिसड्डी रहा है. ममता बनर्जी की नेतृत्व वाली सरकार कुल आवंटित रकम का केवल 37 फीसदी ही खर्च कर पाई है.
बुनियादी संसाधनों और ढांचे की कमी
आरटीआई कानून की धारा- आठ और नौ में कहा गया है कि यह राज्य सरकार और स्थानीय प्राधिकरण की जिम्मेदारी है कि वे शिक्षा के लिए बुनियादी संसाधान और ढांचे उपलब्ध कराएं. इनमें स्कूल की इमारत, शौचालय, स्वच्छ पेयजल, खेल का मैदान, चारदीवारी, शिक्षक और सीखने के लिए अध्ययन सामाग्री शामिल हैं. इस कानून की धारा 19 (1) कहती है कि जरूरी बनियादी संसाधनों के अभाव में किसी स्कूल को मान्यता नहीं दी जा सकती. साल 2010 में जब इस कानून को लागू किया गया था तो बुनियादी संसाधन और ढांचे को तीन साल के अंदर उपलब्ध कराने की बात कही गई थी. हालांकि, अब तक इस लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सका है.
सीएजी द्वारा सात राज्यों में ऑडिट के दौरान पाया गया कि 105 स्कूल बिना किसी इमारत के चल रहे हैं. इसके अलावा 858 स्कूलों को किराए के मकान में चलाया जा रहा है. आरटीआई कानून के मुताबिक स्कूल में प्रत्येक शिक्षक के लिए कम से कम एक क्लासरुम होना चाहिए. सीएजी द्वारा साल 2012-13 से लेकर 2015-16 के बीच ऑडिट में पाया गया कि इस शर्त को केवल 66 फीसदी स्कूल ही पूरा कर पाए हैं. जहां तक स्कूलों में बिजली की सुविधा उपलब्ध कराने की बात है तो इसे केवल 58 फीसदी स्कूल ही हासिल कर पाए हैं. इसके अलावा करीब आधे स्कूलों में ही खेल के मैदान और चारदीवारी मौजूद हैं.


स्कूलों में बुनियादी ढ़ांचे की उपलब्धता | साभार : सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च
स्कूलों में बुनियादी ढ़ांचे की उपलब्धता | साभार : सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च

शिक्षा का अधिकार कानून में बच्चों को सरकार की ओर मुफ्त यूनिफॉर्म और किताबें देने का भी प्रावधान है. हालांकि, इसे लेकर कई तरह की अनियमितता और भ्रष्टाचार के मामले सामने आए हैं. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि साल 2013-14 में पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर स्थित 13 स्कूलों में खराब गुणवत्ता की यूनिफॉर्म देने की शिकायत की गई. इसके अलावा कुछ समय पहले बिहार में बच्चों को समय पर किताबें नहीं दिए जाने की शिकायतें सामने आई हैं. इसे देखते हुए बिहार सरकार ने किताबों की जगह इसे खरीदने के लिए पैसे दिए जाने का ऐलान किया है. इसके अलावा सरकारी मशीनरी की लेटलतीफी का आलम यह है कि उत्तर प्रदेश में ठंड बीतने के बाद भी बच्चों को स्वेटर और जूते-मोजे नहीं बांटे जा सके.
शिक्षा के अधिकार को लेकर एक नागरिक संगठन आरटीआई फोरम की मानें तो 15 लाख सरकारी और निजी स्कूलों में से केवल आठ फीसदी ही कानून में तय मानकों को पूरा करते हैं. इनका कहना है कि स्कूलों की संख्या में लगातार कमी आई है. साथ ही, शिक्षकों के 13 लाख पद खाली हैं. इसके अलावा करीब 20 फीसदी अप्रशिक्षित शिक्षकों के साथ शिक्षा व्यवस्था को खींचा जा रहा है.
शैक्षणिक गुणवत्ता पर कम जोर
सर्व शिक्षा अभियान के लिए जारी रकम का तीन-चौथाई से भी ज्यादा हिस्सा शिक्षकों के वेतन और मकान सहित बाकी ढांचे को खड़ा करने में खर्च किया जा रहा है. साल 2017-18 में आवंटित रकम में इनकी हिस्सेदारी 76 फीसदी रही थी. दूसरी ओर शिक्षक प्रशिक्षण, नवाचार, पुस्तकालय जैसी गुणवत्ता संबंधी मदों पर केवल 10 फीसदी रकम खर्च की गई. इसके अलावा किताबों, यूनिफॉर्म और समावेशी शिक्षा के उठाए जाने वाले कदमों के लिए यह आकंड़ा 14 फीसदी ही था.
कानून के प्रावधानों के मुताबिक शिक्षकों को जनगणना, आपदा राहत और चुनावी कार्यों के अलावा और किसी गैर-शैक्षणिक गतिविधियों में नहीं लगाया जा सकता. इसके बाद भी शिक्षकों की भारी कमी के बीच उन्हें प्रशासनिक कार्यों की जिम्मेदारी दे दी जाती है. मसलन सीएजी ने उत्तराखंड में पाया कि 268 शिक्षकों को क्लस्टर रिसोर्स कोऑर्डिनेटर (सीआरसी) की जिम्मेदारी संभालनी पड़ रही है.
स्कूल प्रबंधन समति को लेकर अनियमितता और लेटलतीफी
इस कानून के मकसदों को पूरा करने के लिए स्थानीय समाज को साथ लाने की भी बात कही गई है. आरटीआई कानून के मुताबिक इसके लागू होने के छह महीने के अंदर स्कूल प्रबंधन समिति (एसएमसी) का गठन किया जाना था. इस समिति का मकसद स्कूल और स्थानीय समुदाय के बीच एक पुल का काम करना है. साथ ही, इसे स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं को लेकर भी सचेत रहने की जिम्मेदारी दी गई है. लेकिन, सीएजी द्वारा 12 राज्यों के ऑडिट में पाया गया कि अलग-अलग राज्यों में तीन से 88 फीसदी स्कूलों में इसे गठित नहीं किया जा सका है. इसके अलावा जिन स्कूलों में इसे गठित किया गया है, वहां भी स्कूल के विकास को लेकर होने वाली बैठकों में अनियमितता पाई गई है.


राज्यों में स्कूल प्रबंधन कमिटी की स्थिति | साभार : सीएजी
राज्यों में स्कूल प्रबंधन कमिटी की स्थिति | साभार : सीएजी

निजी स्कूलों में नामांकन को लेकर समस्याएं
आरटीआई कानून के मुताबिक निजी स्कूलों में गरीब परिवार के बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटें आरक्षित रखने का प्रावधान है. निजी स्कूलों में सीमित सीट और नामांकन के लिए मारामारी के बीच किसी गरीब के लिए अपने बच्चों के कदम इनके दरवाजे के अंदर करवाना टेढ़ी खीर जैसा होता है. इस साल डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन (डीपीआई) के पास 1.58 लाख सीटों के लिए 2.28 लाख आवेदन आए हैं.
उधर, गरीब बच्चों को नामांकन देने के बाद भी निजी स्कूलों द्वारा सरकार से वित्तीय मदद हासिल करने में समस्याओं का सामना करने की बात सामने आई है. महाराष्ट्र स्थित फेडरेशन ऑफ स्कूल एसोसिएशन ने आरटीआई फंड हासिल न होने की वजह से दिल्ली के रामलीला मैदान और मुंबई के आजाद मैदान में विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया है. फेडरेशन का कहना है कि स्कूलों का करीब 12,000 करोड़ रुपये सरकार के ऊपर बकाया है. दूसरी तरफ, सरकार की ओर से वित्तीय मदद न मिलने से नाराज उत्तर प्रदेश के करीब 2,000 निजी स्कूलों ने 2018-19 शैक्षणिक सत्र के लिए आरटीई कोटे से नामांकन न करने की बात कही है.
निजी स्कूलों में आरक्षित कोटे से आने वाले बच्चों के साथ भेदभाव के साथ किताबों, यूनिफॉर्म और अन्य सुविधाओं के लिए पैसे वसूलने की शिकायतें भी सामने आई हैं. कर्नाटक स्थित बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने इस बारे में कई शिकायतें मिलने के बाद निजी स्कूलों को चेतावनी जारी की है. आयोग ने आरटीआई कानून के प्रावधानों का उल्लंघन किए जाने पर सख्त कार्रवाई की बात कही है. उधर, स्कूलों का कहना है कि उन्हें सामान्य और आरक्षित कोटे से आने वाले बच्चों को मुफ्त सुविधाएं उपलब्ध कराने में परेशानी का सामना करना पड़ता है. साथ ही, स्कूलों ने आयोग पर उत्पीड़न करने का भी आरोप लगाया है.
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सत्याग्रह से साभार 

Friday, February 16, 2018

एक और बच्चा मर गया


सुदीप बनर्जी

एक और बच्चा मर गया
गिनती में शुमार हुआ
तमाम मेहनत से सीखे ककहरे
पहाड़े गुना भाग धरे रह गए

शहर के स्कूल से जाकर
सैकड़ों नंग-धडंग बच्चों के
रक्खे-फ़ना शरीक़, गो कि थोड़ा शरमाता हुआ
आख़िरकार आदिवासी बन गया
कोई तारा नक्षत्र नहीं बना फलक पर

इतनी चिताएँ जल रही है
पर रोशनी नहीं, थोड़ी गर्मी भी नहीं
इतने हो रहे ज़मींदोज़ पर भूकंप नहीं

ईश्वर होता आदमक़द तो
ज़रूर उदास होता
यह सब देखकर
सिर झुकाए चला गया होता

पर आदमक़द आदमी भी तो नहीं
ईश्वर का क्या गिला करें

सिर्फ़ शायरों की मजबूरी है
दुआएँ माँगना या थाप देना
इस निरीश्वर बिखरे को
बिलावजह वतन को

जंगलों को चीरकर
आते नहीं दीखते कोई धनुर्धारी
आकाश रेखा पर कोई नहीं गदाधर

केवल उनके इंतज़ार में गाफ़िल
मैं ख़ुद को नहीं बख्शूँगा सुकून
इस मुल्क के बच्चों के वुजूद से

बेख़बर, बेजबाँ ।

साभार - janjwar

Saturday, January 6, 2018

शिक्षा अधिकार कानून के सात साल बाद


शिक्षा अधिकार कानून के सात साल बाद



जावेद अनीस

भारत के दोनों सदनों द्वारा पारित ऐसा कानून जो देश के 6 से 14 के सभी बच्चों को निःशुल्क,अनिवार्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की बात करता है उसके सात साल पूरे होने के बाद उपलब्धियों के बारे में सोचने को बैठें तो पता चलता है कि यह कानून अपना असर छोड़ने में नाकाम रहा है और अब खतरा इसे लागू करने वाले सरकारी स्कूलों के आस्तित्व पर ही आ चूका है. भारत के बच्चों केर लिये बनाया गया एक महत्वपूर्ण कानून लापरवाही और गड़बड़ियों का शिकार बन कर रह गया है, सात साल पहले शिक्षा के अधिकार कानून का आना भारत में एक बड़ा कदम था. लेकिन कुछ अपनी खामियों और इसके क्रियान्वयन में सरकारों की उदासीनता के चलते इसके अपेक्षित परिणाम नहीं मिले सके, इसको लेलर उम्मीदें टूटी हैं और आशंकायें सही साबित हुई हैं. अगर आरटीई अपने उद्देश्योँ को पूरा कर पाने में असफल साबित हो रहा है तो इसके पीछे समाज और सरकार दोनों जिम्मेदार हैं. हो भी हो आरटीई के निष्प्रभावी होने का खामियाजा पीढ़ियोंको भुगतना पड़ सकता है.

सात साल बाद की हकीकत

शिक्षा अधिकार कानून लागू होने के सात बाद हमारे सामने  चुनौतियों के एक लंबी  सूची है.इस दौरान  भौतिक मानकों जैसे स्कूलों की अधोसरंचना, छात्र-शिक्षक अनुपात आदि को लेकर स्कूलों में सुधार देखने को मिलता है लेकिन पर्याप्त और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी, उनसे दूसरे काम कराया जाना, नामांकन के बाद स्कूलों में बच्चों की रूकावट , बीच में पढाई छोड़ने देने का बढ़ता दर और संसाधनों की कमी जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं. लेकिन सबसे चिंताजनक बात इस दौरान शिक्षा की गुणवत्ता और सावर्जनिक शिक्षा व्यवस्था पर भरोसे में कमी का होना है. नीति आयोग के मुताबिक़  वर्ष 2010-2014 के दौरान सरकारी स्कूलों की संख्या में 13,500 की वृद्धि हुई है लेकिन इनमें दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या 1.13 करोड़ घटी है. दूसरी तरफ निजी स्कूलों में दाखिला लेने वालों की संख्या 1.85 करोड़ बढ़ी है.
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने जुलाई 2017 में  संसद में पेश अपनी रिपोर्ट पेश है, रिपोर्ट में शिक्षा अधिकार कानून के क्रियान्वयन को लेकर कई गंभीर सवाल उठाये गये हैं रिपोर्ट के अनुसार  अधिकतर राज्य सरकारोँ के पास यह तक जानकारी ही नहीं है कि उनके राज्य में ज़ीरो से लेकर 14 साल की उम्र के बच्चोँ की संख्या कितनी है और उनमें से कौन स्कूल जा रहा है और कितने बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं.

देश भर के स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है और बड़ी संख्या में बड़ी संख्या में स्कूल एक  शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं इन सबका असर शिक्षा की गुणवत्ता और स्कूलों में बच्चों की रूकावट पर देखने को मिल रहा है.

विश्व बैंक की वर्ल्ड डेवेलपमेंट रिपोर्ट 2018- लर्निंग टू रियलाइज एजूकेशंस प्रॉमिस में दुनिया के उन 12 देशों की सूची जारी की गई है जहां की शिक्षा व्यवस्था सबसे बदतर है, इस सूची में भारत का स्थान दूसरे नंबर है. रिपोर्ट के अनुसार कई सालों तक स्कूलों में पढ़ने के बावजूद  लाखों बच्चे पढ़-लिख नहीं पाते हैं, वे गणित के आसान सवाल भी नहीं कर पाते हैं. ज्ञान का यह संकट सामाजिक खाई को और बड़ा कर रहा है. और इससे गरीबी को मिटाने और समाज में समृद्धि लाने का सपना और दूर होता जा रहा है .

चूक कहाँ पर हुई है ?

लचर क्रियान्वयन

शिक्षा अधिकार कानून को लागू करने में भी भारी कोताही देखने को मिल रही है, राइट टू एजुकेशन फोरम की रिपोर्ट के बताती है कि सात साल बाद केवल  9.08 प्रतिशत स्कूलों में ही इस कानून के प्रावधान पूरी तरह से लागू हो पाए हैं. इस साल जुलाई में कैग द्वारा संसद में पेश की गयी रिपोर्ट के अनुसार आरटीई को लागू करने वाली संस्थाओ और राज्य सरकारों द्वारा  लगातार लापरवाही बरती गयी है . केंद्र सरकार द्वारा इस  कानून के क्रियान्वयन पर खर्च का अनुमान तैयार करना था लेकिन इसे  अभी तक पूरा नहीं किया गया है . इसलिए  प्रावधान होने के बावजूद आरटीई के  लिए कोई अलग बजट नहीं रखा गया  बल्कि इसे सर्व शिक्षा अभियान के बजट में ही शामिल कर लिया गया, रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया है की कैसे इसके तहत राज्यों को आवंटित राशि खर्च ही नहीं हो पाती है रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2010-11 से 2015-16 के बीच फंड के इस्तेमाल में 21 से 41 फीसदी तक की कमी दर्ज की गई है और राज्य सरकारें कानून लागू होने के बाद के छह सालों में उपलब्ध कराए गए कुल फंड में से 87000 करोड़ रुपये का इस्तेमाल ही नहीं कर पाई हैं.

पच्चीस प्रतिशत का लोचा

शिक्षा अधिकार कानून अपने मूल स्वरूप में ही दोहरी शिक्षा व्यवस्था को स्वीकार करती है. जबकि इसे तोड़ने की जरूरत थी. निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान मध्यवर्ग के बाद गरीब और वंचित वर्गों के लोगों का सरकाई स्कूलों के प्रति भरोसा तोड़ने वाला कदम साबित हो रहा है. यह प्रावधान एक तरह से शिक्षा के बाजारीकरण को बढ़ावा देता है और  इससे सरकारी शालाओं में पढ़ने वालों का भी पूरा जोर प्राइवेट स्कूलों की ओर हो जाता है. जो परिवार थोड़े-बहुत सक्षम हैं वे अपने बच्चों को पहले से ही प्राइवेट स्कूलों में भेज रहे हैं लेकिन जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति कमजोर हैं  कानून द्वारा उन्हें भी इस ओर प्रेरित किया जा रहा है. लोगों का सरकारी स्कूलों के प्रति विश्वाश लगातार कम होता जा रहा है जिसके चलते साल दर साल सरकारी स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या घटती जा रही है. ऐसा नहीं है कि इससे पहले अभिभावकों में निजी स्कूलों के प्रति आकर्षण नहीं था. पिछले लम्बे समय से निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना स्टेटस सिम्बल बन चुका है लेकिन उक्त प्रावधान का सबसे बड़ा सन्देश यह जा रहा है कि सरकारी स्कूलों से अच्छी शिक्षा निजी स्कूलों में दी जा रही है इसलिए सरकार भी बच्चों को वहां भेजने को प्रोत्साहित कर रही है। इस प्रकार पहले से कमतर शिक्षा का आरोप झेल रहे सरकारी स्कूलों में स्वयं सरकार ने कमतरी की मुहर लगा दी है. यह प्रावधान सरकारी शिक्षा के लिए भस्मासुर बन चुका है. यह एक गंभीर चुनौती है जिसपर ध्यान देने की जरूरत है . क्यूंकि अगर सावर्जनिक शिक्षा व्यवस्था ही धवस्त हो गयी तो फिर शिक्षा का अधिकार की कोई  प्रासंगिकता ही नहीं बचेगी.
शाला और समुदाय के बीच बढ़ती खायी

अच्छी शिक्षा के लिए जरूरी है है विद्यालय और समुदाय में सहयोग की स्थिति बने और दोनों एक दुसरे के प्रति अपने अपने कर्तव्यों का निर्वाह करे. लेकिन इधर समुदाय और स्कूलों के बीच संवादहीनता या आरोप प्रत्यारोप की स्थिति बन चुकी है. पहले सरकारी स्कूलों के साथ समुदाय अपने आप को जोड़ कर देखता था एक तरह की ओनरशिप की भावना थी. लेकिन विभिन्न कारणों से अब यह क्रम टूटा है और अब स्कूल सामुदायिक जीवन का हिस्सा नहीं हैं.

आरटीई के तहत स्कूलों के प्रबंधन में स्थानीय निकायों और स्कूल प्रबंध समितियों को बड़ी भूमिका दी गयी है लेकिन वे भी जानकारी के आभाव और स्थानीय राजनीति के कारण  अपना असर छोड़ने  में नाकाम साबित हो रहे हैं. ज्यादातर स्कूल प्रबंध समितियां पर्याप्त जानकारी और प्रशिक्षण के अभाव में निष्क्रिय हैं

शिक्षकों की कमी और उनसे गैर-शिक्षण काम कराया जाना

लोकसभा में 5 दिसंबर 2016 को पेश किए आंकड़ों के मुताबिक़ सरकारी प्राथमिक स्कूलों में 18 प्रतिशत और सरकारी माध्यमिक स्कूलों में 15 प्रतिशत शिक्षकों के पद रिक्त हैं. बढ़ी संख्या में स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं.

दूसरी तरफ शिक्षकों से  हर वर्ष औसतन सौ दिन गैर-शैक्षणिक कार्यों कराया जाता है उनका अधिकांश समय विभागीय सूचनाएं,मध्याह्न भोजन की व्यवस्था संबंधी कार्य, निर्माण कार्य आदि में भी खपा दिया जाता है. इससे शिक्षा की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर देखने को मिला है. बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिये जरूरी है कि मानको के हिसाब से पर्याप्त और पूर्ण प्रशिक्षत शिक्षकों की नियुक्ति हो और उनसे कोई भी गैर शिक्षण काम ना कराया जाए जिससे शिक्षक बच्चों के साथ लगातार जुड़े रहे और हर बच्चे पर ध्यान दे सकें.

शिक्षा पर कम खर्च

शिक्षा अधिकार कानून लागू होने के बावजूद केंद्र और राज्य सरकारों के लिए शिक्षा प्राथमिकता नहीं बन सकी है.  सेंटर फॉर बजट एंड गवर्नेंस अकाउन्टबिलिटी’ (सीबीजीए) के अनुसार वित्त वर्ष 2016-17  के दौरान स्कूल शिक्षा पर केंद्रीय सरकार का कुल शिक्षा खर्च भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 2.68 फीसदी था. असोसिएटेड चैंबर आफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री(एसोचैम) की रिपोर्ट के अनुसार भारत शिक्षा पर अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 3.83 से आगे नहीं बढ़ सकी  है जो कि अपर्याप्त  है रिपोर्ट में कहा किया गया है कि यदि भारत ने अपनी शिक्षा व्यवस्था में बुनियादी  बदलाव नहीं किए तो विकसित देशों की बराबरी करने में कम से कम छह पीढ़ियां (126 साल) लग सकते हैं रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि भारत को संयुक्त राष्ट्र द्वारा सुझाए गए खर्च के स्तर को हासिल करना चाहिए.संयुक्त राष्ट्र की सिफारिश के मुताबिक हर देश को अपनी जीडीपी का कम से कम छह फीसदी हिस्सा शिक्षा पर खर्च करना चाहिए.


 निजीकरण की पैरोकारी

पिछले दिनों मध्य प्रदेश जैसे राज्य के स्कूल शिक्षा मंत्री विजय शाह का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें प्राचार्यो की एक कार्यशाला में मंत्री जी झूमते हुए कहते नजर आ रहे हैं कि वे निजी कंपनियों से बात कर रहे हैं और जो कंपनी ज्यादा पैसा देगी उसके नाम स्कूल कर देंगे इससे सरकार का पैसा बचेगा. वायरल हुए विडियो में उनके भाषण के अंश कुछ इस तरह से हैं हम करेंगे बात अल्ट्राटेक से, हम करेंगे बात सीपीसीयू और न जाने, कौन-कौन से... अगर आइडिया कंपनी हमें पैसा देती है तो हम स्कूल का नाम लिख देंगे कि आइडिया आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सागर.

आरटीई लागू होने के बाद से सरकारी स्कूलों के निजीकरण की चर्चायें बढ़ती जा रही है, और अब विजय शाह जैसे स्कूल शिक्षा मंत्री इसकी खुले तौर पर वकालत भी करने लगे हैं . इधर सरकारी स्कूलों को कंपनियों को ठेके पर देने या पीपीपी मोड पर चलाने की चर्चायें जोरों पर हैं, कम छात्र संख्या के बहाने स्कूलों को बड़ी तादाद में बंद किया जा रहा है. प्राइवेट लाबी और नीति निर्धारकों पूरा जोर इस बात पर है की किसी तरह से सरकारी शिक्षा व्यवस्था को नाकारा साबित कर दिया जाए. इस कवायद के पीछे मंशा यह है कि इस बहाने सरकारें सबको शिक्षा देने के अपने संवैधनिक दायित्व से पीछे हट सकें और  और बचे खुचे  सावर्जनिक  शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से ध्वस्त करते हुए इसके पूरी सम्पूर्ण  निजीकरण के लिये रास्ता बनाया जा सके.

अब सामने सबसे खराब विकल्प को पेश किया जा रहा है

शिक्षा को निजीकरण सबसे खराब विकल्प है और यह कोई हल नहीं है. इससे भारत में  शिक्षा के बीच खाई और बढ़ेगी और गरीब और वंचित समुदायों के बच्चे  शिक्षा से वंचित हो जायेंगें. अपनी सारी सीमाओं के बावजूद आरटीई एक ऐसा कानून है जो भारत के 6 से चौदह साल के हर बच्चे की जिम्मेदारी राज्य पर डालता है. जरूरत इस कानून के दायरे को समेटने नहीं बल्कि इसे बढ़ाने की है. आधे अधूरे और भ्रामक शिक्षा की ग्यारंटी से बात नहीं बनने वाली है पहले तो इस कानून की जो सीमायें हैं उन्हें दूर किया जाए जिससे यह वास्तविक अर्थों में इस देश के सभी बच्चों को सामान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने वाला अधनियम बन सके. फिर इसे  ठीक से लागू किया जाये.


जरूरत इस बात की भी है कि समाज द्वारा कानून की इस भावना को ग्रहण करते हुए इस पर अपना दावा जताया जाए इसे और बेहतर बनाने की मांग की जाये. जब तक नागिरक इस कानून को अधिकार के रूप में ग्रहण नहीं करेंगें तब तक सरकारों को  इसे लागू करने के पूरी तरह से जवाबदेह नहीं बनाया जा सकेगा और वे निजीकरण के रास्ते पर आगे बढ़ जायेंगीं .