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Friday, August 4, 2017

#AFailureTeacher की फेसबुक पोस्ट




वंचित समुदायों के बच्चों की शिक्षा में आज भी सरकारी स्कूल के टीचरों की महत्वपूर्ण भूमिका है . तमाम विपरीत परिस्थितयों के बावजूद आज भी वे दूर-दराज के गावों से लेकर शहरों की झुग्गी बस्तियों में बच्चों को बहुत लगन से बढाते हुए मिल जायेंगें. बच्चे और बड़े उन्हें मास्साब  या बहिन के नाम से पुकारते हैं  हैं. ऐसी ही एक टीचर हैं मधूलिका चौधरी जो बहराइच के एक सरकारी स्कूल में पढ़ाती हैं. और पढ़ाते-पढ़ाते बच्चों को पढ़ती भी रहती हैं, फिर इत्मीनान से अपने अनुभव शब्दों में पिरोती हैं. इन्होंने हाल ही में अपनी फेसबुक वॉल पर एक पोस्ट लिखी. उनकी इस पोस्ट को हम यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं.


रकारी स्कूल में पढ़ाना सिर्फ पढ़ाना भर नहीं होता. यह पढ़ना होता है हालात को, जिनमें हमारे बच्चे रह रहे हैं, जी रहे हैं. एक ही क्लास में एक को बीस तक पहाड़ा याद है, दूसरे को गिनती की समझ तक नही है. मानसिक स्तर पर देखा जाए तो हर कक्षा में कम से कम पांच ग्रुप बनेंगे.
बच्चों पर हाथ उठाना बिलकुल अच्छा नहीं लगता, चाहती हूं कि वो स्कूल से डरें नहीं, स्कूल को प्यार करें. मगर कैसे? मैं उनको गिनती सिखाने की कोशिश करती हूं, वो खिड़की से झूल रहे होते हैं. मैं वर्णमाला की पहचान कराना चाहती हूं वो पेंसिल से कटोरे पर संगीत की प्रैक्टिस में लगे हैं. मैं चाहती हूं वो फूल, पत्ती, तितली, बादल बनाएं पर कहां? न कागज़ है, न रंग है. रंग तो ख़ैर कहीं नहीं है.
चबी चीक्स, डिम्पल चिन, रोज़ी लिप्सयह सब परी कथा की बातें हैं. इनके कर्ली हेयर में सालों से तेल नहीं पड़ा, बुरी तरह उलझे हुए हैं. पिछले साल की यूनिफॉर्म में एक भी बटन सलामत नहीं है. इनकी आंखों में हल्का पीलापन है. कई बार ये कंजेक्टिवाइटिस का शिकार भी दिखती हैं. धान रोपने की वजह से पैर की उंगलियों में सड़न हो गई है. दर्द भी है. खेल-खेल में ये अक्सर चोटिल हो जाती हैं.
मैं उनके साथ सख्त होने की कोशिश करना चाहती हूं लेकिन असफ़ल रहती हूं. उनके साथ तो ज़िन्दगी ही इतनी सख़्त है. स्कूल का हैण्डपम्प एक गड्ढे में है, जिसमें बरसात का पानी भरा है. उस नल का पानी पीने का जी नहीं करता लेकिन उन बच्चों के बीच घर से ले जाई गई बोतल का पानी पीना मुझे भीतर तक अश्लील दिखने के अहसास से भर देता है.
जिस बच्चे को कॉपी न होने के कारण डपट कर पिता को बुला कर लाने को कहती हूं उसके पिता ही नही हैं. मैं सन्न हूं.
मैडम बप्पा कहिन हैं पइसा होइ तब आधार कार्ड बनवाय देहैं.
बप्पा क्या काम करते हैं गोलू? मैं बेख्याली में पूछती हूं.
का करैं? कमवै नाय लागत है…”
पिता इस समय खाली हाथ हैं. पैसे से भी और काम से भी.
कुछ बच्चे क्रूर शब्दों में कहूं तो मन्द बुद्धि हैं. ये अतिरिक्त ध्यान चाहते हैं. नही संभव हो पाता. ये प्यार की भाषा समझते हैं बस. इसलिए हर जगह पीछे-पीछे हैं. पढ़ाने में बाधा होती है तो कभी-कभी डांट देती हूं.
अपनी क्लास में जाओ!
ये रो पड़ते हैं. मैं शर्मिंदगी के अहसास से भर उठती हूं अपने जंगलीपन पर. इनको मनाती हूं. ये फिर पहले की तरह मेरे पीछे लग जाते हैं. ये अक्सर कॉपी-कलम नहीं लाते. मुझे कोफ़्त होती है. कैसे पढ़ाऊं? कैसे लिखना सिखाऊं? लेकिन अक्सर ये कच्चे-पक्के अमरूद लाते हैं मेरे लिए. कभी-कभी बेर भी. बड़ी मुश्किल से हासिल इन मौसमी फलों में से वो एक भी अपने लिए बचाना नहीं चाहते.
इनके आई.ए.एस, डॉक्टर या इंजीनियर बनने का ख़्वाब मैं किन आंखों से देखूं. हर रोज़ बस एक दुआ पढ़कर फूंकती हूं कि ईश्वर ऐसी मुसीबत में कभी न डाले कि तुम्हारी यह निश्छलता खो जाए. इतने ताकतवर बनो कि हर तकलीफ़ तुम्हारे आगे घुटने टेक दे. बस यही एक दुआ.
#AFailureTeacher


Sunday, July 30, 2017

कल्याणकारी योजनाओं में आधार का पेंच


जावेद अनीस



2007 में शुरू की गई मिड डे मील भारत की सबसे सफल सामाजिक नीतियों में से एक है, जिससे होने वाले लाभों को हम स्कूलों में बच्चों कि उपस्थिति बाल पोषण के रूप में देख सकते हैं. आज मिड डे मील स्कीम के तहत देश में 12 लाख स्कूलों के 12 करोड़ बच्चों को दोपहर का खाना दिया जाता है. इस योजना पर सरकार सालाना करीब साढ़े नौ हजार करोड़ रुपये  खर्च करती है. 28 फरवरी, 2017 को मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा  मिड डे मील से जुड़ी एक अधिसूचना जारी की गयी जिसमें कहा गया था कि मिड डे मील योजना का लाभ लेने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य होगा ,जिनके पास आधार नंबर नहीं है उन्हें आधार कार्ड बनवाने के लिए 30 जून तक का समय है उसके बाद आधार कार्ड नहीं होने की स्थिति में मिड डे मील लेने के लिए आधार कार्ड की रजिस्ट्रेशन स्लिप दिखानी होगी. अपने इस कदम को लेकर मंत्रालय का तर्क है कि कि आधार कार्ड कि अनिवार्यता से इस योजना के क्रियान्वयन में पारदर्शिता आएगी साथ ही इसका लाभ लेने वालों को आसानी होगी. इस अधिसूचना  पर  हंगामा  होने के बाद सरकार  द्वारा एक  प्रेस विज्ञप्ति जारी किया गया जिसमें कहा गया कि यह सुनिश्चित किया गया है कि आधार न होने के कारण किसी को भी लाभ से वंचित न किया जाए.  अगर किसी  बच्चे के पास आधार नहीं है तो अधिकारी उसे आधार नामांकन सुविधा उपलब्ध करायेंगें जब तक ऐसा न हो लाभार्थियों को मिल रहे लाभ जारी रहेंगे”.

हालांकि  बाद में जारी प्रेस विज्ञप्ति में नियमों में किसी किस्म की ढील नहीं दी गई है यहाँ बस शब्दों कि हेरा फेरी ही कि गयी है, प्रेस विज्ञप्ति के बाद भी  28 फरवरी, 2017 को जारी की गई अधिसूचना का सारा ज्यों का तयों बना हुआ है  जिसमें कहा गया था कि कि देश के 14 करोड़ बच्चों को आधार कार्ड उपलब्ध कराने पर ही भोजन कराया जाएगा और अगर उनके पास आधार कार्ड नहीं है तो उसे बनवाना ही पड़ेगा.

जानकार बताते हैं कि मिड डे मील जैसी योजनाओं में आधार कि अनिवार्यता का नकारात्मक असर पड़ सकता है और इससे  देश के सबसे गरीब और जरूरतमंद प्रभावित होंगें. योजना में "फर्जीवाड़ा रोकने के  लिये भी यह कोई प्रभावकारी तरीका  नहीं है. इसके लिये सरकार को आधार अनिवार्य करने के बजाये योजनाओं को बेहतर तरीके से लागू करने पर ध्यान देना चाहिए चाहिए जिससे इनमें लोगों की भागेदारी बढ़े, दुनिया भर के अनुभव बताते हैं कि योजनाओं को लागू करने में लोगों कि सहभागिता और जन निगरानी  बहुत अच्छे उपाय साबित हुए हैं इससे गड़बड़ी होंने की गुंजाइश ना के बराबर रह जाती है .

ल्याणकारी योजनाओं में आधार कि अनिवार्यता को  को लेकर कई गंभीर सवाल हैं , एक तो  इसमें फिंगर प्रिंट मैच करने कि समस्याएँ है और दूसरी इस बात कि आशंका है कि आधार कि बहाने सरकार लोगों की निगरानी करना चाहती है , निजता  को लेकर भी सवाल हैं पिछले दिनों आधार कार्ड बनाने वाली एजेंसी  द्वारा महेंद्र  सिंह धोनी जैसे हाई प्रोफाइल क्रिकेटर कि निजी जानकारी सोशल नेटवर्किंग साइट पर लीक कर देने का मामला सामने आ चूका है ऐसे में आधार कार्ड की वजह से देश के करोड़ों लोगों की निजता कैसे बनी रहेगे इसकी गया ग्यारंटी है, आधार कार्ड का पूरा डाटाबेस कोई भी अपने फायदे के लिए उपयोग कर सकता है या उसकी जानकारी लीक कर सकता है. निजता और निगरानी का मसाला  लोगों के मौलिक अधिकारों से जुड़ता है  शायद इसी वजह से आधार नंबर को अनिवार्य बनाए जाने को लेकर कई जानकार और सामाजिक कार्यकर्ता  इसका विरोध कर रहे हैं उनका कहना है कि सबकुछ आधार से जोड़ देने से  आधार कार्ड धारकों की निजी जानकारियां चुराने, आर्थिक घपले करने, पहचान का दुरुपयोग करने और तमाम सूचनाओं का ग़लत इस्तेमाल करने का ख़तरा बढ़ जाएगा. मिड डे मील के मामले में तो मसला बाल अधिकारों से भी जुड़ता है इस तरह से सरकार देश के बच्चों को एक तरह से बच्चों को जबरदस्ती एक ऐसे काम के लिये  मजबूर कर रही है जिसमें  इन नाबालिगों कि कोई रज़ामंदी नहीं है.

सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के लिए आधार की अनिवार्यता को लेकर हमेशा से ही  विवाद रहा है, आधार की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकायें कई साल से सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है इस बीच  अदालत द्वारा समय-समय पर अंतरिम निर्णय भी सुनाये गए हैंजैसे 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि रसोई गैस सब्सिडी जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य नहीं किया जा सकता इसी तरह से  2015 में  भी अदालत ने मनरेगा, पेंशन, भविष्य निधि, प्रधानमंत्री जनधन योजना आदि को आधार कार्ड से जोड़ने की इजाजत तो दी, पर साथ में ही यह भी कहा कि यह स्वैच्छिक होना चाहिए, अनिवार्य नहीं. इस बार भी इसके बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक बार फिर स्पष्ट किया गया है कि सरकार और उसकी एजेंसियां समाज कल्याण योजनाओं के लिए आधार कार्ड अनिवार्य नहीं कर सकती है और सिर्फ आधार न होने की वजह से किसी व्यक्ति को किसी  भी सरकारी योजना के फायदे से महरूम नहीं रखा जा सकता है .लेकिन इन सबके बावजूद  बावजूद सरकार लगातार आधार की अनिवार्यता बढ़ाती जा रही है मध्यान्ह भोजन योजना इस सूची में एक नयी कड़ी है जिसे रोज़ी रोटी अधिकार अभियान सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का उल्लंघन बताया है जिसमें कोर्ट ने कहा था कि आधार कार्ड लोगों को मिलने वाली किसी भी सेवा के लिए अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता. अभियान का कहना है कि कि मिड डे मील भारतीय बच्चों का एक महत्वपूर्ण अधिकार है, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत क़ानूनी तौर पर और साथ ही साथ राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत लागू किया गया है, सरकार के इस कदम को मिड डे मील योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं में रुकावट पैदा होगी.

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग  की पूर्व अध्यक्ष शांता सिंहा द्वारा सरकारी योजनाओं के लाभ के लिए आधार को अनिवार्य पर अंतरिम रोक लगाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कि गयी थी जिसमें केंद्र सरकार द्वारा कल्याणकारी योजनाओं में आधार को अनिवार्य करने का पर अंतरिम रोक लगाने कि मांग कि गयी है . इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 27 जून को  सुनवाई करेगा, सरकार ने सरकारी योजनाओं में आधार कि अनिवार्यता के लिये 30 जून की डेडलाइन थ कर रखी है इसलिए इसलिए 27 जून कि सुनवाई बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है. हालांकि केन्द्र सरकार अपने रुख पर अड़ा हुआ है  उसने तो  27 जून को  याचिका पर होने वाली  सुनवाई का भी विरोध करते हुए कहा है कि 30 जून की समय सीमा को अब और आगे नहीं बढ़ाया जाएगा.

स बीच राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा राज्य सरकार के राशन के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता लागू करने के आदेश पर रोक लगा देने से उम्मीदें बढ़ी हैं दरअसल राजस्थान सरकार ने 24 मार्च 2017 को सूबे  में राशन सामग्री के वितरण के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य कर दिया था . उम्मीद है राजस्थान सरकार को मिले इस झटके से दिल्ली सरकार कोई सबक सीखेगी.



कुपोषण पर “श्वेत पत्र” का क्या हुआ ?


जावेद अनीस



मध्य प्रदेश के लिये कुपोषण एक ऐसा कलंकहै जो पानी कि तरह पैसा बहा देने के बाद भी नहीं धुला है पिछले साल करीब एक दशक बाद  कुपोषण की भयावह स्थिति एक बार फिर सुर्खियाँ बनीं थीं. विपक्षी दलों ने इसे राज्य सरकार की लापरवाही, भ्रष्टाचार और असफलता बताकर घेरा था राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी राज्य सरकार को नोटिस जारी कर इस मामले में जवाब माँगा था. जिसके बाद मध्यप्रदेश सरकार ने कुपोषण की स्थितिको लेकर श्वेत पत्र लाने की घोषणा कर दी थी. लेकिन अब ऐसा लगता है यह भी महज एक घोषणा ही थी  और श्वेत पत्र का शिगूफा ध्यान बटाने और मुददे को शांत करने के लिये छोड़ा गया था.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार के लोग यह दवा करते नहीं थकते हैं कि प्रदेश तरक्की की राह पर चलते हुए बीमारू राज्य के तमगे को काफी पीछे छोड़ चूका है, बताया जाता है कि राज्य का जीडीपी 10 प्रतिशत से ऊपर है और कृषि विकास दर 20 प्रतिशत को पार कर गई है. लेकिन अगर मानव विकास सूचकांकों को देखें तो आंकड़े कुछ और ही कहानी बयान कर रहे हैं. जमीनी हालत देखें तो मध्यप्रदेश आज भी बीमारू राज्य की श्रेणी में खड़ा नजर आता है आंकड़े चुगली कर रहे हैं कि पिछले 10 सालों में सूबे में करीब 11 लाख गरीब बढ़े हैं. पिछले साल एम.डी.जी. की रिपोर्ट आयी थी जिसके अनुसार मानव विकास सूचकांकों में प्रदेश के पिछड़े होने का प्रमुख कारण सरकार द्वारा  सामाजिक क्षेत्र कि लगातार की गयी अनदेखी है राज्य सरकार स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और अन्य सामाजिक क्षेत्रों में कम निवेश करती है, रिपोर्ट के अनुसार म.प्र सामाजिक क्षेत्रों में अपने बजट का 39 प्रतिशत हिस्सा ही खर्च करता है जबकि इसका  राष्ट्रीय औसत 42 प्रतिशत है.

शायद यही वजह है कि आज भी मध्यप्रदेश शिशु मृत्यु दर में पहले और कुपोषण में दूसरे नंबर पर बना हुआ है. कुपोषण का सबसे ज्यादा प्रभाव आदिवासी बाहुल्य जिलों में देखने को मिलता है इसकी वजह यह है कि आदिवासी समाज पर ही आधुनिक विकास कि मार सबसे ज्यादा पड़ती है वे लगातार अपने परम्परागत संसाधनों से दूर होते गए हैं. देश के अन्य भागों कि तरह मध्यप्रदेश के आदिवासी भी अपने इलाके में आ रही भीमकाय विकास परियोजनाओं, बड़े बांधों  और वन्य-प्राणी अभ्यारण्यों कि रिजर्बों की वजह से व्यापक रूप से विस्थापन का दंश झेलने को मजबूर हुए हैं और लगातार गरीबी व भूख के दलदल में फंसते गये हैं. भारत सरकार द्वारा जारी ‘‘रिर्पोट आफ द हाई लेबल कमेटी आन सोशियो इकोनामिक, हैल्थ एंड एजुकेशनल स्टेटस आफ ट्राइबल कम्यूनिटी’’ 2014 के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर आदिवसी समुदाय में शिशु मृत्यु दर 88 है जबकि मध्यप्रदेश में यह दर 113 है, इसी तरह से राष्ट्रीय स्तर पर 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 129 है वही प्रदेश में यह दर 175 है, आदिवासी समुदाय में टीकाकरण की स्थिति चिंताजनक है. रिर्पोट के अनुसार देश में 12 से 23 माह के बच्चों के टीकाकरण की दर 45.5 है जबकि मध्यप्रदेश में यह दर 24.6 है. 2015 की कैग रिपोर्ट ने जिन आदिवासी बाहुल्य राज्यों की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह लगाये थे उसमें मध्यप्रदेश भी शामिल है. इस रिपोर्ट में मप्र के जनजातीय क्षेत्रों में कुपोषण पर प्रदेश सरकार के प्रयास नाकाफी बताए गए हैं.कैग रिपोर्ट के मुताबिक तेरह जिलों में आंगनवाड़ियों में पोषण आहार के बजट में गड़बडियां पायी गयी थी. रिर्पोट के अनुसार आदिवासी क्षेत्रों की आंगनवाड़ियां सुचारु रुप से संचालित नही हैं और वहां पोषण आहार का वितरण ठीक से नही हो रहा है.

मध्य प्रदेश शिशु मृत्युदर और कुपोषण के मामले  में शीर्ष पर है इसके बावजूद  सूबे का सरकारी अमला इस तल्ख हकीकत को स्वीकार करके उसका हल खोजने के  बजाये आंकड़ों की बाजीगरी या कुतर्कों से  जमीनी स्थिति को झुठलाने में ज्यादा रूचि लेता है पूरा जोर इस बात पर रहता है कि कैसे आंकड़ों के जरिए कुपोषण की स्थिति को कमतर दिखाया जाये. एक हालिया उदाहरण इसी मार्च महीने का है जब विधानसभा में मंत्री अर्चना चिटनीस ने कहा था कि सूबे में हर रोज 80 बच्चे अपनी जान गवां देते हैं लेकिन यह जो मौतें हुई हैं उसमें पहले बच्चे अन्य बीमारियों के शिकार हुये बाद में कुपोषण के. श्योपुर जिले में हुई मौतों के बाद हाईकोर्ट के नोटिस के जवाब में भी ठीक इसी तरह का तर्क दिया था जिसमें शासन ने कोर्ट को बताया था कि श्योपुर जिले में 166 बच्चों की मौत कुपोषण नहीं बल्कि अन्य बीमारी से हुई थी.

मध्यप्रदेश में कुपोषण के आकंड़ों को लेकर बहुत भ्रम की स्थिति है. पिछले साल बच्चों में कुपोषण को लेकर दो तरह के आंकड़े सामने आए थे मध्यप्रदेश सरकार द्वारा जारी जनवरी 2016 के मासिक प्रतिवेदन में बताया गया था कि 17 प्रतिशत बच्चे सामान्य से कम वज़न के हैं जबकि केन्द्र सरकार द्वारा जारी नेशनल फैमली हेल्थ सर्वे-4” के रिर्पोट के अनुसार सूबे के  42.8 प्रतिशत बच्चे कम वज़न के पाये गए. प्रदेश में कुपोषित बच्चों की 'वृद्धि निगरानी' की विश्वसनीयता पर लगातार सवाल खड़े होते रहे हैं यह काम आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के हवाले हैं जमीनी स्तर पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को ऊपर से निर्देश होता है कि हालात चाहे जो भी हों आंगनवाड़ी केंद्रों में  कुपोषित बच्चों की बढ़ी हुई  संख्या सामने नहीं आनी चाहिए.

साल 2005-6 में जारी तीसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में मध्यप्रदेश 60 फीसदी बच्चे काम वजन के पाये गए थे और अब ऐसा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 (एनएफएचएस -2015-16) के अनुसार यहाँ अभी भी 42.8 प्रतिशत प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं. एनुअल हेल्थ सर्वे 2014 के अनुसार शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) के मामले में मध्यप्रदेश पूरे देश में पहले स्थान पर है जहाँ 1000 नवजातों में से 52 अपना पहला जन्मदिन नहीं मना पाते हैं. जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह दर आधा यानी 26 ही है. यह हाल तब है जब कि इस अभिशाप से मुक्ति के लिए पिछले 12 सालों से पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है , पिछले पांच सालों में ही कुपोषण मिटाने के लिये 2089 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं. सवाल उठता है कि इतनी बड़ी राशि खर्च करने के बाद भी हालात सुधर क्यों नहीं रहे हैं? पिछले 12 साल में 7800 करोड़ रूपये मूल्य का पोषण आहार बांटा गया लेकिन फिर भी शिशु मृत्युदर में मध्यप्रदेश टॉप है ऐसे में सवाल उठाना लाजिमी है.

इसके जवाब को पोषण आहार में हो रहे खेल से समझा जा सकता है. पिछले साल सूबे के  महिला बाल विकास विभाग कि ओर से यह  दावा किया गया था कि 2015-16 में 1.05 करोड़ बच्चों को पोषाहार बांटा गया जबकि पूरे मध्यप्रदेश की आबादी ही करीब सात करोड़ है अगर विभाग के दावे को सही माना जाए तो राज्य का हर सातवां शख्स पोषाहार पा रहा है. राज्य में आंगनवाड़ियों के जरिए कुपोषित बच्चों और गर्भवती महिलाओं को दी जाने वाली पोषणाहार व्यवस्था को लेकर लम्बे समय से सवाल उठते रहे हैं. दरअसल 12 सौ करोड़ रुपए बजट वाले इस व्यवस्था पर तीन कंपनियों-एमपी एग्रो न्यूट्री फूड प्रा.लि., एम.पी. एग्रोटॉनिक्स लिमिटेड और एमपी एग्रो फूड इंडस्ट्रीज का कब्जा रहा है. जबकि 2004 में ही सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि आंगनवाड़ियों में पोषण आहार स्थानीय स्वंय सहायता समूहों द्वारा ही वितरित किया जाये. सुप्रीमकोर्ट द्वारा इस व्यवस्था को लागू करने की जिम्मेदारी मुख्य सचिव और गुणवत्ता पर निगरानी की जिम्मेदारी ग्राम सभाओं को दी गई थी. लेकिन कंपनियों को लाभ पहुचाने के फेर में इस व्यवस्था को लागू नही किया गया. कैग द्वारा पिछले 12 सालों में कम से कम 3 बार मध्यप्रदेश में पोषण आहार व्यस्था में व्यापक भ्रष्टाचार होने की बात सामने रखी जा चुकी है लेकिन सरकार द्वारा उसे हर बार नकार दिया गया है. कैग ने अपनी रिपोर्टों में 32 फीसदी बच्चों तक पोषण आहार ना पहुचने, आगंनबाड़ी केन्द्रों में बड़ी संख्या में दर्ज बच्चों के फर्जी होने और पोषण आहार की गुणवत्ता खराब होने जैसे गंभीर कमियों को उजागर किया गया है.  पिछले साल 6 सितंबर को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान द्वारा पोषण आहार का काम कम्पनियों के बजाय स्वंय सहायता समूहों को दिये जाने की घोषणा की गई थी और यह कहा गया था कि 1 अप्रैल 2017 से पोषण आहार की नई विकेंद्रीकृत व्यवस्था लागू हो जायेगी. लेकिन बाद में यह मामला हाईकोर्ट चला गया जहाँ से आहार सप्लाय करने वाली संस्थाओं को स्टे मिल गया जिसके बाद सरकार ने पूरक पोषण आहार की मौजूदा व्यवस्था को जून 2017 तक लागू रखने का निर्णय लिया है.

अधिवक्ता एस.के. शर्मा द्वारा श्योपुर में कुपोषण से हुई मौतों को लेकर 2016 में ग्वालियर खंडपीठ में एक जनहित याचिका दायर की गयी थी. इस याचिका पर सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार ने जवाब पेश करते हुए कहा है कि कुपोषण से होने वाले मौतों कि  जिम्मेदारी राज्य सरकार की है उसका काम तो फंड उपलब्ध कराना है. सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के प्रतिनिधि द्वारा बताया गया कि  कुपोषण मिटाने के लिए भारत सरकार द्वारा राज्य सरकार को वित्त वर्ष  2013-14 में 42386 लाख रुपए ,2014-15 में 48462 लाख रुपए,2015-16 में 57366 लाख रुपए ओर  2016-17 में 55779 लाख रुपए आवंटित किए गए थे.


जाहिर है तमाम योजनाओं,कार्यक्रमों और पानी की तरह पैसा खर्च करने के बावजूद दस साल पहले और आज की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है. कुपोषण की स्थितिपर मध्यप्रदेश सरकार ने  श्वेतपत्र लाने कि जो घोषणा की थी उसका भी कुछ आता-पता नहीं है. 10  मार्च 2017 को विधायक बाला बच्चन द्वारा विधानसभा में पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए महिला एवं बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनिस ने कहा था कि श्वेत पत्र पर काम चल रहा है लेकिन श्वेत पत्र कब लाया जाएगा इस बारे में उन्होंने कुछ स्पष्ट नहीं किया था.


Monday, July 10, 2017

कमज़ोर संक्रमण नियंत्रण के कारण बढ़ी बच्चों में दवाप्रतिरोधक टीबी


बाबी रमाकांत





अधिकांश बच्चों में, विशेषकर छोटे बच्चों में, टीबी उनके निकटजनों से ही संक्रमित होती है। अविश्वसनीय तो लगेगा ही कि सरकार ने अनेक साल तक बच्चों में टीबी के आँकड़े ही एकाक्रित नहीं किए पर 2010 के बाद के दशक में अब बच्चों में टीबी नियंत्रण पर सराहनीय काम हुआ है देश में और विश्व में भी। पर यह पर्याप्त नहीं है क्योंकि संक्रमण नियंत्रण कुशलतापूर्वक किए बैग़ैर हम टीबी उन्मूलन का सपना पूरा नहीं कर सकते।

बाल टीबी रिपोर्ट 2012 की संपादिका और सीएनएस (सिटीजन न्यूज़ सर्विस) की निदेशिका शोभा शुक्ला का कहना है कि जब-जब कोई बच्चा या व्यसक टीबी संक्रमित होता है तब-तब हमारी टीबी से हार होती है। और जब-जब हम सफलतापूर्वक टीबी संक्रमित होने से रोकते हैं तब-तब हम टीबी उन्मूलन की ओर प्रगति करते हैं. यह समझना जरुरी है कि टीबी संक्रमण को फैलने से रोकना है यह उतना ही जरुरी है जितना हर टीबी से ग्रसित व्यक्ति को पक्की जांच और पक्का इलाज उपलब्ध करवाना.

हर बच्चे या व्यसक जिसको टीबी है उसको बिना विलम्ब पक्की जाँच मिलनी चाहिए और असरकारी दवाओं से उसका पक्का इलाज सुनिश्चित करना चाहिए: यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो टीबी जीतेगा और हम हारेंगे।

बच्चों में टीबी पर नयी रिपोर्ट ने झकझोरा

भारत के अनेक शहरों में 76000 बच्चों की टीबी जाँच करने पर ज्ञात हुआ कि 5500 बच्चों को टीबी रोग है और इनमें से 9% बच्चों को दवा-प्रतिरोधक टीबी है (मल्टी-ड्रग रेज़िस्टंट टीबी या एमडीआर-टीबी/ MDR-TB)। एमडीआर-टीबी का इलाज 2 वर्ष से अधिक अवधि का है, अत्याधिक जटिल उपचार है और इलाज का सफलता-दर भी चिंताजनक रूप से कम है। इस रिपोर्ट को फ़ाउंडेशन फ़ॉर इनेवोटिव दायिगनोस्टिक़्स (एफ़आईएनडी) और भारत सरकार के राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम (जिसका औपचारिक नाम है राष्ट्रीय पुनरीक्षित टीबी नियंत्रण कार्यक्रम) ने जारी किया है.

स्वास्थ्य को वोट अभियान से जुड़े और बालावस्था में स्वयं टीबी का इलाज सफलतापूर्वक पूरा किये हुए राहुल द्विवेदी ने बताया कि सबसे झकझोरने वाली बात यह है कि बच्चों को टीबी बड़ों/ वयसकों से ही संक्रमित होती है। बच्चों की देखरेख करने वालों या किसी निकटजन को टीबी रही होगी जो बच्चों को संक्रमित हुई। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एमडीआर-टीबी औसतन उस व्यक्ति को होती है जो असरकारी टीबी दवाओं के प्रति प्रतिरोधकता उत्पन्न कर ले। दवा प्रतिरोधकता के कारणवश इलाज जटिल हो जाता है और जिन दवाओं से टीबी का प्रभावकारी इलाज हो सकता है वो विकल्प घटते जाते हैं। जैसे-जैसे दवा प्रतिरोधकता बढ़ती है वैसे-वैसे इलाज के लिए जरुरी दवाओं के विकल्प भी घटते जाते हैं.

जन-स्वास्थ्य के लिए चिंताजनक संकेत

पर जिन बच्चों को टीबी हुई उनमें से 9% को एमडीआर-टीबी (दवा प्रतिरोधक टीबी) हुई। ज़ाहिर है कि बच्चों ने विशेषकर कि छोटे बच्चों ने दवा प्रतिरोधकता उत्पन्न तो नहीं की होगी यानि कि उन्हें जिस निकट सम्बंधी से टीबी संक्रमित हुई वो साधारण टीबी नहीं दवा प्रतिरोधक टीबी रही होगी. यह जन-स्वास्थ्य के लिए बहुत चिंताजनक संकेत है।

इंटरनेशनल यूनियन अगेन्स्ट टीबी एंड लँग डिज़ीज़ के विशेषज्ञ डॉ स्टीव ग्राहम ने कहा कि 4 साल से कम आयु के बच्चों को बड़ों से टीबी संक्रमित होने का ख़तरा अधिक होता है। कुपोषण के कारण भी बच्चों में टीबी संक्रमित होने का ख़तरा अत्याधिक बढ़ जाता है। बच्चों की संक्रमण से लड़ने की क्षमता यदि क्षीण हुई तो भी टीबी होने का ख़तरा बढ़ जाता है। कुपोषण, एचआईवी संक्रमण, डायबिटीज/ मधुमेह आदि से भी संक्रमण से लड़ने की क्षमता क्षीण होती है.

लॉरेटो कॉन्वेंट कॉलेज की पूर्व वरिष्ठ शिक्षिका और स्वास्थ्य को वोट अभियान की सलाहकार शोभा शुक्ला ने बताया कि बच्चों में टीबी संक्रमण को रोका जा सकता है यदि संक्रमण नियंत्रण घर, समुदाय, अस्पताल-क्लीनिक आदि में दुरुस्त हो। घर में जो लोग तम्बाकू धूम्रपान करते हों वो नशा उन्मूलन सेवा का लाभ उठाएँ और स्वयं भी स्वस्थ्य रहें और घर के बच्चों को टीबी होने का ख़तरा कम करें। जब तक वो तम्बाकू धूम्रपान नहीं त्याग पा रहे तब तक वे घर में कदापि तम्बाकू धूम्रपान ना करें क्योंकि परोक्ष तम्बाकू धूम्रपान से टीबी होने का ख़तरा बढ़ता है।

बच्चों में टीबी होने का सबसे बड़ा कारण कुपोषण

न्यूज़ ब्लेज़ (अमरीका) से 2010 में सम्मानित शोभा शुक्ला ने कहा कि बच्चों में टीबी होने का ख़तरा बढ़ाने का सबसे बड़ा कारण है: कुपोषण। सरकार ने कुपोषण समाप्त करने का वादा किया है। सरकार ने 2025 तक टीबी समाप्त करने का भी वादा किया है। यह अत्यंत ज़रूरी है कि खाद्य-सुरक्षा और टीबी कार्यक्रम में प्रभावकारी समन्वयन हो जिससे कि चाहे बच्चे हों या वयस्क, उनका टीबी होने का ख़तरा न बढ़े। मधुमेह/ डायबिटीज से भी टीबी होने का ख़तरा बढ़ता है इसीलिए ज़रूरी है कि टीबी और मधुमेह कार्यक्रमों में आवश्यक समन्वयन हो।

बच्चों को बीसीजी वैक्सीन लगवानी चाहिए क्योंकि यह वैक्सीन कुछ संगीन क़िस्म की टीबी से बचाती है हालाँकि टीबी से पूर्ण रूप से नहीं बचाती। यदि टीबी उन्मूलन का सपना साकार करना है तो यह ज़रूरी है कि अधिक प्रभावकारी टीबी वैक्सीन का शोध भी तेज़ हो।

सरकारें वादा निभाएं


190 से अधिक देशों की सरकारों ने संयुक्त राष्ट्र में यह वादा किया है कि 2030 तक टीबी उन्मूलन का सपना साकार होगा. भारत सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के लक्ष्य भी सतत विकास लक्ष्य के अनुकूल हैं. वर्त्तमान में जो टीबी दर में गिरावट दर है वो अत्यंत कम है और इस गति से तो 2030 तक टीबी उन्मूलन का सपना साकार नहीं होगा बल्कि 150 से अधिक साल लगेंगे टीबी उन्मूलन के सपने को साकार करने के लिए. इसीलिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि टीबी दर में गिरावट अधिक तेज़ी से आये जिससे कि सरकार द्वारा किये हुए वादे पूरे हो सकें.

साभार -हम समवेत