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Friday, February 16, 2018

एक और बच्चा मर गया


सुदीप बनर्जी

एक और बच्चा मर गया
गिनती में शुमार हुआ
तमाम मेहनत से सीखे ककहरे
पहाड़े गुना भाग धरे रह गए

शहर के स्कूल से जाकर
सैकड़ों नंग-धडंग बच्चों के
रक्खे-फ़ना शरीक़, गो कि थोड़ा शरमाता हुआ
आख़िरकार आदिवासी बन गया
कोई तारा नक्षत्र नहीं बना फलक पर

इतनी चिताएँ जल रही है
पर रोशनी नहीं, थोड़ी गर्मी भी नहीं
इतने हो रहे ज़मींदोज़ पर भूकंप नहीं

ईश्वर होता आदमक़द तो
ज़रूर उदास होता
यह सब देखकर
सिर झुकाए चला गया होता

पर आदमक़द आदमी भी तो नहीं
ईश्वर का क्या गिला करें

सिर्फ़ शायरों की मजबूरी है
दुआएँ माँगना या थाप देना
इस निरीश्वर बिखरे को
बिलावजह वतन को

जंगलों को चीरकर
आते नहीं दीखते कोई धनुर्धारी
आकाश रेखा पर कोई नहीं गदाधर

केवल उनके इंतज़ार में गाफ़िल
मैं ख़ुद को नहीं बख्शूँगा सुकून
इस मुल्क के बच्चों के वुजूद से

बेख़बर, बेजबाँ ।

साभार - janjwar

Saturday, January 6, 2018

शिक्षा अधिकार कानून के सात साल बाद


शिक्षा अधिकार कानून के सात साल बाद



जावेद अनीस

भारत के दोनों सदनों द्वारा पारित ऐसा कानून जो देश के 6 से 14 के सभी बच्चों को निःशुल्क,अनिवार्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की बात करता है उसके सात साल पूरे होने के बाद उपलब्धियों के बारे में सोचने को बैठें तो पता चलता है कि यह कानून अपना असर छोड़ने में नाकाम रहा है और अब खतरा इसे लागू करने वाले सरकारी स्कूलों के आस्तित्व पर ही आ चूका है. भारत के बच्चों केर लिये बनाया गया एक महत्वपूर्ण कानून लापरवाही और गड़बड़ियों का शिकार बन कर रह गया है, सात साल पहले शिक्षा के अधिकार कानून का आना भारत में एक बड़ा कदम था. लेकिन कुछ अपनी खामियों और इसके क्रियान्वयन में सरकारों की उदासीनता के चलते इसके अपेक्षित परिणाम नहीं मिले सके, इसको लेलर उम्मीदें टूटी हैं और आशंकायें सही साबित हुई हैं. अगर आरटीई अपने उद्देश्योँ को पूरा कर पाने में असफल साबित हो रहा है तो इसके पीछे समाज और सरकार दोनों जिम्मेदार हैं. हो भी हो आरटीई के निष्प्रभावी होने का खामियाजा पीढ़ियोंको भुगतना पड़ सकता है.

सात साल बाद की हकीकत

शिक्षा अधिकार कानून लागू होने के सात बाद हमारे सामने  चुनौतियों के एक लंबी  सूची है.इस दौरान  भौतिक मानकों जैसे स्कूलों की अधोसरंचना, छात्र-शिक्षक अनुपात आदि को लेकर स्कूलों में सुधार देखने को मिलता है लेकिन पर्याप्त और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी, उनसे दूसरे काम कराया जाना, नामांकन के बाद स्कूलों में बच्चों की रूकावट , बीच में पढाई छोड़ने देने का बढ़ता दर और संसाधनों की कमी जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं. लेकिन सबसे चिंताजनक बात इस दौरान शिक्षा की गुणवत्ता और सावर्जनिक शिक्षा व्यवस्था पर भरोसे में कमी का होना है. नीति आयोग के मुताबिक़  वर्ष 2010-2014 के दौरान सरकारी स्कूलों की संख्या में 13,500 की वृद्धि हुई है लेकिन इनमें दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या 1.13 करोड़ घटी है. दूसरी तरफ निजी स्कूलों में दाखिला लेने वालों की संख्या 1.85 करोड़ बढ़ी है.
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने जुलाई 2017 में  संसद में पेश अपनी रिपोर्ट पेश है, रिपोर्ट में शिक्षा अधिकार कानून के क्रियान्वयन को लेकर कई गंभीर सवाल उठाये गये हैं रिपोर्ट के अनुसार  अधिकतर राज्य सरकारोँ के पास यह तक जानकारी ही नहीं है कि उनके राज्य में ज़ीरो से लेकर 14 साल की उम्र के बच्चोँ की संख्या कितनी है और उनमें से कौन स्कूल जा रहा है और कितने बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं.

देश भर के स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है और बड़ी संख्या में बड़ी संख्या में स्कूल एक  शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं इन सबका असर शिक्षा की गुणवत्ता और स्कूलों में बच्चों की रूकावट पर देखने को मिल रहा है.

विश्व बैंक की वर्ल्ड डेवेलपमेंट रिपोर्ट 2018- लर्निंग टू रियलाइज एजूकेशंस प्रॉमिस में दुनिया के उन 12 देशों की सूची जारी की गई है जहां की शिक्षा व्यवस्था सबसे बदतर है, इस सूची में भारत का स्थान दूसरे नंबर है. रिपोर्ट के अनुसार कई सालों तक स्कूलों में पढ़ने के बावजूद  लाखों बच्चे पढ़-लिख नहीं पाते हैं, वे गणित के आसान सवाल भी नहीं कर पाते हैं. ज्ञान का यह संकट सामाजिक खाई को और बड़ा कर रहा है. और इससे गरीबी को मिटाने और समाज में समृद्धि लाने का सपना और दूर होता जा रहा है .

चूक कहाँ पर हुई है ?

लचर क्रियान्वयन

शिक्षा अधिकार कानून को लागू करने में भी भारी कोताही देखने को मिल रही है, राइट टू एजुकेशन फोरम की रिपोर्ट के बताती है कि सात साल बाद केवल  9.08 प्रतिशत स्कूलों में ही इस कानून के प्रावधान पूरी तरह से लागू हो पाए हैं. इस साल जुलाई में कैग द्वारा संसद में पेश की गयी रिपोर्ट के अनुसार आरटीई को लागू करने वाली संस्थाओ और राज्य सरकारों द्वारा  लगातार लापरवाही बरती गयी है . केंद्र सरकार द्वारा इस  कानून के क्रियान्वयन पर खर्च का अनुमान तैयार करना था लेकिन इसे  अभी तक पूरा नहीं किया गया है . इसलिए  प्रावधान होने के बावजूद आरटीई के  लिए कोई अलग बजट नहीं रखा गया  बल्कि इसे सर्व शिक्षा अभियान के बजट में ही शामिल कर लिया गया, रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया है की कैसे इसके तहत राज्यों को आवंटित राशि खर्च ही नहीं हो पाती है रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2010-11 से 2015-16 के बीच फंड के इस्तेमाल में 21 से 41 फीसदी तक की कमी दर्ज की गई है और राज्य सरकारें कानून लागू होने के बाद के छह सालों में उपलब्ध कराए गए कुल फंड में से 87000 करोड़ रुपये का इस्तेमाल ही नहीं कर पाई हैं.

पच्चीस प्रतिशत का लोचा

शिक्षा अधिकार कानून अपने मूल स्वरूप में ही दोहरी शिक्षा व्यवस्था को स्वीकार करती है. जबकि इसे तोड़ने की जरूरत थी. निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान मध्यवर्ग के बाद गरीब और वंचित वर्गों के लोगों का सरकाई स्कूलों के प्रति भरोसा तोड़ने वाला कदम साबित हो रहा है. यह प्रावधान एक तरह से शिक्षा के बाजारीकरण को बढ़ावा देता है और  इससे सरकारी शालाओं में पढ़ने वालों का भी पूरा जोर प्राइवेट स्कूलों की ओर हो जाता है. जो परिवार थोड़े-बहुत सक्षम हैं वे अपने बच्चों को पहले से ही प्राइवेट स्कूलों में भेज रहे हैं लेकिन जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति कमजोर हैं  कानून द्वारा उन्हें भी इस ओर प्रेरित किया जा रहा है. लोगों का सरकारी स्कूलों के प्रति विश्वाश लगातार कम होता जा रहा है जिसके चलते साल दर साल सरकारी स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या घटती जा रही है. ऐसा नहीं है कि इससे पहले अभिभावकों में निजी स्कूलों के प्रति आकर्षण नहीं था. पिछले लम्बे समय से निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना स्टेटस सिम्बल बन चुका है लेकिन उक्त प्रावधान का सबसे बड़ा सन्देश यह जा रहा है कि सरकारी स्कूलों से अच्छी शिक्षा निजी स्कूलों में दी जा रही है इसलिए सरकार भी बच्चों को वहां भेजने को प्रोत्साहित कर रही है। इस प्रकार पहले से कमतर शिक्षा का आरोप झेल रहे सरकारी स्कूलों में स्वयं सरकार ने कमतरी की मुहर लगा दी है. यह प्रावधान सरकारी शिक्षा के लिए भस्मासुर बन चुका है. यह एक गंभीर चुनौती है जिसपर ध्यान देने की जरूरत है . क्यूंकि अगर सावर्जनिक शिक्षा व्यवस्था ही धवस्त हो गयी तो फिर शिक्षा का अधिकार की कोई  प्रासंगिकता ही नहीं बचेगी.
शाला और समुदाय के बीच बढ़ती खायी

अच्छी शिक्षा के लिए जरूरी है है विद्यालय और समुदाय में सहयोग की स्थिति बने और दोनों एक दुसरे के प्रति अपने अपने कर्तव्यों का निर्वाह करे. लेकिन इधर समुदाय और स्कूलों के बीच संवादहीनता या आरोप प्रत्यारोप की स्थिति बन चुकी है. पहले सरकारी स्कूलों के साथ समुदाय अपने आप को जोड़ कर देखता था एक तरह की ओनरशिप की भावना थी. लेकिन विभिन्न कारणों से अब यह क्रम टूटा है और अब स्कूल सामुदायिक जीवन का हिस्सा नहीं हैं.

आरटीई के तहत स्कूलों के प्रबंधन में स्थानीय निकायों और स्कूल प्रबंध समितियों को बड़ी भूमिका दी गयी है लेकिन वे भी जानकारी के आभाव और स्थानीय राजनीति के कारण  अपना असर छोड़ने  में नाकाम साबित हो रहे हैं. ज्यादातर स्कूल प्रबंध समितियां पर्याप्त जानकारी और प्रशिक्षण के अभाव में निष्क्रिय हैं

शिक्षकों की कमी और उनसे गैर-शिक्षण काम कराया जाना

लोकसभा में 5 दिसंबर 2016 को पेश किए आंकड़ों के मुताबिक़ सरकारी प्राथमिक स्कूलों में 18 प्रतिशत और सरकारी माध्यमिक स्कूलों में 15 प्रतिशत शिक्षकों के पद रिक्त हैं. बढ़ी संख्या में स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं.

दूसरी तरफ शिक्षकों से  हर वर्ष औसतन सौ दिन गैर-शैक्षणिक कार्यों कराया जाता है उनका अधिकांश समय विभागीय सूचनाएं,मध्याह्न भोजन की व्यवस्था संबंधी कार्य, निर्माण कार्य आदि में भी खपा दिया जाता है. इससे शिक्षा की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर देखने को मिला है. बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिये जरूरी है कि मानको के हिसाब से पर्याप्त और पूर्ण प्रशिक्षत शिक्षकों की नियुक्ति हो और उनसे कोई भी गैर शिक्षण काम ना कराया जाए जिससे शिक्षक बच्चों के साथ लगातार जुड़े रहे और हर बच्चे पर ध्यान दे सकें.

शिक्षा पर कम खर्च

शिक्षा अधिकार कानून लागू होने के बावजूद केंद्र और राज्य सरकारों के लिए शिक्षा प्राथमिकता नहीं बन सकी है.  सेंटर फॉर बजट एंड गवर्नेंस अकाउन्टबिलिटी’ (सीबीजीए) के अनुसार वित्त वर्ष 2016-17  के दौरान स्कूल शिक्षा पर केंद्रीय सरकार का कुल शिक्षा खर्च भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 2.68 फीसदी था. असोसिएटेड चैंबर आफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री(एसोचैम) की रिपोर्ट के अनुसार भारत शिक्षा पर अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 3.83 से आगे नहीं बढ़ सकी  है जो कि अपर्याप्त  है रिपोर्ट में कहा किया गया है कि यदि भारत ने अपनी शिक्षा व्यवस्था में बुनियादी  बदलाव नहीं किए तो विकसित देशों की बराबरी करने में कम से कम छह पीढ़ियां (126 साल) लग सकते हैं रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि भारत को संयुक्त राष्ट्र द्वारा सुझाए गए खर्च के स्तर को हासिल करना चाहिए.संयुक्त राष्ट्र की सिफारिश के मुताबिक हर देश को अपनी जीडीपी का कम से कम छह फीसदी हिस्सा शिक्षा पर खर्च करना चाहिए.


 निजीकरण की पैरोकारी

पिछले दिनों मध्य प्रदेश जैसे राज्य के स्कूल शिक्षा मंत्री विजय शाह का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें प्राचार्यो की एक कार्यशाला में मंत्री जी झूमते हुए कहते नजर आ रहे हैं कि वे निजी कंपनियों से बात कर रहे हैं और जो कंपनी ज्यादा पैसा देगी उसके नाम स्कूल कर देंगे इससे सरकार का पैसा बचेगा. वायरल हुए विडियो में उनके भाषण के अंश कुछ इस तरह से हैं हम करेंगे बात अल्ट्राटेक से, हम करेंगे बात सीपीसीयू और न जाने, कौन-कौन से... अगर आइडिया कंपनी हमें पैसा देती है तो हम स्कूल का नाम लिख देंगे कि आइडिया आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सागर.

आरटीई लागू होने के बाद से सरकारी स्कूलों के निजीकरण की चर्चायें बढ़ती जा रही है, और अब विजय शाह जैसे स्कूल शिक्षा मंत्री इसकी खुले तौर पर वकालत भी करने लगे हैं . इधर सरकारी स्कूलों को कंपनियों को ठेके पर देने या पीपीपी मोड पर चलाने की चर्चायें जोरों पर हैं, कम छात्र संख्या के बहाने स्कूलों को बड़ी तादाद में बंद किया जा रहा है. प्राइवेट लाबी और नीति निर्धारकों पूरा जोर इस बात पर है की किसी तरह से सरकारी शिक्षा व्यवस्था को नाकारा साबित कर दिया जाए. इस कवायद के पीछे मंशा यह है कि इस बहाने सरकारें सबको शिक्षा देने के अपने संवैधनिक दायित्व से पीछे हट सकें और  और बचे खुचे  सावर्जनिक  शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से ध्वस्त करते हुए इसके पूरी सम्पूर्ण  निजीकरण के लिये रास्ता बनाया जा सके.

अब सामने सबसे खराब विकल्प को पेश किया जा रहा है

शिक्षा को निजीकरण सबसे खराब विकल्प है और यह कोई हल नहीं है. इससे भारत में  शिक्षा के बीच खाई और बढ़ेगी और गरीब और वंचित समुदायों के बच्चे  शिक्षा से वंचित हो जायेंगें. अपनी सारी सीमाओं के बावजूद आरटीई एक ऐसा कानून है जो भारत के 6 से चौदह साल के हर बच्चे की जिम्मेदारी राज्य पर डालता है. जरूरत इस कानून के दायरे को समेटने नहीं बल्कि इसे बढ़ाने की है. आधे अधूरे और भ्रामक शिक्षा की ग्यारंटी से बात नहीं बनने वाली है पहले तो इस कानून की जो सीमायें हैं उन्हें दूर किया जाए जिससे यह वास्तविक अर्थों में इस देश के सभी बच्चों को सामान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने वाला अधनियम बन सके. फिर इसे  ठीक से लागू किया जाये.


जरूरत इस बात की भी है कि समाज द्वारा कानून की इस भावना को ग्रहण करते हुए इस पर अपना दावा जताया जाए इसे और बेहतर बनाने की मांग की जाये. जब तक नागिरक इस कानून को अधिकार के रूप में ग्रहण नहीं करेंगें तब तक सरकारों को  इसे लागू करने के पूरी तरह से जवाबदेह नहीं बनाया जा सकेगा और वे निजीकरण के रास्ते पर आगे बढ़ जायेंगीं .

Thursday, December 28, 2017

मध्य प्रदेश में कुपोषण कम करने के छह उपाय

प्राची सालवे, 



महिला सशक्तिकरण, बेहतर स्वच्छता, और मातृ स्वास्थ्य में सुधार, मध्य प्रदेश में बच्चों की पोषण संबंधी स्थिति में सुधार ला सकता है, क्योंकि मध्यप्रदेश एक ऐसा राज्य है, जहां पांच साल से कम उम्र के 42 फीसदी बच्चे स्टंड या अपने उम्र के लिए कम कद के हैं। यह आंकड़ा देश में पांचवां सबसे ज्यादा है। यह जानकारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) से 2015-2016 के आंकड़ों पर इंडियास्पेंड द्वारा विश्लेषण में सामने आई है।

पांच वर्ष कम आयु की 6.6 फीसदी बाल आबादी मध्य प्रदेश में रहती है, जो बच्चे भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश का 158.7 मिलियन बनाते हैं।

पिछले एक दशक में, मध्य प्रदेश में स्टंटिंग दर में गिरावट हुई है। पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में यह आंकड़े 2005-06 में 50 फीसदी से गिर कर 2015-16 में 42 फीसदी हुई है। जबकि शिशु मृत्यु दर वर्ष 2005-06 में प्रति 1000 जन्मों पर 70 से 2015-16 में प्रति 1000 जन्मों पर 51 हुआ है। वहीं ऐसी महिलाओं का अनुपात, जिन्होंने दस वर्ष या इससे अधिक की शिक्षा प्राप्त की है 2005-06 में 14 फीसदी से बढ़कर 2015-16 में 23.2 फीसदी हुआ है। लेकिन राज्य अब भी देश में सबसे बद्तर राज्यों में से एक है, जैसा कि इसके स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा संकेतक दर्शाते हैं।

इसके अलावा, राज्य के 51 जिलों के आंकड़े मातृ, बाल स्वास्थ्य देखभाल और मध्य प्रदेश में महिला सशक्तिकरण के संकेतों में व्यापक बदलाव दिखाते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि स्वास्थ्य को सुधारने के लिए समाधान स्थानीय वास्तविकताओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।

उदाहरण के लिए,  शिवपुर (52.1 फीसदी) में स्टंटिंग की दर हैती के बराबर है, जो एक गरीब देश है, जो बार-बार प्राकृतिक आपदाओं का सामना करता है। उधर 32 फीसदी स्टंट बच्चों के साथ बालाघाट जिले का दर बोलीविया के समान है, जो कि दक्षिण अमेरिका में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।

जिला अनुसार, मध्यप्रदेश में महिला और बाल पोषण ( 2015-16 )

बेहतर मातृत्व देखभाल कर सकता है बच्चे के पोषण में सुधार

राज्य में बाल स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए मध्यप्रदेश को स्तनपान और प्रसवपूर्व देखभाल की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए। यह दोनों ही कारक बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य परिणामों से जुड़े हुए है।

मध्यप्रदेश में, राज्य की 58.2 फीसदी की स्तनपान की दर से नीचे 21 जिलों में से 16 जिलों में वेस्टेड बच्चों का अनुपात राज्य के 9.2 फीसदी के औसत से ज्यादा था।

उदाहरण के लिए, भिंड जिले में सिर्फ एक तिहाई महिलाओं (33.3 फीसदी) ने 6 महीने की उम्र तक बच्चों को स्तनपान कराया था, जो राज्य में तीसरा सबसे कम है। भिंड जिले में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की चौथी सबसे अधिक संख्या (30.6 फीसदी) थी, जो गंभीर रूप से वेस्टेड थे।

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित छह महीने के लिए विशेष स्तनपान, बच्चों में स्टंटिंग और वेस्टेड स्तरों में कमी के साथ जुड़ा हुआ है, जैसा कि 2013 के इस अध्ययन से पता चलता है।

उदाहरण के तौर पर, मध्यप्रदेश में बालाघाट जिले में बच्चों के उच्च अनुपात (67.6 फीसदी) को स्तनपान करवाया गया और वहां राज्य में स्टंटिंग की दर (32.1 फीसदी) सबसे कम थी।

मध्य प्रदेश में जिले के आंकड़ों के साथ-साथ शोध के साक्ष्य, मातृ देखभाल और बेहतर बाल मृत्यु दर और बाल पोषण के बीच एक रिश्ता बनाते हैं, जैसा कि जनवरी 2016 में इंडियास्पेंड ने एक रिपोर्ट में बताया था। फरवरी, 2017 से इंडियास्पेंड के इस लेख के अनुसार जन्म के समय की देखभाल से मृत जन्म का जोखिम भी कम होता है।

संस्थागत जन्म बच्चों और मां के लिए जन्म के पूर्व और नवजात शिशु की देखभाल सुनिश्चित करते हैं, जैसा कि जुलाई 2015 की रिपोर्ट में इंडियास्पेंड ने बताया है।

राज्य के औसत से कम संस्थागत जन्मों की दर वाले 21 जिलों में से 16 जिलों में स्टंटिंग दर राज्य के औसत से अधिक है। इसी तरह, कम संस्थागत जन्म की सूचना देने वाले 21 जिलों में से 9 जिलों में गंभीर रुप से वेस्टेड बच्चों ( कद के लिए कम वजन ) का प्रतिशत राज्य औसत से ज्यादा है।

उदाहरण के लिए, संस्थागत जन्मों की सबसे कम (सभी जन्मों का 43.5 फीसदी) दरों में से एक, सिंगरौली में ऐसे बच्चों का अनुपात दूसरा सबसे ज्यादा था, जो गंभीर रुप से वेस्टेड थे। स्टंटिंग की दूसरी सबसे अधिक दर ( 52 फीसदी ) के साथ बारवानी जिले में चिकित्सा संस्थानों में सभी जन्मों के 50.7 फीसदी के साथ राज्य में सबसे कम संस्थागत जन्म दर भी था।

दूसरी ओर, 94.7 फीसदी अस्पतालों में जन्म देने वाली महिलाओं की उच्चतम प्रतिशत के साथ, , इंदौर में वेस्टेड बच्चों का दूसरा सबसे कम अनुपात (16.9 फीसदी) था, जैसा कि 2015-16 के आंकड़ों से पता चलता है।

वाशिंगटन-डीसी स्थित कृषि और पोषण से संबंधित मुद्दों पर काम करने वाली अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (आईएफपीआरआई) में वरिष्ठ अनुसंधान साथी पूर्णिमा मेनन कहती हैं, “केवल संस्थागत जन्म पर्याप्त नहीं हैं। सरकार को गर्भवती माताओं को प्रदान की जाने वाली देखभाल की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए; राज्य ने सुनिश्चित किया है कि प्रसव पंजीकृत हो, लेकिन सेवा की गुणवत्ता खराब रहती है।”

माताओं के माइक्रोन्यूट्रेंट सेवन में सुधार करके, मध्यप्रदेश मां और बच्चे की स्वास्थ्य में सुधार कर सकता है। उदाहरण के लिए, गर्भावस्था के दौरान लोहे और फोलिक एसिड की खुराक, मां और विकासशील भ्रूण की पोषण आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करती है। इस बारे जनवरी, 2016 में इंडियास्पेंड में प्रकाशित एक लेख में बताया गया है।

संयुक्त राष्ट्र बाल निधि द्वारा वर्ष 2016 के इस अध्ययन के अनुसार माताओं द्वारा लोहे और फोलिक एसिड (आईएफए) गोलियों का सेवन और स्टंटिंग का जोखिम कम होने के बीच सकारात्मक संबंध भी मौजूद है। मध्यप्रदेश में, 23.6 फीसदी की राज्य औसत की तुलना में आईएएफए उपभोग करने वाली गर्भवती महिलाओं के कम प्रतिशत वाले 32 जिलों में से 13 जिलों में राज्य औसत की तुलना में उच्च स्टंटिंग दरें थी।

ऐसे जिले, जहां अधिक माताओं ने गर्भावस्था के दौरान आईएफए गोलियां लीं, वहां कुछ ही बच्चे स्टंड हैं

यदि महिलाएं अधिक शिक्षित हैं तो बच्चे रहते हैं स्वस्थ

हमने कुछ अप्रत्यक्ष कारकों का विश्लेषण किया है, जैसे कि स्कूली शिक्षा के वर्ष, शादी का समय उम्र, और स्वच्छता तक पहुंच, जो सीधे पोषण को प्रभावित नहीं करते हैं, लेकिन पोषण के पूर्वनिर्धारित या निर्धारक हैं। ये चिकित्सा पद्धतियों की सीमाओं के बाहर स्थित हैं, और पड़ोस में और परिवार के भीतर, समाज के भीतर पाए जाते हैं।

बेहतर स्वास्थ्य संकेतकों के लिए, “राज्य को लड़कियों की कम उम्र में विवाह पर रोक, महिलाओं की शिक्षा में सुधार और स्वच्छता के कवरेज में सुधार पर ध्यान देने की जरूरत है,” जैसा कि आईएफपीआरआई के मेनन कहते हैं।

एक औरत की शिक्षा के स्तर का बाल स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव पड़ता है। अधिक शिक्षित महिलाओं के साथ वाले राज्य बच्चों के लिए बेहतर स्वास्थ्य परिणाम दिखाते हैं। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने मार्च 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

मध्यप्रदेश में भी यह प्रवृत्ति देखी जा सकती है। शिवपुर जिला, जहां स्टंटिंग बच्चों की दर ( 52.1 फीसदी ) राज्य में सबसे ज्यादा है और महिलाओं की सबसे कम प्रतिशत (18.7 फीसदी)  जिन्होंने चार दौरे जन्म पूर्व किए हैं और ऐसी महिलाओं का अनुपात भी सबसे कम (11.8 फीसदी)  है जिन्होंने दस वर्ष की स्कूली शिक्षा प्राप्त की है, जैसा कि एनएफएचएस के आंकड़ों से पता चलता है।

कम उम्र में होने वाले विवाह पर रोक किशोर गर्भधारण में कमी के साथ जुड़ा हुआ है, जो पोषण संबंधी स्थिति को बेहतर बनाने और महिलाओं के बीच और स्वास्थ्य सेवा का उपयोग करने में मदद करता है, जैसा कि 2015 के अध्ययन से पता चलता है।

उदाहरण के लिए, टिकमगढ़ का जिला, जहां महिलाओं की आधी आबादी ( 49.5 फीसदी ) 18 वर्ष की आयु से पहले विवाह करती हैं ( राज्य में सबसे ज्यादा ) वहां बच्चों में स्टंटिंग की चौथी उच्चतम दर (49.7 फीसदी) थी, आईएफए गोलियों की सबसे कम खपत (14 फीसदी)  और उन महिलाओं का निम्नतम अनुपात ( 18.9 फीसदी ) है जिन्होंने प्रसवपूर्व कम से कम चार दौरे किए हैं।

जिले जहां अधिक महिलाओं ने देर से शादी की, वहां स्टंट बच्चों की संख्या कम

अप्रैल 2017 और सितंबर 2016 में इंडियास्पेंड में प्रकाशित लेखों के मुताबिक स्वच्छता का अभाव, बच्चों में स्टंटिंग और एनीमिया का कारण बन सकता है।

उदाहरण के लिए, राज्य में बेहतर स्वच्छता के साथ परिवारों की सबसे अधिक प्रतिशत (74.2 फीसदी)  वाले शहर, इंदौर में वेस्टेड बच्चों की दूसरी सबसे कम दर (17.8 फीसदी) थी।

(सालवे विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 16 दिसंबर 2017 में indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।