Sunday, May 18, 2014

कविता- 'ई इज़ ईक्वल टू एम सी स्क्वायर'


अंशु मालवीय 


एक दिन
दौड़े आए आइन्सटाइन
सोमू के पास
बोले- "सोमू-सोमू"
यार!
कोई मज़ा नहीं है
वस्तुओं के बीच नियम खोजने में
उससे कहीं ज़्यादा मज़ा आता है
आइस-पाइस में
दरवाज़े के पीछे छिपे लोगों को ढूँढ़ निकालने में
अब भला कोई ये
शरीफ़ों का काम है
कि बेचारी रोशनी की कर दो कनेठी
और उससे कहो
बिजली पैदा करे
खदेड़ते रहो नक्षत्रों को दिन-रात
और यहाँ तक कि
नन्हे से बेचारे इलेक्ट्रॉन तक को
चैन से रहने न दो
अब कुछ दिन चैन से रहूँगा...
पेड़ों को लगा दूँगा पंख
चाँद को लंबी नाक
और सूरज को लगा दूँगा
कढ़ाई जैसे कान
तुम्हारे साथ नहाऊँगा
गंगा जी में छप-छप
और हनुमान जी की पूँछ पकड़
डाँक जाऊँगा समुद्र
लेकिन...
अगर एक दिन
दौड़ आए आइन्सटाइन सोमू के पास...
तो क्या करेगा सोमू!
जबकि मिला है ढेर सा होमवर्क
और बनने के लिए आइन्सटाइन
होने लगे हैं कम्पटीशन।

साभार -दक्खिन टोला, पृष्ठ सं. : 99-100, प्रकाशन : इतिहासबोध प्रकाशन


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