Saturday, May 12, 2012

समाज को आईना दिखाती रिपोर्ट


हम नारी को देवी के रूप में सम्मान देने की बात तो करते हैं परंतु उसे वैसा दर्जा देना नहीं चाहते। हम बच्चों को भगवान का रूप तो मानते हैं परंतु उसका ख्याल नहीं रखना चाहते। ‘यूनिसेफ’ की रिपोर्ट हमें कहीं न कहीं इसका आईना ही दिखाती है। सवाल उठता है कि इतनी सारी योजनाएं चलाई जा रही हैं, बावजूद इसके कुपोषित बच्चों के प्रतिशत में संतोषजनक गिरावट क्यों नहीं आ रही है

हाल ही में ‘यू नीसेफ’ द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 22 फीसद लड़कियां कम उम्र में ही मां बन जाती हैं और 43 फीसद पांच साल से कम उम्र के बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकतर बच्चे रक्त की कमी से कमजोरी और एनीमिया से ग्रसित हैं। इन क्षेत्रों के 48 प्रतिशत बच्चों का वजन उनकी उम्र के अनुपात में बहुत कम है। ‘यूनिसेफ’ द्वारा ‘चिल्ड्रेन इन अर्बन र्वल्ड‘ नाम से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी गरीबों में यह आंकड़ा और भी चिंताजनक है जहां गंभीर बीमारियों का स्तर गांव की तुलना में अधिक है। 

रिपोर्ट के अनुसार, शहरों में रहने वालों की संख्या तकरीबन 37 करोड़ है। इनमें अधिकतर संख्या गांव से पलायन करने वालों की है। इन शहरों में हर तीन में से एक व्यक्ति नाले अथवा रेलवे की पटरियों के किनारे रहता है। देश के बड़े शहरों में कुल मिलाकर करीब पचास हजार ऐसी बस्तियां हैं जहां बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। ऐसी बस्तियों में रहने वाले बच्चों में बीमारियां अधिक होती हैं क्योंकि न तो उन्हें उचित वातावरण मिल पाता है और न ही सही ढंग से उनका लालन-पालन होता है।

 रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में कम उम्र के बच्चों की मौतों में 20 प्रतिशत भारत में होती है और इनमें सबसे अधिक अल्पसंख्यक तथा दलित समुदाय प्रभावित हैं। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि सरकार ने जिस तरह से ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के लिए योजनाएं चला रखी हैं वैसी ही योजनाएं शहरों में रहने वाले गरीब बच्चों के लिए भी शुरू की जानी चाहिए। दुनिया भर में बच्चों के विकास के लिए कार्य करने वाली इस संस्था ने अपनी रिपोर्ट के माध्यम से भारतीय समाज को आईना दिखाने का प्रयास किया है जो सराहनीय है। हिंदुस्तान सदियों से ऐसा देश है, जो अपनी सांस्कृ तिक विरासत और उन्नत सामाजिक चेतना के लिए दुनिया भर में जाना जाता है तथा जहां महिलाओं और बच्चों को भगवान का दर्जा दिया जाता है।

 ऐसे में, यदि ‘यूनिसेफ’ हमें यह आईना दिखाता है तो यूं ही नहीं बल्कि इसके पीछे कुछ न कुछ वास्तविकता होगी। शायद ही कोई ऐसा दिन होता है जब समाचारपत्रों में किसी महिला के साथ गैंगरेप या शोषण की कोई खबर प्रकाशित नहीं होती। जब देश की राजधानी का यह हाल है तो छोटे शहरों और कस्बों की स्थिति क्या होती होगी, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। वैसे भी, इन सभी जगहों पर या तो मीडिया की पहुंच नहीं होती अथवा समाज में बदनामी के डर से लोग मामले पर चुप्पी साध लेते हैं। यदि किसी ने हिम्मत दिखाकर शोषण औ र अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने की कोशिश की और थाने में रिपोर्ट लिखानी चाही तो थानेदार अपनी बदनामी के डर से एफआईआर दर्ज करने से बचने की कोशिश करते हैं। कभी-कभी स्वयं अभिभावक सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर अपनी बेटी को मार डालने से भी नहीं हिचकते।

 इसकी ताजा मिसाल हाल ही में घटित हुई मेरठ की घटना है जहां पिछले माह राजमिस्त्री का काम करने वाले पिता ने अपनी दो जवान बेटियों की गर्दन रेत कर सिर्फ इसलिए हत्या कर दी क्योंकि उसे उन दोनों के चाल- चलन पर शक था और इसके कारण उसे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा गिरती नजर आ रही थी। अपनी इस करतूत पर उसे जरा भी अफसोस नहीं था। दिल्ली से सटे हरियाणा में आए दिन खाप पंचायत के फैसले नारी शोषण की कहानी बयां करते हैं जहां जबरदस्ती पति-पत्नी को भाई-बहन साबित कर दिया जाता है। यदि देश के नौनिहालों, विशेषकर जन्म लेनी वाली बच्चियों की बात करें तो आज भी हमारा समाज लड़कियों के मुकाबले लड़कों को तरजीह देता है। दिल्ली की फलक और बेंगलुरू की आफरीन इसकी मिसालें हैं, जिन्होंने जिंदगी की परिभाषा को समझने से पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह दिया। दोनों का कसूर सिर्फ इतना था कि वे लड़कियां थीं। फलक को उसकी मां पर पिता द्वारा किए गए जुल्म और फिर महिला व्यापार का धंधा चलाने वालों ने मौत के मुंह तक धकेला, तो वहीं तीन माह की आफरीन को स्वयं उसके पिता ने पटक-पटक कर सिर्फ इसलिए मार डाला क्योंकि उसे लड़की नहीं लड़ का चाहिए था। दूसरा उदाहरण बिहार के दरभंगा शहर का है जहां अस्पताल के बगल के कूड़ेदान में नवजात बच्ची को फेंक दिया गया, कुत्ते उसे नोंच-नोंच कर खा गए। परंतु इस दौरान किसी ने भी पुलिस को बुलाने का कष्ट नहीं उठाया और न ही यह खबर मीडिया में बहस का विषय बनी क्योंकि मामला दिल्ली अथवा उसके आसपास घटित नहीं हुआ था। शायद समाज को भी इस प्रकार की आदत-सी हो गई है, जो इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने की जगह इसे दिनचर्या मान चुका है।

 ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जो यह साबित करते हैं कि यहां कथनी औ र करनी में एक बड़ा अंतर है। हम नारी को ‘देवी’ के रूप में सम्मान देने की बात तो करते हैं परंतु उसे उसका दर्जा नहीं देना चाहते हैं। हम बच्चों को भगवान का रूप तो मानते हैं परंतु उनका ख्याल नहीं रखना चाहते। ‘यूनिसेफ’ की रिपोर्ट हमें कहीं न कहीं इसका आईना ही दिखाती है। प्रश्न उठता है कि इतनी सारी योजनाएं चलाई जा रही हैं, बावजूद इसके कुपोषित बच्चों के प्रतिशत में संतोषजनक गिरावट क्यों नहीं आ रही है? जब हमारे देश में बाल विवाह कानून लागू है, फिर कैसे बच्चियों की कम उम्र में शादी कर दी जाती है? सवाल हमारे बीच से उठा है तो जवाब भी हमारे बीच मौजूद है। शायद इसका सीधा जवाब यही है कि जब तक समाज जागरूक नहीं होगा, तब तक इस तरह के आंकड़े हमें शर्मिंदा करते रहेंगे।


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