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Sunday, April 15, 2012

बेटियों के दर्द से बेपरवाह समाज


कृष्ण प्रताप सिंह



कहते रहिये कि बेटियां सभ्यता का आधार हैं और किसी समाज की प्रगतिशीलता की असलियत उसमें बेटियों की स्थिति से ही जाहिर होती है। चिंता जताते रहिए कि बेटों के मुकाबले बेटियों की संख्या घटती जा रही है और देते रहिए आंकड़े कि पिछले दशक में प्रसव से पूर्व ही गर्भस्थ शिशु का लिंग पता लगा लेने की तकनीक का ‘लाभ’

उठाकर कितनी बेटियों को दुनिया में आने से पहले ही मार दिया गया। मनुवाद, सामंतवाद, पूंजीवाद और उनके द्वारा पोषित पितृसत्ता को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। फिलहाल तो वे बेटियों की विडंबनाओं को बढ़ाने के अपने प्रपंचों में कोई सीमा मानने को तैयार नहीं हैं और बार-बार जताने से भी नहीं चूकते कि उनके रहते कोई भी सामाजिक मानक बेटियों की प्रतिष्ठापूर्ण उत्तरजीविता के पक्ष में नहीं हो सकता। इसकी एक नजीर जोधपुर के एक अस्पताल में बनी जब एक मां ने जरा से विवाद के बाद अपनी ही नवजात बच्ची को अपना मानने से इनकार कर दिया। वह दस दिनों तक एक अन्य मां के बेटे को हथियाने के फेर में पड़ी रही और बात को डीएनए टेस्ट तक पहुंचाकर ही मानी। बैंगलूर में एक पिता ने अपनी तीन महीने की बेटी ‘आफरीन’ से छुटकारा पाने के लिए पहले उसका गला घोटने की कोशिश की, सिगरेट से जलाया और फिर दीवार पर दे मारा। ग्वालियर में एक पिता ने अपनी अवांछित दुधमुंही बेटी को तंबाकू खिलाकर मार डाला, जबकि नैनीताल में एक अन्य व्यक्ति ने अपनी बेटी को नाली में फेंककर मार दिया। इनके अतिरिक्त सार्वजनिक स्थलों, अस्पतालों, रेलगाड़ियों वगैरह में बच्चियों को लावारिस छोड़ दिए जाने या पतियों द्वारा बेटी पैदा करने के ‘जुर्म’ में पत्नियों के उत्पीड़न की जैसी ताबड़तोड़ घटनाएं सामने आ रही हैं, उनसे साफ है कि समस्या भ्रूणहत्या से बहुत आगे चली गई है। 

अब बेटियां पैदा भी हो जाएं तो मां की गोद पर बेटों जैसा जन्मसिद्ध अधिकार नहीं पाती। जब वे मां के लिए ही नियामत नहीं रह गई हैं और उनके पैदा होते ही मां असुरक्षाबोध से कांप उठती है तो किसी और से कैसे उम्मीद की जाए कि वह उनके जैसे ‘पराए धन’ की सुरक्षा के लिए सचेष्ट होगा या उनकी मानव संतान होने की गरिमा का ख्याल रखेगा? यही कारण है कि कई बार वे खरीद बिक्री की वस्तु होने में अपनी वांछनीयता ढूंढने को विवश होती हैं और अपनी स्थिति की विकरालता का नया संकेत देती हैं। यहां फलक नाम की उस बच्ची का किस्सा याद किया जा सकता है जो पिछले दिनों राजधानी दिल्ली के एम्स में महीनों मौत से लड़ती रही। मानव तस्करों ने उसकी मां को बेच दिया था और वह खुद अपने दो भाई-बहनों के साथ बेचे जाने के लिए इधर-उधर धक्के खा रही थी। इसी क्रम में जिस 14 साल की लड़की ने उसकी दुर्दशा की, कहते हैं कि उसे भी जबरन वेश्यावृत्ति में धकेल दिया गया था। एक और पहलू से देखें तो आमतौर पर बेटियों के प्रति निष्करुण समाज की करुणा जागती है तो ‘बेरहम’

माताओं, ‘दुष्ट’ पिताओं या ‘नरपिशाच’ परिजनों पर सारा ठीकरा फोड़कर उन्हें कोसने का सिलसिला चल निकलता है। यह वास्तव में इस बात की कोशिश होता है कि उनके सोच को घृणित बनाने में निर्णायक भूमिका निभाने वाले समाज व उसकी सत्ता की निर्ममताओं की ओर किसी का ध्यान न जाए। केंद्र सरकार के साथ-साथ कई राज्य सरकारें अपने-अपने क्षेत्रों में जो बेटियां बचाओ अभियान चलाती हैं उन्हें भी ऐसी ही कोशिश के तौर पर देखा जाना चाहिए क्योंकि यह प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है कि जब सामाजिक व आर्थिक बराबरी का सपना छोड़ दिया गया है और चारों ओर गैरबराबरी प्रतिष्ठित होकर अनथरे को जन्म दे रही है, तो यह कैसे संभव किया जाएगा कि सरकार द्वारा बेटियों के पालन-पोषण की घोषणा पर माताओं व पिताओं को इतना ऐतबार हो जाए कि वे उनको बोझ समझने की मानसिकता से मुक्त हो जाएं। 

अभी तो स्त्री-पुरुष बराबरी की कुल बहस, संविधान की प्रस्तावना में लिंग के आधार पर भेदभाव की मनाही के बावजूद, केवल इस बात पर केंद्रित है कि संसद में महिला आरक्षण बिल पास होगा या नहीं। दूसरी ओर संवेदनाओं का बाजारीकरण भूमंडलीकरण की बांह पकड़कर नई मंजिलें छू रहा है। याद कीजिए, एक महिला जज ने अपनी बेटियों को खुद पर लायबिलिटी यानी बोझ के खाते में शामिल कर लिया था तो कितना शोर मचा था। लेकिन यह सवाल तब भी किसी ने नहीं पूछा कि मातृत्व व जनन से जुड़ी नैतिकताएं व मर्यादाएं लगातार टूटती रहेंगी और इसका कारण देश पर थोप दी गई सिर्फ हानि लाभ की चिंता करने वाली व्यवस्था होगी, जिसमें मां की कोख तक किराए पर मिलेगी तो हानि- लाभ के गणित में उलझे मां-बाप के लिए बच्चे नफे या नुकसान वाले उत्पाद में कैसे नहीं बदलेंगे? इसके लिए वे बच्चे या बच्ची को बेचें या कहीं छोड़ दें, बात तो एक ही हुई। अभी बेटे नुकसान का सौदा नहीं बने हैं, इसलिए अवांछनीय होने से बचे हैं। लेकिन मूल्यहीनता का दौर दूसरी ओर पलटा तो उनके सामने भी ऐसी स्थिति आ सकती है।

 ऐसे में बेहतर हो कि सवालों से नजरें चुराने के बजाय उनसे तार्किक मुठभेड़ की जाए और समझा जाए कि पात- पात को सींचने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। इलाज तो अंतत: ऐसा प्रगतिशील समाज ही है, जिसमें हर कोई आत्मसम्मान के साथ रह सके। चूंकि ऐसा समाज बनाने की जद्दोजहद या आंदोलन बचे ही नहीं हैं इसलिए बेटियों के पक्ष में कानूनी उपचार भी कुछ काम नहीं आ रहे हैं। शायद इसीलिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि मुक्ति, सत्ता या कानून की ताकत के रास्ते से नहीं आती। वह सामाजिक मानसिकता बदलने से आती है। लेकिन आज जो लोग यह मानसिकता बदलना चाहते हैं, वे भी अपने एकायामी आग्रहों से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। 

वे समाजवादी नेता आचार्य नरेंद्र देव के उस आदर्श तक जाने को भी तैयार नहीं हैं जिसमें फैजाबाद में कांग्रेस के एक शिविर में शिविरार्थी की देर से आने की आदत दूर करने के लिए उन्होंने उसे बुलाकर कहा था कि आज तुम मुझे पांच बेंत लगाकर इस बात की सजा दो कि मैं तुम्हें समय पालन करना नहीं सिखा सका। ऐसे में बेहतर है कि दूसरों को कोसने की बजाय हम बेटियों की दुर्दशा की यह शर्म जितनी जल्दी महसूस करने को तैयार हो जाएं, बेटियों के हक में उतना ही अच्छा।

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