Tuesday, April 21, 2015

जानें देश में किस तरह जारी है बाल विवाह

पीयूष बबेले


देश में कई इलाकों में बाल विवाह का अभिशाप जारी है
सात साल पहले टीवी पर शुरू हुए धारावाहिक 'बालिका वधू' को लोग देखते तो बड़े चाव से हैं, लेकिन कुछ इस तरह जैसे यह इतिहास में दफन हो चुके किसी कालखंड का पन्ना हो और जिसका उनकी मौजूदा जिंदगी से कोई ताल्लुक नहीं है. वैसे भी बाल-विवाह की चर्चा साल में एक बार अक्षय तृतीया के मौके पर हो जाती है, क्योंकि तब राजस्थान या मध्य प्रदेश के किसी इलाके से बाल-विवाह की छिटपुट खबरें आती हैं. पर्याप्त आंकड़ों के अभाव में सरकार भी इस मुद्दे से बड़ी आसानी से कन्नी काट लेती है. संसद के मौजूदा सत्र में महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने सांसदों को तीन बार इस संबंध में जवाब दिया और तीनों बार उन्होंने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े रखकर अपने काम की इतिश्री कर ली. सांसद वरुण गांधी भी संसद में अपनी मंत्री मां से हर साल कुछ सौ बाल विवाह होने के आंकड़े ही हासिल कर पाए.

बाल विवाह के आंकड़े
लेकिन मार्च 2015 में जारी भारत की जनगणना-2011 के कुछ खास आंकड़े बताते हैं कि इस समय देश में 1.21 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिनका बाल विवाह हुआ है. यह संख्या देश के कुल आयकरदाताओं की एक तिहाई है. बाल-विवाह के सर्वाधिक मामलों वाले राज्य क्रमशः उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और गुजरात हैं. (देखें
राज्यवार आंकड़ों का नक्शा) इन आंकड़ों का विस्तार से विश्लेषण करने वाले भोपाल के गैर-सरकारी संगठन 'विकास संवाद' के संयोजक सचिन जैन एक चौंकाने वाले तथ्य की ओर इशारा करते हैं, "भले ही बाल-विवाह की पीड़िता के रूप में जेहन में मासूम लड़की की छवि उभरे, पर लड़कियों की तुलना में लड़के इसका ज्यादा शिकार हो रहे हैं." बाल-विवाह के भुक्तभोगियों में 57 फीसदी पुरुष और 43 फीसदी महिलाएं हैं.

ये आंकड़े इतना बताने के लिए काफी हैं कि भले ही भारत ने पोलियो, चेचक और कुष्ठ जैसे घातक रोगों पर जीत हासिल कर ली हो लेकिन, राजा राममोहन राय से शुरू हुए संघर्ष के पौने दो सौ साल बीतने के बाद भी बाल-विवाह की बीमारी हमारे सामने खड़ी है. तभी तो अजमेर की 15 साल की भानु (परिवर्तित नाम) का जितना मन अपनी 10वीं की पढ़ाई में नहीं लगता, उससे ज्यादा चिंता उसे जोधपुर की परिवार अदालत में चल रहे अपने विवाह निरस्तीकरण के मुकदमे की रहती है. भानु को संरक्षण दे रहे जोधपुर के सारथी ट्रस्ट से जुड़ीं कृति भारती इसी पीड़ा को तफसील से बताती हैं-2012 में भानु के दादा ने उसके माता-पिता को बताए बगैर 2 लाख रु. में उसकी शादी 55 साल के आदमी के साथ करा दी. परिवार इस शादी के खिलाफ संघर्ष करता रहा, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हुई. नवंबर 2013 में परिवार ने शादी निरस्त करने के लिए मुकदमा लगाया. लेकिन अदालती प्रक्रिया इतनी जटिल साबित हुई कि दिसंबर 2014 में लड़की ने आत्महत्या की कोशिश की. राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को शिकायती पत्र लिखने के बाद मामले की रोजाना सुनवाई का फैसला हुआ है. 6 अप्रैल से मामले की सुनवाई शुरू होगी. भारती बताती हैं, "दरअसल बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 लागू होने के बावजूद कई राज्यों में कानून को लागू कराने वाले नियम अब तक नहीं बने हैं. राजस्थान भी ऐसे राज्यों में शामिल है. ऐसे में अदालतें इसे सामान्य तलाक के मामले की तरह ले लेती हैं, जो लड़की के लिए बहुत भारी हो जाता है." उनका ट्रस्ट अब तक राजस्थान में बाल-विवाह के 750 मामले रुकवा चुका है और उसने 25 बाल-विवाह अदालत से निरस्त कराने में भी कामयाबी हासिल की है.

अगर राजस्थान में बाल-विवाह से आहत भानु जान देने की कोशिश करती है तो मध्य प्रदेश के दमोह जिले की आरती (परिवर्तित नाम) ने ऐसा क्रांतिकारी कदम उठाया कि लोग दंग रह गए. नाबालिग आरती की शादी 30 अप्रैल, 2013 को होने वाली थी. बिना बाप की यह बेटी अपने रिश्तेदारों को जब अपनी बात न समझा सकी तो उसने प्रशासन को खत लिखकर शादी रुकवाने की मांग की. विवाह रोकने में शामिल रहीं मध्य प्रदेश बाल विकास विभाग की कर्मचारी कृष्णा विश्वकर्मा बताती हैं, "लड़की ने अपनी जन्मतिथि के सबूत भी भेजे थे. ऐसे में सरकारी टीम मय पुलिस बल के गांव पहुंची. परिवारवालों को बहुत समझाया गया और जब वे नहीं माने तो कानूनी ढंग से शादी रुकवा दी गई." लेकिन यह जज्बा लड़की के लिए थोड़ा भारी साबित हुआ. परिवार के दबाव में मां-बेटी को गांव छोड़कर जाना पड़ा. कृष्णा बताती हैं कि बालिग होने के बाद आरती के मामा ने उसकी शादी उसी लड़के से कराई, जिसकी बारात तब आरती के संघर्ष के बाद लौटा दी गई थी.
बाल विवाह के दर्ज मामले
ये दोनों घटनाएं गांवों की हैं और दोनों मामलों में कानूनी लड़ाई लडऩे में लड़कियों को दिक्कत आई. सचिन जैन कहते हैं, "जनगणना में बाल-विवाह के 1.21 करोड़ मामले दिख रहे हैं, जबकि पुलिस के पास मुश्किल से साल में कुछ सौ मामले ही दर्ज होते हैं. यानी 99 फीसदी से ज्यादा बाल-विवाह गुप-चुप तरीके से हो रहे हैं." केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इस संबध में फरवरी 2013 में बनाई राष्ट्रीय नीति में माना कि पिछले 15 साल में बाल विवाह के मामलों में 11 फीसदी की कमी आई. यूनिसेफ के बाल संरक्षण विशेषज्ञ दोरा गिउस्ती का कहना है, "इस रफ्तार से बाल विवाह खत्म करने में 50 साल और लग जाएंगे."

बालिका वधू
दरअसल इस बीमारी की जड़ें गहरी हैं. राजस्थान के कई इलाकों में आज भी मान्यता है कि किसी के घर में अगर मौत हो जाती है तो 13 दिन में उस घर में विवाह होना जरूरी है. ऐसा करने से मृतात्मा को शांति मिलती है और घर में सुख-समृद्धि आती है. देश में पहला बाल विवाह अदालत से निरस्त कराने वाली जोधपुर की लक्ष्मी के साथ यही हुआ था. लक्ष्मी बताती हैं, "मैं बचपन में अपने ननिहाल में थी. उसी बीच नाना की मौत हो गई. नानी ने घर की सुख-शांति के लिए मेरा बाल विवाह करवा दिया." जब उसके ससुराल वाले उसे लेने आए तो उसने बगावत कर दी और अदालत से शादी निरस्त कराई. बाद में लक्ष्मी ने अपनी पसंद के लड़के से विवाह किया. 

उधर, बाल विवाह के पैरोकार अब कहीं ज्यादा चालाक हो गए हैं. जैसे अब ज्यादातर बाल विवाह आखातीज की जगह आस-पास तारीखों मे होते हैं, जब प्रशासन उतना सख्त नहीं होता. कई मामलों में घर पर विवाह की हलचल मची रहती है, जबकि असल में विवाह कहीं और होना होता है. ऐसे में अगर पड़ोसी पुलिस को शिकायत भी कर दे तो नतीजा सिफर रहता है.
बाल विवाह के समर्थकों को कौन समझाए कि वे अपने बच्चों की जिंदगी से खेल रहे हैं. यूनिसेफ चाइल्ड मैरिज इन्फॉर्मेशन शीट के मुताबिक अगर लड़की 20 साल से कम उम्र में मां बनती है तो 5 साल की उम्र तक बच्चे की मृत्यु का अंदेशा डेढ़ गुना बढ़ जाता है. इन हालात पर बालिका वधू धारावाहिक में आनंदी का वर्तमान किरदार निभा रहीं तोरल रासपुत्रा कहती हैं, "बाल विवाह के ज्यादातर मामले गांवों से सामने आते हैं. यहां शिक्षा का स्तर बेहतर करने की जरूरत है. शिक्षित होकर ये युवा सोशल मीडिया पर सेल्फी डालने के अलावा ऐसी शादियों की तस्वीरें डालकर हालात बदल सकते हैं."


 (—साथ में विजय महर्षि)


इंडिया टुडे  से साभार 

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