Wednesday, April 1, 2015

जमीनी स्तर पर बाल अधिकार नदारद

आनन्द

children rights
बच्चे किसी भी समाज या देष के भविष्य होते हैं। बच्चों को केन्द्र मे रखकर ही कोई समाज या देष अपने राष्ट्र र्निमाण की भावी संरचना का र्निमाण करता है क्योंकि बच्चे राष्ट्र की अमूल्य धरोहर एंव भावी संसाधन तथा सांस्कृतिक विरासत होते है। जो उसके भावी भविष्य की दिषायें तय करते हैं। 
             
बच्चों के बारे मे बनाये गये अन्र्तराष्ट्रीय कानूनों मे यूएनसीआरसी कानून महत्वपूर्ण है। जिसमें बच्चों को बाल अधिकार दिये गये हैं। भारत मे 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्तियांे को बच्चों की श्रेणी में रखा गया है। अन्र्तराष्ट्रीय बाल अधिकार समझौता 20 नवबंर 1989 को अस्तित्व मे आया था और हमारे देष ने इस समझौते को 10 दिसम्बर 1992 को स्वीकारा था। इस प्रकार देखंे तो भारत में इस समझौते की 22 वी सालगिरह है लेकिन दुनिया भर मे इसकी 25 वी सालगिरह है। भारत सरकार द्वारा यूएनसीआरसी का अनुसर्मथन करने के बाद से सरकार ने भी अपने बाल न्याय कानूनांे मंे परिवर्तन किया ताकी 18 साल से कम उम्र के ऐसे हर बच्चे को सरकार की तरफ से देखभाल और सुरक्षा प्रदान की जा सके, जिसे इस तरह की मदद की जरूरत है। 
             
बच्चों के 4 प्रमुख बाल अधिकार जीवन का अधिकार, विकास का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार और सहभागिता का अधिकार है। यह अधिकार होने के बाद भी हम अपने आसपास देखे तो पाते हैं कि बच्चों के साथ भेदभाव, हिंसा, दूराचार और शोषण होता है। बहुत सारे बच्चे पढाई लिखाई के अवसर से वंचित हो कर मजदूरी करने को मजबूर हैं, कई बच्चे तो बंधुआ मजदूर है, ना जाने कितने बच्चे रोज अपने माता पिता या षिक्षकों के हाथांे मारपीट के षिकार होते हैं, कइयों के साथ स्कूल या अन्य स्थानांे पर जाति या धर्म के आधार पर भेदभाव किया जाता है, लड़कियांे के जन्म को षुभ नही माना जाता है, लडकियां दोयम दर्जे की जिन्दगी जीने को मजबूर हंै। अधिकतर बच्चे नौकर के रूप मे कार्य करने के साथ साथ चाय की दुकानांे, स्कूटर, कारों की मरम्मत करते, ढाबों में, भवन निर्माण आदि जगहांे पर काम करते देखे जाते हैं। अभी भी बच्चों को उनके लिए बनाये गये अधिकार प्राप्त नही हुए है। 

मझगाॅव ब्लाक में बच्चों के स्वास्थ्य एंव पोषण की स्थिति  
सतना जिले के मझगांव ब्लाक मंे स्वास्थ्य एंव पोषण की स्थिति पर यदि नजर डाले तो तथ्य झकझोर देने वाले सामने आते है। जब की राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिषन की शुरुवात ग्रामीण क्षेत्र्ाों की महिलाआंे व बच्चों तक गुणवत्तापूर्ण देखभाल सेवाअंांे की पहुंच बनाने के उद्देष्य से की गयी है किन्तु स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही और अकर्मण्यता के चलते यहां महिलाओं और बच्चों की स्वास्थ्य एंव पोषण की स्थिति भयावह हो गई है। गर्भवती महिलाओं के लिये प्रसव से पूर्व तक सम्पूर्ण छः जांचे की जानी होती हैं किन्तु यह स्थिति बिलकुल ही षिथिल है। कार्यक्षैत्र्ा के 5 गांव की 29 गर्भवती महिलाओ का अध्ययन करने के से पता चला है कि इनमें से 11 महिलाआंे को एक भी टीका नही लगाया गया जबकि 4 महिलाओं को पहला टीका लगाकर इति श्री कर ली गयी है। इन्हीं गांवों की 42 धात्र्ाी माताओं का अध्ययन किया गया जिसमें पता चला कि 20 माताओं ने बच्चांे को घर मे जन्म दियाा जबकि एक प्रसव प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र ले जाते समय और एक प्रसव जिला अस्पताल ले जाते समय बीच रास्ते मे हुई। 
          
अगर बच्चों के टीकाकारण की बात करें तो जन्म से लेकर 5 वर्ष आयु तक बच्चों को लगने वाले टीकांे की स्थिति भी दयनीय है। जबकि राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम का मुख्य उद्देष्य गर्भवती माताओं व षिषुओं मंे होने वाली बीमारियो जैसेे टिटनेस, पोलियो, टी बी, काली खांसी, गलघोटू व खसरे, हिपेटाइटिस बी से नियमित टीकाकरण के माध्यम से बचाव कर षिषु मृत्यु एंव बाल मृत्यु मंे कमी लाना है। किन्तु इस पर आषा कार्यकर्ता व आंगनवाडी सेविका गम्भीरता से ध्यान नही दे रही हैं। जिसका दुष्परिणाम नौनिहाल, बच्चांे व मां को भुगतना पड रहा है। 

पोषण एंव खाद्य सुरक्षा
क्षेत्र मे पोषण एंव खाद्य सुरक्षा की स्थिति काफी खराब है। 4/5 सालों से लगातार वर्षा की कमी है, जिसका प्रभाव जंगल से प्राप्त होने वाली वन सम्पदा महुआ, आंवला, बहेडा, अचार, आदि सहित कृषि पर पडा है। इसके कारण गरीबी और बेरोजगारी बढ़ी है। ऐसी स्थिति मे सरकार द्वारा चलाये जा रहे योजनाओं और सेवाओं का महत्व काफी बन जाता है। जिसके लिये महिला बाल विकास कार्यक्रम, मध्यान्ह भोजन योजना, साझा चूल्हा और राषन वितरण प्रणाली की महत्वपूर्ण भूमिका है। 
           
आइसीडीएस का मुख्य उद्देष्य 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चांे मंे सही मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास की ठोस नींव डालना है, बच्चांे की मौत, कुपोषण और स्कूल छोडने की दर मे कमी लाना है। किन्तु स्थिति कुछ ओर बंया करती है, आंगनबाडी कार्यकर्ता मंगलवार को छोड़कर अन्य दिन केन्द्र ही नही जाना चाहती, सहायिकाअंों के भरोसे केन्द्र रहता है। शालापूर्व षिक्षा किसी भी आंगनबाड़ी में नही कराया जाता है। बच्चों को सांझा चूल्हा का खाना खिला कर इति श्री कर ली जाती है। केन्द्रों में विभाग की सुपरवाइजर व उसके ऊपर के अधिकारी का दौरा कभी नही होता। स्कूलों में मीनू के अनुसार खाना भी नही बनाया जाता है और ज्यादातर दाल चावल बनाया जाता है, वो भी भर पेट नही मिलता है, खाने में भी कभी दाल कम पड़ जाता है तो कभी चावल। भोजन की गुणवत्ता अच्छी नही होती है। क्षेत्र में ज्यादातर परिवारों मे भोजन की आवष्यकता पूर्ति मे इसका अहम महत्व है, खासकर गरीबी रेखा के नीचे के परिवारों के लिए। सौ दिन की रोजगार देने की गारन्टी योजाना भी दम तोड रही है। पिछले सालों मंे बहुत कम लोगांे को काम मिला और जिन्हें काम मिला भी है वो अपने मेहनताने के बदले बैंक के चक्कर काट रहे हैं। 

कुल मिलाकर पोषण एंव खाद्य सुरक्षा की लचर व्यवस्था से अदिवासी व वंचित समुदाय त्रस्त है ओर यही कारण है कि गरीबी के कारण बच्चों में कुपोषण, महिलाओं मंे खून की कमी व उसे असमय मौत के मुंह मंे जाने को विवष करती है। चैकाने वाला तथ्य यह है शासन की तमाम कल्याणकारी योजनाओं के चलते भी बच्चों की मौतों का सिलसिला थमने का नाम नही ले रहा है। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि षासन की महत्वाकांक्षी योजना लाडली लक्ष्मी से जुडी बच्चियां भी असमय मौत का षिकार हो रही है।

शालाऔं की स्थिति
स्कूल को बच्चो के लिये ज्ञान ओर मनोरंजन का केन्द्र माना जाता है। स्लोगन भी लिखा हुआ होता है कि षिक्षार्थ आइये, सेवार्थ जाइये अर्थात स्कूल ज्ञान की महत्वपूर्ण कुन्जी है। षिक्षा का उद्देष्य बच्चों को र्निभय, ज्ञानी, सक्षम, ओर समृध्द बनाना है। किन्तु जिस तरह के विद्यालय भवनो मे षिक्षा दी जाती है। उससे ज्यादा कैाषल विकास की उम्मीद भी नही की जा सकती। बच्चों के पढ़ने के लिए हर कक्षानुसार कमरे नही हैं। स्कूलों में साफ पेयजल का पुख्ता इंतजाम नही है। सुप्रीम कोर्ट के बार बार आदेष देने के बाद भी स्कूलों में बालक व बालिका के लिये पृथक शौचालय तक नही है। स्कूलों में पुस्तकालय की सुविधा, सुरक्षा हेतु चारदीवारी व गेट की कमी है । कुल मिलाकर बच्चो के निःषुल्क ओर अनिवार्य षिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 का खुलेआम उल्लधन हो रहा है । एक ओर जहाॅ यूएनसीआरसी की 25 वी वर्षगाॅठ को समूचा विष्व हर्षोल्लास के साथ मना रहा है। वही जमीनी स्थिति पर षिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण की स्थिति गंभीर होती जा रही है। 

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