Wednesday, April 1, 2015

शहरों में बेहाल होता बचपन

प्रदीप जुलु




इन दिनों संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समझौते (यूएनसीआरसी) की 25वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। दुनिया में सबसे बड़ी संख्या में देशों द्वारा मंजूर की गई यह संधि, बच्चों के मानवाधिकारों का दस्तावेज है, जो वयस्कों को इस बात के लिए मजबूर करती है कि वह बच्चों को अधिकार-सम्पन्न व्यक्तियों के रूप में देखें, न कि वयस्कों पर निर्भर और उनके अधीन ‘प्रजा’ के रूप में। 

भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्व (अनुच्छेद 39), राज्य को ऐसी नीतियां बनाने व लागू करने का निर्देश देते हंै जिनसे ‘‘बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरूपयोग न हो और उनकी शोषण व नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए’’। भारत ने सन् 1992 में यूएनसीआरसी पर हस्ताक्षर कर, बच्चों के अधिकारों की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की। यूएनसीआरसी में बच्चों की स्पष्ट परिभाषा दी गई है। इसके अनुसार, 18 वर्ष से कम आयु के सभी व्यक्ति, बच्चे हैं। परंतु भारत में बच्चों की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है और अलग-अलग कानूनों में बच्चों को अलग-अलग ढंग से परिभाषित किया गया है। 

मध्यप्रदेश में शहरी बच्चों की स्थिति
मध्यप्रदेश में गरीबी के वर्तमान स्तर को देखते हुए यह स्पष्ट है कि राज्य के हर 10 शहरी झुग्गी निवासियों में से 4 गरीब हैं। योजना आयोग के अनुसार, राज्य की शहरी आबादी का 42 प्रतिशत से अधिक हिस्सा, गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन करने को मजबूर है। दुर्भाग्यवश, तेजी से हो रहे शहरीकरण के कारण, झुग्गियों में रह रहे गरीब बच्चों का स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और सुरक्षा बड़ी चुनौतियां बनकर उभरे हैं क्योंकि उन्हें न तो गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य व शिक्षा सुविधाएं उपलब्ध हैं और ना ही खाद्य सुरक्षा, स्वच्छ पेयजल और स्वच्छ व सुरक्षित वातावरण। इन कमियों का सबसे प्रतिकूल प्रभाव बच्चों पर पड़ता है, विशेषकर नवजात शिशुओं और कम उम्र के बच्चों पर,  जिनका स्वास्थ्य, पूरी तरह से मां के दूध और पौष्टिक आहार की उपलब्धता, उनकी देखभाल करने वाले की योग्यता, सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की गुणवत्ता और संपूर्ण समुदाय के सहयोग पर निर्भर करता है। 

बच्चों की उत्तरजीविता और पोषण-गंभीर चिंता के विषय
स्वास्थ्य के आधारभूत ढांचे की अपर्याप्तता, आर्थिक संसाधनों की कमी व खराब पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण, बच्चों की उत्तरजीविता पर प्रतिगामी प्रभाव पड़ता है, जो कि उनकी उच्च मृत्यु व रूग्णता दर में प्रतिबिंबित होता है। बच्चों के अधिकार का समझौता उन्हें उच्चतम स्तर की स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करवाने पर जोर देता है और कुपोषण व बीमारियों से उनकी रक्षा की जिम्मेदारी, राज्य को सौंपता है। शहरी गरीबों में, दो-तिहाई से अधिक (68 प्रतिशत) गर्भवती महिलाओं को कम से कम तीन प्रसूति-पूर्व स्वास्थ्य जांचों का लाभ नहीं मिलता, जिसकी अनुशंसा स्वास्थ्य विशेषज्ञ करते हैं । 

शहरी निर्धन वर्ग की महिलाओं की केवल 38 प्रतिशत प्रसूतियां प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में होती हैं। पिछले लगभग 10 सालों में, मध्यप्रदेश, देश में नवजात शिशुओं के लिए सबसे असुरक्षित राज्य बनकर उभरा है, जहां कि, नमूना पंजीकरण प्रणाली (एसआरएस) के अनुसार, शिशु मृत्यु दर 56 प्रति हजार है। एसआरएस 2012 के आंकड़ों से यह पता चलता है कि मध्यप्रदेश, जन्मदर (26.6 प्रति हजार) की दृष्टि से तीसरे और मृत्युदर (8.1 प्रति हजार) की दृष्टि से देश के सभी राज्यों में दूसरे स्थान पर है। देश की औसत शिशु मृत्युदर 47 है जबकि सन् 2010 के आंकड़ांे के अनुसार, प्रदेश में यह दर 62 है। शहरी क्षेत्रों में देश की औसत शिशु मृत्युदर 31 है जबकि मध्यप्रदेश के शहरी इलाकों में यह 42 है। मध्यप्रदेश में नवजात मृत्युदर, देश के औसत 33 से कहीं ज्यादा, 44 है। जन्म के कुछ ही समय बाद, मध्यप्रदेश में 1000 बच्चों मंे से 34 की मृत्यु हो जाती है जबकि पूरे देश में यह दर 25 है। देश की प्रसवकालीन मृत्युदर 32 है और मध्यप्रदेश की 42। मध्यप्रदेश में हर 1000 बच्चों में से 8 मृत पैदा होते हैं जबकि देश में यह दर 7 है और मध्यप्रदेश के शहरी इलाकों में और अधिक, 10 है। पांच वर्ष की आयु के पूर्व बच्चों की मृत्युदर देश में 59 और मध्यप्रदेश में 82 है। शहरी इलाकों के संदर्भ में यह दरें क्रमशः 38 और 54 हैं। 5-14 आयु वर्ग के बच्चों की मृत्युदर, देश में 0.9 और मध्यप्रदेश में 1.1 है। इंस्टीट्यूट आॅफ डेवलपमेंट स्टडीज के एक हालिया अध्ययन के अनुसार, देश में हर दिन 6 हजार बच्चे कालकवलित हो जाते हैं और इनमें से दो से तीन हजार बच्चों की मृत्यु कुपोषण के  कारण होती है। शहरी गरीब बच्चों में से केवल 53 प्रतिशत आंगनबाड़ी केंद्रों में जाते हैं और केवल 10.1 प्रतिशत महिलाएं किसी स्वास्थ्य कार्यकर्ता के नियमित संपर्क में रहती हैं। मध्यप्रदेश के शहरी इलाकों में 69 प्रतिशत बच्चे किसी न किसी प्रकार की खून की कमी से ग्रस्त हैं और 5 वर्ष की आयु से कम के 44 प्रतिशत बच्चे नाटे हैं अर्थात उनकी ऊँचाई, उनकी आयु के अनुरूप नहीं है और 32 प्रतिशत कमजोर हैं, यानी उनका वजन उनकी ऊँचाई के अनुरूप नहीं है। इसके पीछे कुपोषण या बीमारी या दोनांे हो सकते हैं। 

बच्चों का विकास-एक महत्वपूर्ण मुद्दा
झुग्गी बस्तियों में रहने वाले बच्चों को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है उनमें से सबसे महत्वपूर्ण हैंः परिवार का बड़ा आकार, निम्न जीवनस्तर, खराब स्वास्थ्य, घर और आसपास के वातावरण की प्रतिकूल परिस्थितियां, प्रवास, भाषा की समस्या, अस्थिर जीविका व आर्थिक स्थिति, अभिभावकों का निम्न शैक्षणिक स्तर और स्कूलों में पर्याप्त सुविधाओं का अभाव। 6 से 14 वर्ष आयु समूह के बच्चों के एक अध्ययन में यह सामने आया कि उनमें से 50 प्रतिशत स्कूल नहीं जा रहे थे क्योंकि या तो उनका किसी स्कूल में दाखिला ही नहीं कराया गया था या उन्होंने बीच में पढ़ाई छोड़ दी थी। केवल 48.56 प्रतिशत बच्चे स्कूल जा रहे थे या अपनी शिक्षा जारी रखे हुए थे। झुग्गियों में रहने वाले बच्चों में से अधिकांश अपने परिवार की पहली शिक्षित पीढ़ी होते हैं और उन मामलों में भी, जहां अभिभावक मात्र साक्षर हों, बच्चों को घर में उनकी पढ़ाई में कोई मदद नहीं मिलती। शहरी गरीबों की शैक्षणिक सुविधाओं तक पर्याप्त पहुंच नहीं है। सन् 2005 में शहरी क्षेत्रों में करीब 21 लाख बच्चे (पात्र आबादी का 4.34 प्रतिशत) स्कूल नहीं जा रहे थे, जबकि देश में ऐसे बच्चों की कुल संख्या 1 करोड़ 34 लाख थी। सन् 2007-08 में 15 साल या उससे अधिक आयु के शहरी निवासियों में से 18 प्रतिशत निरक्षर थे। जो साक्षर थे, उनमें से 0.9 प्रतिशत ने कोई औपचारिक शिक्षा ग्रहण नहीं की थी, 36.3 प्रतिशत ने माध्यमिक स्कूल तक की शिक्षा हासिल की थी और 28.1 प्रतिशत उच्च या उच्चतर माध्यमिक स्तर तक पढ़े थे। 

बाल सुरक्षा-अपारदर्शिता की स्थिति
बाल श्रम पूरे देश व राज्य में चिंता का विषय रहा है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में लगभग 1.01 करोड़ बच्चे काम करते हैं, जिनमें से 25.33 लाख की आयु 5 से 9 वर्ष के बीच है। मध्यप्रदेश से संबंधित आंकड़े बताते हैं कि 14 वर्ष से कम आयु के 6,08,123 बच्चे ग्रामीण क्षेत्रों में और 92,116 बच्चे शहरी क्षेत्रों में काम करते हैं। यह भयावह है कि राज्य में 9 वर्ष से कम आयु के 1,35,730 बाल श्रमिक हैं। संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन के अनुसार, भारत में 5 से 14 वर्ष की आयु के 1.5 करोड़ बच्चे विभिन्न उद्योगों में कार्यरत हैं। बच्चों को अक्सर ऐसे काम में लगाया जाता है जो उनकी आयु के हिसाब से बहुत कठिन होते हैं। उनके कार्यस्थलों पर साफ-सफाई नहीं होती और उन्हें अपने घर से बाहर रहकर कई घंटों तक काम करना पड़ता है। उन्हें उनके श्रम के अनुरूप वेतन नहीं मिलता और ना ही पेटभर खाना नसीब होता है। वह शिक्षा और अन्य लाभों से भी वंचित रहते हैं। 

पिछले एक दशक में, 20-24 वर्ष आयु वर्ग में बालवधुओं के प्रतिशत में केवल 6.8 की कमी आई है। सन् 1992-93 में यह आंकड़ा 54.2 प्रतिशत था जो 2005-06 में घटकर केवल 47.4 प्रतिशत हुआ। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के पिछले तीन चक्रों के आंकड़ों से उभरी इस प्रवृत्ति को देखते हुए, अनुमानित है, कि सन् 2011 में बालवधुओं का प्रतिशत 41.7 रहा होगा। भारत में 20-24 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं (जनगणना 2011) में से 2.3 करोड़ बालवधु हैं। दुनिया की बालवधुओं में भारतीय बालवधुओं की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत है। मध्यप्रदेश में 20 से 25 वर्ष की आयु की वह महिलाएं, जिनका विवाह उनकी 18वीं वर्षगांठ के पहले हो गया था, का प्रतिशत 53.8 है और उनमें से 72.3 प्रतिशत निरक्षर हैं। जो बच्चे बीच में स्कूल छोड़ देते हैं, उनमें से 69.4 प्रतिशत अपना विवाह हो जाने के कारण ऐसा करते हैं। 

नेशनल क्राईम रिकार्डस ब्यूरो की 2012 की रिपोर्ट के अनुसार, सन् 2011 में मध्यप्रदेश में बच्चों के विरूद्ध अपराध के 5,168 मामले दर्ज किए गए जो कि देश में हुए ऐसे कुल अपराधों का 13.54 प्रतिशत हैं। मध्यप्रदेश, शिशु हत्या (राष्ट्रीय औसत का 20.99 प्रतिशत), भ्रूण हत्या (राष्ट्रीय औसत का 30.48 प्रतिशत) व अन्य अपराधों (राष्ट्रीय औसत का 34 प्रतिशत) में देश में सबसे ऊपर है। सन् 2011 में बच्चों के विरूद्ध सबसे ज्यादा अपराध दिल्ली में हुए जबकि मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में क्रमशः बच्चों के बलात्कार और हत्या की घटनाएं सबसे ज्यादा हुईं। मध्यप्रदेश में बच्चों के साथ बलात्कार की सबसे अधिक (1,262) घटनाएं हुईं। दूसरे स्थान पर रहा उत्तरप्रदेश (1,088) और तीसरे पर महाराष्ट्र (818)। देश में बच्चों के साथ बलात्कार की कुल घटनाओं में से 44.5 प्रतिशत इन तीन राज्यों में हुईं। स्कूलों, होस्टलों और बालगृहों में बच्चों को शारीरिक दंड देना सामान्य समझा जाता है और कुछ संस्थान, इसे बच्चों को सजा देने का सही तरीका मानते हैं। पिछले कुछ सालों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब बच्चों के साथ शिक्षकों, वार्डनों इत्यादि ने क्रूर शारीरिक बर्ताव किया हो। 

बच्चों की भागीदारी-अब भी एक स्वप्न
बाल अधिकार समझौते में बच्चों की ‘विकसित होती क्षमताओं’ की अवधारणा शामिल की गई। ऐसा किसी भी अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संधि में पहली बार किया गया। समझौते के अनुच्छेद-5 के अनुसार, अभिभावकों और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी संभाल रहे अन्य व्यक्तियों के द्वारा बच्चों को दिशानिर्देश और मार्गदर्शन देते समय इस बात का ख्याल रखा जाना चाहिए कि बच्चों के अपने अधिकार भी हैं, जिनके इस्तेमाल का अवसर उन्हें मिलना चाहिए। यह  अवधारणा, बच्चों को उनके जीवन के बारे में निर्णयों में भागीदार बनाती है और उन्हें स्वतंत्रता उपलब्ध करवाती है। 

समझौते में इस बात पर जोर दिया गया है कि बच्चों के अधिकारों और उनकी क्षमताओं का सम्मान किया जाना चाहिए और उनकी योग्यता के अनुरूप, वयस्कों के अधिकार उन्हें हस्तांतरित किए जाने चाहिए। हर बच्चे को यह हक है कि वह अपने लिए प्रासंगिक जानकारियां प्राप्त करे, समझे और बताए। और उन्हें विचार करने व चयन करने की स्वाधीनता मिलनी चाहिए। कानून, नीतियों और आचरण में इस तरह के सामाजिक व सांस्कृतिक परिवर्तनों को प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता है जिनमें बच्चों के योगदान और उनकी क्षमताओं को अभिस्वीकृति मिले और अपने संबंध में निर्णय लेने के उनके अधिकार को मान्यता दी जाए। पिछले एक दशक में, इस समझौते के अनुच्छेद-12 के अनुरूप, बच्चों की भागीदारी के संबंध में जागृति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। परंतु बच्चों की सहभागिता मुख्यतः केवल उनकी राय लेने तक सीमित रहती है और उन्हें उन निर्णयों, नीतियों और सेवाओं - जो उनसे संबंधित हैं - को प्रभावित करने का अधिकार नहीं मिलता। कई बच्चे अदालतों, अस्पतालों, रहवासी व सुधारगृहों के संपर्क में आते हैं जहां जज, पुलिस, मजिस्ट्रेट, डाक्टर, नर्सें, मनोचिकित्सक, बच्चों की देखभाल करने वाले कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता, युवा कार्यकर्ता व प्रशासक उनके बारे में सभी निर्णय लेते हैं। यह निर्णय बच्चों की क्षमताओं को ध्यान में रखे बगैर लिये जाते हैं। सामान्य प्रवृत्ति यह है कि बच्चों की क्षमताओं को कम करके आंका जाता है। यह न केवल बच्चों के अधिकारों के प्रति असम्मान है वरन् इससे समाज, चीजों को बच्चों के परिप्रेक्ष्य से नहीं देख पाता और ना ही उनकी योग्यता और क्षमता का इस्तेमाल कर पाता है। 

भारत में कानून तो पर्याप्त हैं परन्तु सबसे बड़ी समस्या उन्हें लागू करने की है। बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। बच्चों की आवाज को सुना जाना चाहिए और उनकी बेहतरी और विकास के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अलग मंत्रालय बनाया जाना चाहिए। बच्चों के संबंध में नीतियां बनाने वालीं व उन्हें लागू करने वालीं संस्थाओं में बच्चों को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। सभी बच्चों को समान अवसर उपलब्ध होने चाहिए चाहे वह किसी भी लिंग, वर्ग, धर्म, जाति या क्षेत्र के हों। निर्धन और हाशिए पर पड़े समुदायों के बच्चों को भी यह अवसर उपलब्ध होने चाहिए। भारतीय संविधान और संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समझौते में बच्चों को उपलब्ध कराए गए अधिकारों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। देश के सकल घरेलू उत्पाद का कम से कम 5 प्रतिशत बच्चों से जुड़ी योजनाओं और गतिविधियों पर खर्च किया जाना चाहिए। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हर बच्चे का वर्तमान बेहतर हो, तभी हम देश का भविष्य बेहतर बना पाएंगे। 

सरकारों को विधायी नीति व सेवाओं के संदर्भ में यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चों के साथ अधिकार-संपन्न नागरिकों की तरह व्यवहार किया जाए न कि एक ऐसे वर्ग के रूप में, जिसे केवल देखभाल की आवश्यकता है। ऐसी नीतियां बनाई जानी चाहिए जो सभी बच्चों को समान अधिकार उपलब्ध करवाएं, उन्हें उनकी योग्यता के अनुरूप विकास करने के अवसर मिलें और उन्हें पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध हो। और यह सब उन बच्चों को भी मिलना चाहिए जो वंचित वर्ग के हैं-जिनमें शामिल हैं लड़कियां, गरीब बच्चे, वह बच्चे जो सुधारगृहों आदि मंे निवास कर रहे हैं, विकलांग बच्चे और देशीय व अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चे। इस तरह का सांगठनिक ढांचा खड़ा किया जाना चाहिए जिसमें बच्चों के जीवन का़े प्रभावित करने वाले कानून या नीतियां बनाने से पहले उनकी राय ली जा सके। इसकी प्रक्रिया बच्चों की अलग-अलग क्षमताओं को ध्यान में रखकर निर्धारित की जानी चाहिए और उसमें सभी आयु वर्ग के बच्चों को शामिल किया जाना चाहिए। अंत में, सरकार को उपलब्ध संसाधनों में से अधिकतम संभव संसाधनों को बच्चों के सर्वोत्तम विकास के लिए निवेशित करना चाहिए। 

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