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किशोर की उम्र और कानून

केपी सिंह
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 भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने किशोर न्याय (देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2000 के स्थान पर नया कानून (किशोर न्याय विधेयक, 2014) लाने की तैयारी कर ली है। प्रस्तावित कानून का प्रारूप इंटरनेट पर लोगों की प्रतिक्रिया जानने के लिए उपलब्ध करा दिया गया है। इस पहल की पृष्ठभूमि में बहुचर्चित निर्भया बलात्कार कांड और हत्या का प्रकरण प्रतीत होता है जिसमें दोषी एक किशोर अपराधी को मात्र तीन वर्ष के लिए सुधार गृह में बंद रखने की सजा मिली थी। अधिसंख्य लोगों का मानना था कि यह सजा अपराध की गंभीरता को देखते हुए अत्यंत कम है। उसी दिन से ही किशोर न्याय अधिनियम, 2000 में परिभाषित किशोरावस्था की अठारह वर्ष की उम्र को घटा कर सोलह वर्ष करने की वकालत शुरू हो गई थी। यह कवायद अब जिद में बदल गई लगती है।

निर्भया बलात्कार और हत्याकांड के बाद उपजे जनाक्रोश को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन सरकार ने न्यायमूर्ति वर्मा समिति का गठन किया था। समिति को स्त्री-विरोधी अपराधों से संबंधित कानूनी प्रावधानों को और कठोर बनाने के उपाय सुझाने का जिम्मा दिया गया था। इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर भारतीय दंड संहिता के संबंधित प्रावधानों में परिवर्तन किए गए हैं। वर्मा समिति के समक्ष एक प्रश्न यह भी था कि क्या किशोरावस्था की उम्र को अठारह वर्ष से घटा कर सोलह वर्ष किया जाना चाहिए?

बहुत विचार-विमर्श के बाद समिति ने किशोरावस्था की उम्र अठारह वर्ष ही रखने का सुझाव दिया था। इसी विषय को लेकर उच्चतम न्यायालय में सात याचिकाएं भी दायर की गई थीं, जिनमें किशोरावस्था की अधिकतम उम्र सोलह वर्ष करने की गुहार लगाई गई थी। उच्चतम न्यायालय के तीन न्यायाधीशों के एक खंडपीठ ने इन सभी याचिकाओं को एक साथ सुनते हुए किशोरावस्था की उम्र को पुन: परिभाषित करने से इनकार कर दिया था। खंडपीठ ने कहा था कि किशोर न्याय अधिनियम, 2000 के प्रावधान अंतरराष्ट्रीय मानकों को ध्यान में रख कर बनाए गए तर्क-संगत प्रावधान हैं, जिनमें फिलहाल हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है।

किशोरावस्था की अधिकतम सीमा अठारह वर्ष निर्धारित करते समय बाल-मनोवैज्ञानिकों और व्यवहार-विशेषज्ञों की राय को आधार बनाया गया है। उच्चतम न्यायालय का मत था कि अठारह वर्ष तक की आयु वाले किशोरों को सुधार कर उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने की बहुत गुंजाइश बाकी रहती है।

निर्भया कांड जैसे गंभीर अपराधों को रोकने की पृष्ठभूमि में किशोरावस्था की उम्र कम किए जाने की दलील को खंडपीठ ने यह कह कर नकार दिया था कि इस प्रकार के गंभीर अपराध ऐसे घटित हो रहे कुल संगीन अपराधों की संख्या के मुकाबले बहुत कम हैं और अपवाद-स्वरूप ही सामने आते हैं। अपवादों को आधार बना कर सामान्य कानून में परिवर्तन करना विधिशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत होगा। 

पर मीडिया में जब भी किसी किशोर द्वारा गंभीर अपराध करने की खबर आती है, जनमत न्यायमूर्ति वर्मा समिति और उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था को मानने से इनकार करता नजर आता है। जनता का तर्क होता है कि संगीन अपराधों में किशोरों की भागीदारी लगातार बढ़ती जा रही है। समय आ गया है कि किशोरावस्था की आयु-सीमा घटा कर उन्हें उचित दंड देने की व्यवस्था की जाए। इसी को वजन देते हुए सरकार अब कानून में फेरबदल करने के बारे में सोच रही है। कानून में कोई भी परिवर्तन करने से पहले यह नहीं भूलना चाहिए कि जनता की राय हमेशा तर्क-संगत और न्याय-सम्मत नहीं होती। जनता की राय को कानून और न्याय की कसौटी पर परखना प्रशासनिक व्यवस्था की जिम्मेदारी होती है। 

निर्णय लेते समय उसी जनमत को महत्त्व दिया जाना चाहिए, जो प्रगतिशील और विवेकपूर्ण हो और सामुदायिक विकास और मानवता के सामूहिक मापदंडों पर खरा उतरता हो। वरना भीड़-तंत्र जनमत का अपहरण करके लोकतंत्र को मजबूरी की जंजीरों में जकड़ लेगा और तालिबानी और खाप-मानसिकता न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा बनने लगेगी। इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की जरूरत है।

किशोर अपराधियों को वयस्क अपराधियों से अलग रख कर उनके साथ न्याय करने की अवधारणा का मूल सिद्धांत यह है कि अठारह वर्ष की उम्र तक व्यक्तिका शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास पूर्ण नहीं होता है। उसे अच्छे-बुरे और गुण-दोष को परखने के लिए आवश्यक ज्ञान नहीं होता है। उसका आपराधिक मंतव्य अपरिपक्व और अपूर्ण होता है। किशोर के कुकृत्य को आपराधिक-मानसिकता का प्रतिफल मान लेना उचित नहीं होगा। 

अपराध-विज्ञानियों का मत है कि आधी-अधूरी अपराध-मानसिकता पर आधारित कुकृत्य को अपराध नहीं, व्यवहार-विचलन की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। तर्क में दम प्रतीत होता है। फिर क्या यह न्याय-सम्मत होगा कि अपराध की गंभीरता को आधार बना कर अधूरी आपराधिक मानसिकता को संपूर्ण मानते हुए किशोरावस्था की उम्र घटा दी जाए? अगर ऐसा किया जाता है तो यह किशोर-न्याय की मूल अवधारणा के विरुद्ध होगा।  

समाजशास्त्री और अपराध-विज्ञानी चिंतित हैं कि पिछले एक दशक से समाज में यह सोच विकसित हो रहा है कि कठोर सजा देकर ही अपराधों पर अंकुश लगाया जा सकता है। कठोर सजा देकर अपराधों को रोकने की अवधारणा उन्नीसवीं शताब्दी में ही नकार दी गई थी। पर उसके कुछ कीटाणु अब भी जन-मानसिकता में स्थापित हैं जो संगीन अपराध की पृष्ठभूमि में पुन: जीवित हो जाते हैं। दुनिया भर में विधि-शास्त्र का यही तकाजा है कि सुधरने योग्य अपराधियों को सजा के बजाय सुधार प्रक्रिया से गुजार कर उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल होने के अवसर प्रदान किए जाएं। यह स्थापित सिद्धांत किशोर अपराधियों की बाबत सबसे ज्यादा लागू होता है। 
संगीन अपराधों में संलिप्त किशोरों को कठोर सजा देने के पक्षधर इस मनोवैज्ञानिक तथ्य को समझने में चूक कर बैठते हैं कि सजा की कठोरता नहीं, सजा की सुनिश्चितता अपराधों को रोकने में ज्यादा कारगर साबित हो सकती है। और यह एक हकीकत है कि वर्तमान कानून में किशोरों की सजा लगभग सुनिश्चित होती है।

किशोर न्याय अधिनियम, 2000 के स्थान पर नया कानून लाने से पहले यह समीक्षा करना भी जरूरी हो जाता है कि पुराने कानून में क्या कमी रह गई थी? सच्चाई यह है कि कानून में कमी नहीं थी, बल्कि संबंधित कानून के अधिकतर प्रावधानों को लागू ही नहीं किया जा सका है। इस कानून के बन जाने के तेरह वर्ष बाद भी पुलिस, अभियोजन पक्ष, अधिवक्ताओं, दंडाधिकारियों और अदालतों को कानून के प्रावधानों की पर्याप्त जानकारी नहीं है। किशोरों के विरुद्ध दर्ज हो रहे लगभग तीन चौथाई मुकदमे ऐसे हैं  जो दर्ज ही नहीं होने चाहिए थे। किशोरों की दो तिहाई गिरफ्तारियां गैर-कानूनी हैं। किशोरों को सरकारी संरक्षण में रखने के लिए कानून में बताई गई व्यवस्था कहीं भी उपलब्ध नहीं है। इस कानून के लगभग अस्सी प्रतिशत प्रावधान देश में लागू ही नहीं हो पाए हैं। फिर यह समझ से परे है कि पुराना कानून बदल कर नया कानून लाने की तैयारी क्यों चल रही है?

कानून बनाने वालों को कानून लागू करने वालों से यह जरूर पूछना चाहिए कि अब तक जिला मुख्यालयों पर किशोर अपराधियों को रखने के लिए निरीक्षण गृह,’ ‘विशेष गृह,’ ‘सुरक्षित स्थान,’ ‘बाल भवन,’ और देखभाल के बाद रखने के लिए कानून-सम्मत मुकम्मल व्यवस्था क्यों उपलब्ध नहीं है। सामुदायिक सेवा, परामर्श केंद्र और किशोरों की सजा से संबंधित अन्य साधन अभी तक क्यों विकसित नहीं हो पाए हैं

कितने प्रतिशत किशोर बार-बार अपराधों में शामिल हो रहे हैं और क्यों? राज्य का संरक्षण पाने के हकदार कितने बच्चों को सरकारी संरक्षण में रखने के उचित साधन राज्यों के पास हैं? इन प्रश्नों का सही उत्तर मिलने के बाद ही इस प्रश्न का उत्तर मिलेगा कि क्या पुराने कानून को बदलने की जरूरत है? हमें यह समझ लेना चाहिए कि अगर कानून पूर्ण रूप से लागू ही नहीं होंगे तो उन्हें बार-बार बदलने से कोई फायदा नहीं होने वाला है।

किसी भी कानून को बदलने से पहले उसके प्रभाव का आकलन जरूरी होता है। उच्च स्तर पर निगरानी करके यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कानून का एक-एक प्रावधान सत्यनिष्ठा से क्रियान्वित किया गया है। फिर यह समीक्षा होनी चाहिए कि कानून अपने निर्धारित उद्देश्यों में कितना सफल हो पाया है? इसके बाद ही यह निर्णय होना चाहिए कि उस कानून को बदलने की जरूरत है, या नहीं।
कानून आपराधिक मंशा को सजा देता है, न कि व्यक्तिको। दस से अठारह वर्ष की उम्र के बच्चों की संख्या कुल जनसंख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत है, जबकि इस उम्र के किशोरों की कुल घटित अपराधों में भागीदारी लगभग एक प्रतिशत है। 

यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि बचपन अबोध होता है। आपराधिकता बच्चों का स्वाभाविक गुण नहीं है। किशोर किसी के बहकावे में आकर, अज्ञानवश या उचित मार्गदर्शन के अभाव में अपराध करते हैं। इसके लिए सामान्य कानूनों के तहत उन्हें दंडित करना उचित नहीं होगा। दंड उन लोगों को मिलना चाहिए जो किशोरों को बहकाने या उनका उचित लालन-पालन करने में कोताही बरतते हैं। 

अपराध जगत में प्रवेश कर गए किशोरों को सुधार कर सही रास्ते पर लाना राष्ट्रीय दायित्व है। उन्हें अपराधियों की तरह कारागार में ठूंसने के उपाय ढूंढ़ना अपरिपक्व सोच का ही परिचायक कहा जा सकता है।

वर्तमान किशोर न्याय अधिनियम, 2000 बहुत सोच-समझ कर बनाया गया है। इसमें किशारों और बच्चों के संपूर्ण विकास को ध्यान में रखा गया है। अलबत्ता शायद धन और शासकीय प्राथमिकता के अभाव में यह कानून ठीक से लागू नहीं हो पाया है। इसे बदलने से कुछ नहीं होगा। अपराध-मानसिकता के मूल कारणों को समझते हुए उन्हें दूर करने के उपाय करना, कानून में कठोर सजा के प्रावधान करने से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है, विशेषकर किशोरों के मामलों में। बचपन को नाथने की जिद में बचपन को छोटा करना गलत अवधारणा है। अपराध की गंभीरता को आधार बना कर किशोरों का वर्गीकण करना और भी अधिक गलत सोच का परिचायक है। अगर ऐसा होता है तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमारी भरी गई हामियां झूठी पड़ जाएंगी। अनेक किशोर सभ्य समाज का हिस्सा बनने के अवसर से वंचित रह जाएंगे। 

जनसत्ता  से साभार  


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