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Friday, July 4, 2014

भारत में पेट की कीमत चुकाता बचपन


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भारत में बाल मजदूरों की संख्या 65 % गिरी
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सरकारी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वर्ष 2001 की जनगणना के मुकाबले बाल मजदूरों की तादाद में 65 फीसदी गिरावट आई है। लेकिन बच्चों के हित में काम करने वाले संगठनों ने सरकार के इन आंकड़ों का खंडन करते हुए कहा है कि पूरे देश में बाल मजदूरों की तादाद और उन पर होने वाले अत्याचार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।
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विकास और प्रगति के तमाम दावों के बावजूद भारत में 44 लाख बाल मजदूर हैं। हालांकि 2001 के मुकाबले तादाद में कुछ गिरावट आई है लेकिन पांच से 14 साल की उम्र वर्ग के 43.5 लाख बच्चे अब भी विभिन्न क्षेत्रों में मजदूरी करते हैं। 

देश में सबसे ज्यादा नौ लाख बाल मजदूर उत्तर प्रदेश में हैं और उसके बाद महाराष्ट्र (पांच लाख) का नंबर है। केंद्र सरकार की ओर से वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर जारी ताजा आंकड़ों से यह तथ्य सामने आया है। लेकिन बच्चों के हित में काम करने वाले संगठनों के मुताबिक, देश में बाल मजदूरों की तादाद इससे बहुत ज्यादा है। पेट की आग बुझाने के लिए लाखों नौनिहालों का बचपन झुलस रहा है। 

केंद्र सरकार के आंकड़ों में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश में ज्यादातर बाल मजदूर ग्रामीण इलाकों में काम करते हैं। मिसाल के तौर पर उत्तर प्रदेश के नौ लाख बाल मजदूरों में से सात लाख ग्रामीण इलाकों में काम कर रहे हैं। पूरे देश में ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले बाल मजदूरों की तादद 32.7 लाख है, जबकि शहरी इलाकों में यह तादाद 10.8 लाख है। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 18 साल या उससे कम के बाल मजदूरों का योगदान 11 फीसदी है।

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Haribhoomi से साभार ( 5 July 2014) 



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