मध्यप्रदेश लोक सहभागी साझा मंच

कविता- कोई मुझको बचाने वाला है!


अली सरदार जाफ़री की नज़्म

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मां है रेशम के कारखाने में
बाप मसरूफ़ सूती मिल में है
कोख से मां की जब से निकला है
बच्चा खोली के काले दिल में है

जब यहां से निकल के जाएगा
कारखानों के काम आएगा
अपने मजबूर पेट की खातिर
भूख सरमाये की बढ़ाएगा

हाथ सोने के फूल उगलेंगे
जिस्म चांदी का धन लुटाएगा
खिड़कियां होंगी बैंक की रौशन
खून इसका दिए जलाएगा

यह जो नन्हा है भोला भाला है
खूनीं सरमाये का निवाला है
पूछती है यह इसकी खामोशी
कोई मुझको बचाने वाला है!

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