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Tuesday, April 9, 2013

मध्यप्रदेश के स्कूलों में पढ़ाई कम, पिटाई ज्यादा


अमिताभ पाण्डेय

मध्यप्रदेश के अनेक स्कूलों में पढ़ाई करने वाले बच्चे शिक्षकों के गुस्से का शिकार बन रहे हैं। ज्ञान का दान देने वाले शिक्षक स्कूलों में बच्चों को पीट रहे हैं। पिटाई ऐसी कि बच्चों को उपचार के लिए तत्काल अस्पताल पहुंचाना जरूरी हो जात है। बैतूल जिले में तो पिछले दिनों शिक्षक की पिटाई से एक बच्चे की मौत हो गई जबकि दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में बच्चों के साथ होने वाली मारपीट की घटनाओं पर प्रभावी कार्यवाही भी नहीं हो पाती है। ऐसे में बच्चों पर शिक्षकों का डंडा लगातार चल रहा है। शिक्षकों की मार से परेशान कई बच्चे तो स्कूल जाने का नाम सुनकर ही डरने लगे हैं। सरकार बच्चों की पिटाई को पूरी तरह रोकने में नाकाम रही है। बच्चों को मारपीट से बचाने के लिए जो कानून बनाने गये वे कागजी साबित हो रहे है जिनका शिक्षकों पर कोई असर नहीं हो रहा है। शायद यही कारण है कि स्कूलों में बच्चों के साथ मारपीट की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही है। पिछले दो वर्ष में मारपीट के शिकार बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मारपीट की घटनाएं सरकारी और निजी दोनों ही स्कूलों में लगातार हो रही है।

मध्यप्रदेश में शिक्षा के अधिकार को लेकर काम करने वाले एक जनसंगठन ‘‘मप्र लोक संघर्ष साझा मंच’’ ने 10 जिलों के 121 स्कूलों का सर्वेक्षण किया। सर्वे के दौरान स्कूलों में मारपीट के मामलों की जानकारी ली गई। इसमें यह तथ्य सामने आया कि बच्चों को छोटी छोटी सी गलतियों पर शिक्षक बड़ी सजा दे रहे हैं। पहले शिक्षक नाराज होते तो बच्चों को उठक बैठक लगवाते, मुर्गा बनने को कह देते। अब हाल यह है कि बच्चों के बाल पकड़कर उन्हें गिराया जा रहा है, डन्डे से पीटा जा रहा है, इतनी मारपीट की जा रही है कि बच्चों के हाथ, पैर में फैक्चर हो जाता है। शिक्षकों के गुस्से के कारण स्कूल पढ़ने गये बच्चे को कई बार अस्पताल में उपचार के लिए भेजने की स्थिति बन जाती है।

मप्र लोक संघर्ष साझा मंच द्वारा किये गये सर्वेक्षण में तथ्यों के आधार पर यह बताया गया कि स्कूलों में पिटने वाले बच्चों की संख्या बढ़ रही है। मतलब यह है कि शिक्षक अपने गुस्से को काबू में नहीं रख पा रहे है। वर्ष 2011-12 में जहां 17 प्रतिशत स्कूलों में बच्चों को मुर्गा बनाने, बैंच पर खड़ा करने की सजा दी गई। वर्ष 2012-13 में बच्चों को सजा देने के मामले बढ़ गये। बच्चों को छड़ी से पीटना, घंटो खड़ा रखना सहित अन्य तरह से प्रताडि़त करने की घटनाएं बढ़ गई। वर्ष 2012-13 में बच्चों से मारपीट की घटनाओं का प्रतिशत 34 हो गया। बढ़े हुए प्रतिशत से यह जाहिर होता है कि स्कूलों में बच्चों को शारीरिक दण्ड से मुक्ति दिलाने के लिए गंभीरता से प्रयास नहीं किये जा रहे हैं। भयमुक्त शिक्षा बच्चों को नहीं मिल पा रही है। उलटा हो यह रहा है कि शिक्षक की मारपीट से बच्चे के मन में अंदर तक ऐसा डर बैठ जाता है कि वह स्कूल जाने, पढ़ाई करने के नाम से ही बचना चाहता है। बच्चे यदि लगातार स्कूलों में मारपीट की घटनाओं के शिकार बने अथवा अपने साथी बच्चों को पिटते हुए देखे तो यह स्थिति उनकी मानसिकता पर विपरीत प्रभाव डालती है।

स्कूलों में बढ़ती मारपीट की घटनाओं को लेकर मप्र लोक संघर्ष साझा मंच ने सर्वेक्षण किया है उसकी रिपोर्ट मध्यप्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग को दी गई है। आयोग की अध्यक्ष उषा चतुर्वेदी का कहना है कि वे इस रिपोर्ट का अध्ययन कर आगामी कार्यवाही करेगी। बच्चों के हक में रिपोर्ट के आधार पर तत्काल ऐसी कार्यवाही जरूरी हो गई है जो बच्चों को पिटने से बचा सके। शिक्षक अपने तनाव, गुस्से को बच्चों पर न निकालने के लिए प्रभावी प्रयास के साथ ही शिक्षकों के व्यवहार पर सतत निगरानी भी जरूरी है। शिक्षक का नाम सुनकर, स्कूल का नाम सुनकर, पढ़ाई की बात सुनकर बच्चों के मन में खुशी और उत्साह की भावना बढ़े ऐसा वातावरण बनाने की आवश्यकता है। उल्लेखनीय है कि स्कूलों में बच्चों को भयमुक्त माहौल में षिक्षा उपलब्ध कराने के लिए केन्द्र और राज्य सरकार ने अनेक नियम कानून बनाये है। ये नियम कानून षिक्षकों को बच्चों के साथ मारपीट करने से रोकने के लिए है। बच्चों को शारीरिक दण्ड देना अब अपराध की श्रेणी में आता है। षिक्षकों को स्पष्ट रूप से यह निर्देष दिये गये है कि बच्चों के साथ किसी भी प्रकार की मारपीट नहीं की जाये। केन्द्र शासन द्वारा लागू किया गया षिक्षा का अधिकार अधिनियम भी विद्यार्थियों को शारीरिक दण्ड से मुक्त षिक्षा दिये जाने की पैरवी करता है। षिक्षा का अधिकार कानून में बच्चों के साथ मारपीट को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है।

स्कूलों में बच्चों को मारपीट से बचाने के लिए अब अनेक नियम कानून बना दिये जाने के बाद भी स्थिती संतोषजनक नहीं है। षिक्षक बच्चों के साथ मारपीट कर रहे है। देष प्रदेष के गांव, शहरों के स्कूलों में बच्चों के साथ मारपीट करने की घटनाएं लगातार पढ़ने सुनने में आती है। षिक्षक बच्चों को कई बार तो ऐसे सख्त सजा देते है कि मारपीट से बच्चों के हाथ, पैर में फेक्चर हो जाता है। जोरदार पिटाई से शरीर पर निषान बन जाते है। सिर से खून बहने लगता है। स्कूलों में बच्चों के साथ पिटाई का सिलसिला कई नियम कानून बना दिये जाने के बाद भी रुक नहीं पाया है। इससे बड़ी बात यह है मारपीट करने के आरोपी षिक्षक अथवा षिक्षिका को बहुत ही कम मामलों में कड़ी सजा मिलती है। सख्त कार्यवाही नहीं होने के कारण षिक्षक, षिक्षिकाओं के गुस्से का षिकार विद्यार्थी लगातार होते रहते है। षिक्षक, षिक्षिकाओं से पिटने वाले स्कूली बच्चों में कमजोर गरीब समुदाय के बच्चों की संख्या अधिक होती है।

यहां यह बताना जरूरी होगा कि स्कूलों में बच्चों के साथ होने वाली मारपीट से उनके मन में ऐसा डर बैठ जाता है कि वे स्कूल के नाम से ही डरने लगते है। षिक्षक के प्रति उनके मन में श्रद्धा, सम्मान के स्थान पर भय की भावना आती है। यदि लगातार बच्चों के साथ मारपीट हो तो उनके मन में स्कूल, पढ़ाई के प्रति रुचि खत्म हो जाती है। प्रसंगवश  बताना आवष्यक है कि केन्द्र और राज्य सरकार पढ़ने योग्य उम्र के हर बच्चे को पढ़ाई से जोड़ने, स्कूल तक लाने के लिए विषेशअभियान चला रही है। हर वर्ष स्कूल चले अभियान के माध्यम से बच्चों को स्कूल में लाने के लिए विषेष कार्यक्रम संचालित किया जाता है। एक तरफ तो सरकार बच्चों को स्कूल में लाने के लिए विषेष अभियान चला रही है वही कुछ षिक्षक मारपीट करके बच्चों को स्कूल छोड़कर भागने के लिए मजबूर कर रहे हैं। ऐसे षिक्षक जो बेवजह बच्चों के साथ मारपीट, क्रूरतापूर्ण व्यवहार करते है उनके विरुद्ध सख्त कार्यवाही की जाना चाहिए। इसके साथ ही स्कूलों में बच्चों को उचित शैक्षणिक वातावरण में, भयमुक्त माहौल में शिक्षा  मिले इसके लिए उच्च अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों की लगातार निगरानी भी जरुरी है।

लेखक सामाजिक मुद्दों के स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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