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Wednesday, March 6, 2013

बच्चे कहां खो जाते हैं ?

डॉ ग़ीता गुप्त


च्चों के गुम होने का सिलसिला भारत ही नहीं वरन् समूची दुनिया में जारी है। पूरे विश्व में प्रति वर्ष 80 लाख से भी अधिक बच्चों की गुमशुदगी चिन्ताजनक है। अमेरिका जैसे विकसित देश में ही प्रतिदिन दो हज़ार से अधिक बच्चे लापता हो जाते हैं। भारत में प्रति वर्ष यह आंकड़ा 90,000 है। अन्तरराष्ट्रीय संगठन 'सेव द चिल्ड्रन' द्वारा जारी बाल विकास रपट के अनुसार,भारत बच्चों के लिए दुनिया के सबसे बुरे देशों में से एक है। दक्षिण एशिया में पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, अफगानिस्तान और भारत ऐसे देश हैं, जहां सर्वाधिक मासूम बच्चों के लापता होने की घटनाएं घट रही हैं। कोई नहीं जानता कि ये बच्चे कहां खो जाते हैं ?

         
 दु:ख की बात यह है कि हर देश में बच्चों का ग़लत इस्तेमाल हो रहा है और उनका जीवन अभिशाप बनता जा रहा है। नेपाल और बांग्लादेश में घर से बच्चों के पलायन का सबसे बड़ा कारण ग़रीबी और भुखमरी है। म्यांमार में राजनीतिक आन्दोलनों में बच्चों का उपयोग होता है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे देश बच्चों के हाथ में बन्दूक थमाकर उन्हें आतंकी बनने की शिक्षा देते हैं। श्रीलंका में तमिल विद्रोही संगठन लिट्टे द्वारा मासूम बच्चों को आतंकी गतिविाियों में शामिल करने की ख़बरें सामने आई हैं। भारत में तो बच्चों की चोरी और तस्करी ही नहीं हो रही है, उन्हें अगुआ और अपहृत भी किया जा रहा है। यहां घरों, विद्यालयों और समाज में ऐसा तनावपूर्ण वातावरण निर्मित कर दिया गया है कि बच्चे स्वयं ही घर से भारत जाते हैं। यहां भागने वाले बच्चों में से 30 प्रतिशत बच्चों का कुछ पता नहीं चलता। आश्चर्य की बात यह भी है कि भारत में बच्चों की चोरी या गुमशुदगी के आंकड़े दुरुस्त नहीं पाये जाते। अधिकतर मामलों में रपट तक दर्ज नहीं होती। खोये हुए बच्चों को तलाशने के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं है। कुछ बच्चे लौट भी आते हैं, अधिकतर परिस्थितियों का शिकार हो जाते हैं।

               
प्रत्येक देश में लापता बच्चों की संख्या बढ़ रही है और यह एक गंभीर समस्या का रूप ले चुकी है। ज्ञातव्य है कि पूरे विश्व में प्रति वर्ष बारह लाख बच्चों का क्रय-विक्रय होता है जिनमें सर्वाधिक संख्या भारतीय बच्चाकी होती है। मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों के अनुसार बच्चों की गुमशुदगी के मामले में दिल्ली पहले स्थान पर है। हालांकि पूरे भारत में बच्चे खो रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरों के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011 में पश्चिम बंगाल के बाद सबसे अधिक मध्यप्रदेश से 6054 बच्चे लापता हुए। स्वयंसेवी संस्था विकास संवाद द्वारा मई 2012 में जारी एक रपट के अनुसार, मध्यप्रदेश में वर्ष 2001 से 2008 में कुल 75521 बच्चे गायब हुए। इनमें से तेरह हज़ार बच्चों का कुछ पता नहीं चल सका। इस संदर्भ में दो बातें चिंताजनक हैं। एक तो,लापता बच्चों की बरामदगी में पुलिस प्राय: विफल रही है। दूसरे, जो बच्चे बरामद हुए वे मानव तस्करी का शिकार हुए थे। यानी बच्चे लापता नहीं हो रहे, उन्हें सुनियोजित ढंग से अपहृत किया जा रहा है और अनेकानेक रूपों में उनका शोषण हो रहा है। उनसे भीख मंगवाने, बेगार लेने, उनका यौन शोषण करने और उन्हें जीवन भर के लिए गुलाम बनाये रखने जैसी सच्चाइंया अब हमें नहीं चौकाती। कुछ बच्चों को अगवा करने वालों के तार सरहद पार से भी जुड़ते पाए गए,लेकिन दो तीन गिरोहों को पकड़ने के बावजूद पुलिस ने अधिक रूचि नहीं ली अन्यथा उन गिरोहों से शेष 70,000बच्चों का पता उगलवाया जा सकता था। आठ वर्ष में 75000 बच्चों की गुमशुदगी पर भी राज्य सरकार और बाल कल्याण मंत्रालय की उदासीनता आश्चर्यजनक है।

             
 सर्वोच्च न्यायालय ने मार्च 2012 में देश के 117 लाख लापता बच्चों के बारे में अटार्नी जनरल जीर्ऌ वाहनवती सहित केन्द्र व राज्य सरकारों से भी जवाब मांगा था कि उन्होंने इन बच्चों को तलाशने के लिए क्या प्रयास किये ? मगर हरियाणा, मध्यप्रदेश, मेघालय, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल, अण्डमान निकोबार द्वीप, चण्डीगढ़, दादरा और नागर हवेली, दमन-दीव, लक्षद्वीप तथा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली ने कोई जवाब नहीं दिया। हैरानी की बात तो यह है कि शीर्ष न्यायालय के आदेश के बावजूद अरुणाचल, गुजरात और तमिलनाडु के मुख्य सचिव न्यायालय में उपस्थित तक नहीं हुए। इससे ज़ाहिर है कि इन राज्यों को लापता बच्चों की कोई चिंता नहीं है। जबकि भारत में वर्ष 2000 से जुवेनाइल जस्टिस (केयर एण्ड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) एक्ट लागू है। मगर इसका प्रभाव इसलिए कहीं दिखाई नहीं देता कि अधिकतर राज्यों में यह क़ानून सिर्फ कागज़ पर है। इस क़ानून के मुताबिक, देश के हर थाने में बच्चों के गायब होने के हर मामले की एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए। हर राज्य में स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट की स्थापना होनी चाहिए और हर थाने में सादी वर्दी में एक स्पेशल जुवेनाइल पुलिस ऑफीसर तैनात होना चाहिए। पर हक़ीकत में ऐसा कहां है ?
            
   
 बच्चों की गुमशुदगी के मामले में पुलिस का रवैया इतना निराशाजनक है कि बमुश्किल 10-12 प्रतिशत मामलों की रपट दर्ज हो पाती है। और सिर्फ प्रतिष्ठित परिवारों के बच्चे गुम होने पर पुलिस अपनी सक्रियता दिखातहै। नर्धिन पीड़ित परिवार अपने लापता बच्चों की तलाश में दर-दर भटकते रहते हैं। ऐसे बहुत सारे बच्चों की सच्चाई तब सामने आती है जब उनके साथ कोई भयानक काण्ड होता है या कोई रैकेट पकड़ा जाता है। जैसे निठारी काण्ड उजागर हुआ, तभी देश को पता चला था कि एक छोटे से गांव के सौ से ज्यादा बच्चे तीन वर्ष के भीतर ग़ायब हो गए। निठारी काण्ड उपन्यास बच्चों की भयावह दुनिया का जीवन्त दस्तावेज़ हैं। जो हमें हिलाकर रख देता है। विडम्बना यह है कि आज बच्चों के लिए कोई भी जगह सुरक्षित नहीं हैं। शहरीकरण, यातायात के साानों और साक्षरता दर में जितनी वृद्धि हो रही है, उसी के अनुपात में बच्चों की गुमशुदगी का आंकड़ा भी बढ़ा है। दूसरे अपराधों की तुलना में बच्चों के गुमने की दर कई गुना अधिक है। आज संगठित आपराधिक गतिविधि के तौर पर बड़ी संख्या में बच्चों का अपराध कर उनका व्यापार किया जा रहा है।

                 
 20 नवम्बर को पूरी दुनिया बाल दिवस मनाती है और 14 नवम्बर को भारत में भी बालदिवस के बहाने बच्चों की सुरक्षा और उनके उज्ज्वल भविष्य को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। पर असल में उन्हें अच्छा वातावरण और सुरक्षा देने की ज़िम्मेदारी कोई नहीं निभाता। जबकि सर्वप्रथम परिवार का यह दायित्व है कि बच्चों का सही मार्गदर्शन करें, उन्हें अनुशासित करें। उनकी भावनाओं को समझें। उनसे संवाद करें, उन्हें अकेला न छोड़ें। मासूम बच्चों का गायब होना परिवार की लापरवाहियों, अवहेलना और आपराधिक गतिविधियों को मिला जुला दुष्परिणाम है। विद्यालयों का भी यह दायित्व है कि वे बच्चों की पढ़ाई पर ही यान केन्द्रित न रखें बल्कि घर में यदि किसी बच्चे का शोषण हो रहा हो तो हरसंभव उसके बचाव का उपाय करें। बच्चों की गतिविधियों पर ग़ौर करें, उन्हें हताशा, दु:ख, क्रोध और तनाव से बचा कर आशावादी बनायें।

               
बच्चों की रक्षा के लिए पुलिस को ईमानदारीपूर्वक सक्रिय होना चाहिए। बिना किसी भेदभाव के उन्हें सभी लापता बच्चों की खोज करनी चाहिए और दोषियों को कठोर दण्ड दिलवाना चाहिए। खोए हुए बच्चों को तलाशनके लिए एक विशेष इकाई गठित की जानी चाहिए। वह इकाई समर्पित होकर कार्य करे और बच्चों को न्याय दिलवाये। यह सरकार का दायित्व है कि वह बच्चों का शोषण करने वालों को कानून के तहत अधिकतम सज़ा दिलवाये। देश से गरीबी और अशिक्षा को दूर करने के ठोस प्रयास हों ताकि बच्चों के पोषण में बाधा न आए। बच्चों के मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के भी उपाय किये जाएं। यह नितान्त आवश्यक है। ग़ैर सरकारी संगठन भी बच्चों की सुरक्षा में योगदान कर सकते हैं और करते ही हैं। मगर अब उन्हें अधिक सक्रिय होने की आवश्यकता है। निस्संदेह, बच्चों की सुरक्षा एक गंभीर समस्या है, लेकिन परिवार, समाज, शिक्षा, संस्थान, पुलिस, कानून और सरकार-सब मिलकरभी क्या बच्चों की दुनिया को महफू.ज नहीं रख सकते ?

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