मध्यप्रदेश लोक सहभागी साझा मंच

बाल अपराध और सिसकता बचपन



शिवेंद्र मीना और रीना शर्मा



अभी कुछ महीने पहले ही जब राजस्थान के अलवर के दो गांवों में दिल्ली पुलिस राजधानी से लापता हुई लड़कियों की तलाश में पहुंची तो यह जानकार सन्न रह गई कि इस गांव में कम उम्र की गायब लड़कियों की तादाद काफी ज्यादा थी. बाकी बची लड़कियों को देखरेख के साथ पाला जा रहा था. ठीक उसी तरह जैसे बकरे की बलि चढ़ने से पहले पाला जाता है. यहां पांच-छह साल की लड़कियों को लगातार उस ऑक्सीटॉक्सिन का इंजेक्शन दिया जा रहा था जिसका इस्तेमाल अधिक कमाई के लालच में दूधवाले गाय और भैंसों से अधिक दूध पाने के लिए किया करते हैं. ताकि इन सभी बच्चियों की काया जल्द से जल्द चौदह-पन्द्रह साल की किशोरियों की तरह हो जाय. किशोरी काया में ढालने की ये अमानवीय प्रयोगशालाएं मेरठ और अलवर जैसे जगहों पर आसानी से पाई जा सकती हैं. इन अमानवीय प्रयोगशालाओं में तैयार करने के बाद इस तरह की ‘ऑक्सिटॉक्सिन पीड़ित बच्चियों’ को मोटी रकम लेकर दिल्ली, मुम्बई से लेकर सिंगापुर तक भेजा जाता है. बाल यौन शोषण का यह भयावह रूप आज भी मेरठ और अलवर की गलियों में देखी जा सकती है. समय-समय पर धड़-पकड़ भी होती है। बातें मीडिया में आती हैं। बरामदगी के कुछ दिनों के बाद उस बच्ची की याद न मीडिया को रहती है, न गैर सरकारी संस्था को, और न ही पुलिस को। वह बच्ची अगर मेरठ में पकड़ी गई थी तो उसके बाद वह आगरा पहुंच जाएगी. इस तरह बाल यौन शोषण का यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है. 
बाल यौन शोषण का यह घिनौना उदहारण तो बच्चों के विरुद्ध किए जाने वाले अपराध का एक नमूना मात्र है.  वास्तव में बच्चों के विरुद्ध किए जाने वाले अपराध की श्रेणियों  की लिस्ट बनाई जाय तो निश्चित तौर पर माथे पर  बल पड़ जाएंगे. छोटे-छोटे बच्चों को  स्कूल भेजने  के बजाय मजदूरी के काम में लगा दिया जाता है. अधिकाँश बँधुआ माता-पिता अपने बच्चों की पिटाई करते हैं. कक्षा में शिक्षक भी उनकी पिटाई करते या फिर जाति व धर्म के आधार पर उनके साथ भेदभाव किया जाता है. महिला बाल शिशु को जन्म लेने से रोका जाता है. इसके लिए उनकी गर्भ में या फिर जन्म के बाद हत्या कर दी जाती है अथवा फिर उन्हें परिवार या समाज में भेदभाव का शिकार होना पड़ता है. जन्म के बाद बालिकाओं को बाल-विवाह, बलत्कार या फिर तिरस्कार की मार अलग से झेलनी पड़ती है.
आसमान में पतंग उड़ाने, कहीं दूर तक सैर तक जाने, मजे -मौज और पढ़ाई करने वाले दिनों में अपनी इच्छाओं का दमन करके बच्चो का एक बड़ा वर्ग कहीं कल-कारखानों में, कहीं होटलों में तो कहीं उंची चहारदीवारियों में बंद कोठियों की साफ -सफाई में लगा हुआ है.  कॉलोनियों के बाहर पड़े कूडेदानों में जूठन तलाशते मासूमों, पन्नी बटोरने वालों की संख्या करोड़ों में है.  मां-बाप के प्यार से वंचित, सरकारी अनुदानों, राहतों की छांव से विभिन्न कारणों से दूर इन बहिष्कृत बच्चों को दो वक्त की रोटी तक नसीब नहीं है. इन बच्चों को सूरज की पहली किरण के साथ ही पेट की आग शांत करने की चिंता सताने लगती है। इसके लिए वे ट्रेनों, बसों व सड़कों पर केले, मूंगफली, पानी के पाउच व अखबार बेचने निकल पड़ते है। ऐसे बच्चों की भी कोई कमी नहीं है जो हाथ में पॉलिश की डिब्बी व बु्रश लिए बूट पॉलिस करते दिखाई दे जाते है। होटलों, ढाबों पर चंद पैसों की खातिर जूठन साफ करने वाले छोटू, चवन्नी हीरो, अठन्नी, भैया, पप्पू, मुन्ना हीरो, छुटकू और न जाने ऐसे कितने जाने पहचाने व अनगिनत नाम है जो दिन भर अपने मालिक के इशारे पर इधर से उधर भागते फिरते है. 

बाल शोषण : बच्चो के विरुद्ध होने वाले अपराध 


बच्चों के खिलाफ अपराधों को हम मुख्य रूप से चार भागों में बांट सकते हैं-(1) बलात्कार, (2) अपहरण, (3) छोटे बच्चों की खरीद-फरोख्त और (4) कन्या भ्रूण-हत्या. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार देश में साल 2007, 2008 और 2009 में बच्चों के खिलाफ अपराध के क्रमश: 20,410 , 22,500 और 24,201 मामले दर्ज किये गए थे . 2007 में बच्चों की हत्या के ।,377 मामले, 2008 में ।,296 मामले और 2009 में ।,488 मामले दर्ज किये गए थे जबकि 2007 में बलात्कार के 5,045 मामले, 2008 में 5,446 मामले और 2009 में 5,368 मामले दर्ज किये गए थे. 
बच्चों के अपहरण के बारे अगर बात की जाए तो 2007 में 6,377 मामले, 2008 में 7,650 मामले और 2009 में 8,945 मामले दर्ज किये गए थे जबकि वेश्यावृति के लिए लड़कियों की खरीद के 2007 में 40 मामले, 2008 में 49 मामले और 2009 में 57 मामले दर्ज किये गए थे.
उपरोक्त आंकड़ों से ये बात साफ़ हो जाता है  कि बाल शोषण आधुनिक समाज का एक घिनौना और ख़ौ़फनाक सच बन चुका है. वर्तमान  दौर में निर्दोष एवं लाचार बच्चों को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने की घटनाएं इतनी आम हो चुकी हैं कि अब तो लोग इस ओर ज़्यादा ध्यान भी नहीं देते. जबकि वास्तविकता यह है कि बाल शोषण बच्चों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है. सामान्यतया हम यही मान कर चलते हैं  कि बाल शोषण का मतलब बच्चों के साथ शारीरिक या भावनात्मक दुर्व्यवहार है, लेकिन सीडीसी (कंसलटेंसी डेवलपमेंट सेंटर) के अनुसार, बच्चे के माता-पिता या अभिभावक द्वारा किया गया हर ऐसा काम बाल शोषण के दायरे में आता है, जिससे बच्चे पर  बुरा प्रभाव पड़ता हो या ऐसा होने की आशंका हो या जिससे बच्चा मानसिक रूप से भी प्रताड़ित महसूस करता हो. भारत में हालत ऐसी है कि अक्सर बाल शोषण के वजूद को ही को सिरे से नकार दिया जाता है, लेकिन सच यह है कि ख़ामोश रहकर हम बच्चों के साथ दुर्व्यवहार की वारदातों को बढ़ावा ही दे रहे हैं. देश में बाल शोषण की घटनाओं को ऐसे अंजाम दिया जाता है कि दोषी के साथ-साथ पीड़ित बच्चे भी खुलकर सामने नहीं आते. पीड़ित बच्चे शर्मिंदगी के चलते कुछ भी बोलना नहीं चाहते. इसके पीछे भी हमारी सामाजिक बनावट और मानसिकता काफी हद तक ज़िम्मेदार है. हम भी ऐसे बच्चों को कुछ अलग नज़र से देखने लगते हैं. संभवत: इसी लज्जा के चलते उन्हें दुनिया की निगाहों में ख़ौ़फ नज़र आता है. पश्चिमी देशों में हालात ऐसे नहीं हैं. शिक्षा के कारण वहां का समाज और वहां के बच्चे निडर होकर अपनी बात कह सकते हैं. वहां के बच्चों में कम से कम इतना साहस तो होता ही है कि वे दुनिया को खुलकर अपनी आपबीती बता सकें. 
केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा यूनीसेफ के सहयोग से कराए गए एक अध्ययन के परिणामों से जो बात सबसे ज़्यादा उभर कर सामने आई है, वह यह है कि 5 से 12 साल तक की उम्र के बच्चे बाल शोषण के सबसे ज़्यादा शिकार होते हैं. हैरत की बात यह है कि हर तीन में से दो बच्चे कभी न कभी शोषण का शिकार रहे हैं. अध्ययन के दौरान लगभग 53.22 प्रतिशत बच्चों ने किसी न किसी तरह के शारीरिक शोषण की बात स्वीकारी तो 21.90 प्रतिशत बच्चों को भयंकर शारीरिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा. इतना ही नहीं, क़रीब 50.76 प्रतिशत बच्चों ने एक या दूसरे तरह की शारीरिक प्रताड़ना की बात कबूली. 

बाल मजदूरी : रोता बचपन 


तमाम कोशिशों के बाद भी दुनिया में बच्चों की एक बड़ी आबादी मेहनत की भटटी में तपने को मजबूर है.  देश के भावी कर्णधार मजदूरी में अपने बचपन की खुशियों को गिरवी रख देते हैं. जिन बच्चों के हाथों में खिलौने ,कागज - कलम , कापी - किताब ,स्लेट - पेंसिल होनी चाहिए थी , उन नाजुक हाथों में औरों के जूते पालिश करने के ब्रश , दूसरों के पढने के लिए स्लेट - निर्माण की सामग्रियां ,पत्थर तोडने के हथौडे अथवा द्री - कालीन बुनने के लिए धागों का जाल होता है ,जिसके मकडजाल में उनकी जिंदगी पिसती रहती है .
जिन बच्चों को मां - बाप की गोद में होना चाहिए था या भाई - बहन की बांहो में जिनको दुलार मिलना चाहिए था , वे भयंकर शीतलहरी, तपती दोपहरी या घनघोर वर्षो के थपेड़ो या जलती भटठियों के शिकार होते हैं. वे मिटटी के दीये या मोमबत्ती जलाकर दीवाली नहीं मनाते बल्कि अपना बचपन सुलगाकर, उंगलियां जलाकर अमीर बच्चों की दीवाली के उत्सव के लिए पटाखे या मोमबत्ती बनाते हैं.कानून किताबों में पड़ उंघ रहा है। क्योंकि उसे जगाने वाले हाथ देखकर भी कुछ नहीं करते बल्कि कई बार तो वह खुद ही कानून तोड़ते नजर आते हैं। और इस पर भी दर्दनाक बात यह कि बच्चों के मुददे कभी विधानसभा और संसद में गंभीरता और नियमितता से उठाए ही नहीं जाते क्योंकि बच्चों का कोई वोट बैंक नहीं होता, बच्चों के मुददे जनप्रतिनिधियों को चर्चा में नहीं लातेदेश में बालमजदूरों की संख्या 2001 की जनगणना के मुताबिक लगभग सवा करोड़ है। जबकि स्वयंसेवी संस्थाओं के मुताबिक यह संख्या दो करोड नब्बे लाख है।  मप्र में यह आंकड़ा दस लाख के आसपास है। मतलब दस लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं। बेहतर शिक्षा से वंचित हैं और शारीरिक -मानसिक विकास से भी। भारतीय संविधान संशोधन के बाद देश के चौदह वर्ष तक के में हर बच्चे को अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा अधिकार दिया गया है। जाहिर है यह दस लाख बच्चे इस हक से तो महरूम हैं ही पर यह संविधान का सीधे -सीधे मखौल उड़ाने वाला प्रहसन भी है। संयुक्त राष्ट महासभा ने 1989 में बच्चों के अधिकारों से संबंधित एक महत्वपूर्ण घोषणा पत्र जारी किया था। बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण की व्यवस्था, निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा, और बालश्रम को दूर कर संरक्षण की व्यवस्था। यह उस घोषणापत्र के तीन मुख्य बिंदु थे। लेकिन इस घोषणापत्र के लगभग सत्रह साल पूरे हो जाने के बाद भी स्थितियों में कोई खास सुधार नहीं आ पाया है।   

जानवरों से भी सस्ती दर में बिकते बच्चे 


"बचपन बचाओ आंदोलन" द्वारा चौबीस राज्यों में सूचना के अधिकार के तहत दाखिल अर्जियों के बाद प्राप्त  आंकड़ों के अनुसार भारत में हर रोज करीब 165 व साल भर में 60 हजार बच्चे लापता हो जाते हैं। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा  बच्चे गायब हुए हैं. पश्चिम बंगाल दूसरे नंबर पर है और दिल्ली तीसरे नंबर पर है. बचपन बचाओ आंदोलन के संस्थापक कैलाश सत्यार्थी के मुताबिक ज्यादातर लापता बच्चों को गैरकानूनी ढंग से अलग-अलग काम पर लगाया जाता है या उनके शरीर के अंग बेचे जाते हैं. जानवरों से भी सस्ती दर में बच्चों को बेचा जाता  है. जहां एक भैंस की कीमत कम से कम पंद्रह हजार रूपए होती है वहीं देश में बच्चों को पांच सौ रूपए से लेकर 25 सौ रूपए में आसानी से बेचा जाता है. अधिकतर बच्चों से या तो मजदूरी कराई जाती है या सेक्स वर्कर का पेशा कराया जाता है.
बाल व्‍यापार के क्षेत्र में भारत स्रोत, गंतब्य और पारगमन केंद्र के रूप में काम कर रहा है. नेपाल और बंगला देश से बच्चे यहाँ लाये जाते हैं. यहाँ से बड़ी तायादात में बच्चे अरब देशों में ले जाए जाते हैं. अरब देशों में कम उम्रकी लड़कियां भी सप्लाई की जाती हैं जिनका शोषण ईय्यास और कामुक दौलतमंद शेखों के द्बारा किये जाते हैं. इनमें मुस्लिम लड़कियों की संख्या ज्यादा होती हैं और जो मुस्लिम नहीं भी होती हैं उन्हें भी मस्लिम बनाकर पारगमन कराया जाता है.  इसके अलावा अन्य देशों में घरेलु मजदूर और जानवरों की चरवाही के लिए मासूम बच्चों को ले जाया जाता है.
दिल्ली में सबसे ज्यादा गुमशुदगी दिल्ली में बच्चों के गुम होने या अपहरण से सम्बंधित मामले अधिक हैं। दिल्ली में प्रत्येक दिन 17 बच्चे गुम होते हैं जिसमें से 6 कभी भी नहीं मिलते हैं। ‘इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार चारों महानगरों में गुमशुदगी सम्बंधित मामलों में दिल्ली पहले स्थान पर है। आरटीआई के अंतर्गत प्राप्त सूचना के अनुसार जनवरी 2008 से अक्टूबर ’10 तक दिल्ली से 13,570 बच्चे गुम हुए और 1 जनवरी ’11 से 26 अप्रैल ’11 तक 550 बच्चे गुम हुए हैं। गुम हुए बच्चों में सर्वाधिक 12-19 वर्ष की लड़कियां हैं और सामान्यत: 0-19 वर्ष तक के लड़के व लड़कियां हैं। 90 प्रतिशत गुम हुए बच्चे झुग्गी-झोपड़ियों व स्लम के हैं। दिल्ली का उत्तरी-पूर्वी जिला गुमशुदा बच्चों के मामले में प्रथम स्थान पर है। 70 प्रतिशत गुमशुदा बच्चे पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के रहने वाले हैं। दिल्ली में गुम हुए कुल बच्चों में से 80 प्रतिशत पलायित लोगों के, 50 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय से, 80 प्रतिशत एससी/एसटी और ओबीसी समुदाय से तथा 90 प्रतिशत बच्चे असंगठित क्षेतों में कार्य करने वाले मजदूरों के हैं.

देहव्यापार: अहम अपराध

बच्चों द्वारा कराए जाने वाले अपराधों में सेक्स टूरिज्म या देह-व्यापार में उन्हें लगाना सबसे प्रमुख है। यह एक संगठित अपराध है जिसमें बड़े पैमाने पर बच्चों को धकेला जा रहा है। एक अन्य तरीके से बच्चों का अंग-भंग कर उनसे भीख मंगवाने का भी व्यवसाय चल रहा है जिसका सबसे बड़ा केन्द्र कानपुर है। इसी तरह जेब काटने के धंधे के लिए गाजियाबाद एक बड़े प्रशिक्षण केन्द्र के तौर पर उभरा है। ड्रग्स की सप्लाई या तस्करी के काम के लिए जिस प्रशिक्षण की जरूरत होती है, उसे उपलब्ध कराने वाला सबसे बड़ा केन्द्र मुम्बई है। इधर, चाइल्ड पोनरेग्राफी के रूप में बच्चों के खिलाफ अपराध का एक नया बाजार तैयार हुआ है। पिछले चार-पांच वर्षों में इस अपराध में काफी उछाल आया है। यह एक प्रकार का सायलेंट क्राइम है जिसे हम साइबर क्राइम के अंतर्गत रख सकते हैं। इसकी तरफ मां-बाप का, एनजीओ का और पुलिस का भी ध्यान बहुत कम है। अगर इन पर ध्यान दिया जाए तो अपराध के आंकड़ों में जबरदस्त उछाल आ जाएगा। स्कूलों में शिक्षकों द्वारा बच्चों के यौन शोषण की भी एक नई प्रवृत्ति इधर बड़े पैमाने पर देखने में आ रही है जिसे देखते हुए स्कूलों के नियम- कानूनों में भी बदलाव लाने की जरूरत सामने आई है।

उकसाने वाले दो कारक

बच्चों के खिलाफ अपराध को उकसाने वाले कारकों को हम दो भागों में बांट कर समझ सकते हैं-पुश फैक्टर और पुल फैक्टर। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तबाही, कृषि में गिरावट, अशिक्षा और गरीबी को हम पुश फैक्टर के तौर पर समझ सकते हैं जबकि पुल फैक्टर में शहरी चमक-दमक या आकर्षण, फिल्मों के मायालोक और संगठित गिरोहों के पल्रोभनों को रखा जा सकता है। बच्चों के उत्पीड़न को देखने के नजरिये में आज दुनिया के पैमाने पर काफी परिवर्तन आया है पर हमारे देश में बच्चों के हित में काम करने वाली मशीनरी आज भी पुराने र्ढे पर ही काम कर रही है। जहां तक पुलिस के नजरिये की बात है तो वह पूरी तरह भारतीय दण्ड संहिता से बंधी हुई है और इसलिए वह केवल पेनिट्रेटिव सेक्स को ही यौन हिंसा मानती है जबकि आज परिदृश्य काफी बदल गया है। 1992 में संयुक्त राष्ट्र समझौते का अनुमोदन करने के बाद भारत को अब वही नीति लागू करनी होगी जो संधि में दी गई है। इसके अनुसार किसी भी उम्र में बच्चे का यदि किसी वयस्क द्वारा अपनी यौन संतुष्टि के लिए किसी भी तरह से उपयोग किया जाता है तो ऐसा करना यौन उत्पीड़न के दायरे में आएगा। उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ करना, उसे गंदी तस्वीरें या फिल्में आदि दिखा कर उत्तेजित करना भी यौन उत्पीड़न के अंतर्गत ही माना जाएगा। आज हमें अपने कानूनों को इसी हिसाब से पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है। सरकार भी इसे मानती है। हमें इस मुद्दे पर एक सामाजिक जागरूकता लाने के लिए भी काम करना होगा।

अपराध की भेंट चढ़ता देश का बचपन (बाल अपराध )

नेशनल क्राइम रिकॉड्‌र्स ब्यूरो के नवीनतम आंकड़े देश के भविष्य की ख़ौ़फनाक तस्वीर पेश करते हैं. उनके मुताबिक़ पूरे देश में अपराधों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इससे भी ज़्यादा चिंता की बात यह है कि बाल अपराधों की संख्या में भी तेजी से वृद्धि हो रही है. पिछले दस वर्षों यानी 1998-2008 के बीच बच्चों द्वारा किए गए अपराधों में ढाई गुना इज़ा़फा हुआ है और कुल अपराधों की तुलना में बाल अपराधों का अनुपात भी दोगुने से ज़्यादा हो चुका है. ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, साल 1998 में बाल अपराधों की कुल संख्या 9352 थी, जो 2008 में बढ़कर 24,535 हो गई. देश भर में दर्ज किए गए कुल आपराधिक मामलों के प्रतिशत के लिहाज़ से देखें तो 1998 में बाल अपराधों का प्रतिशत केवल 0.5 था, जो 2008 में 1.2 प्रतिशत के आंकड़े को छू चुका है. यदि लगातार दो वर्षों के आंकड़ों पर नज़र डालें तो 2007 में बच्चों द्वारा किए गए कुल अपराधों की संख्या 22,865 थी, जो 2008 में बढ़कर 24,535 हो गई. यानी एक साल के अंदर बाल अपराधों की संख्या में तक़रीबन 7.3 प्रतिशत की वृद्धि हो गई. इससे पहले वर्ष 2007 में 2006 के मुक़ाबले बाल अपराधों की संख्या में 8.4 प्रतिशत का इज़ा़फा दर्ज किया गया था. ये तो केवल वे आंकड़े हैं, जो पुलिस थानों में दर्ज किए गए हैं. यह बात किसी से छुपी नहीं है कि अपराध के लगभग आधे मामले पुलिस के पास नहीं पहुंच पाते या पहुंचते भी हैं तो उन्हें दर्ज नहीं किया जाता. इस तथ्य को ध्यान में रखकर यदि इन आंकड़ों पर ग़ौर करें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि देश का बचपन लगातार अपराध की आगोश में समाता जा रहा है.

सफेद हाथी बने विभिन्न राष्ट्रीय आयोग 

देश का संविधान बिना किसी भेदभाव के सभी बच्चों की हिफाजत, देखभाल, विकास और शिक्षा की गारंटी देता है। बाल मजदूरी, बंधुआ मजदूरी, शिक्षा और बाल अधिकारों से सम्बंधित अनेक कानून बने हुए हैं। किंतु इन पर अमल करने की किसी की भी जवाबदेही नहीं है। बाल अधिकारों की रक्षा के लिए राष्ट्रीय व राज्य आयोग बनाए गए हैं। लेकिन यह जानकर हैरानी होगी कि ढिंढोरा पीटने वाले राष्ट्रीय आयोग को पिछले साल भर में देश भर से बच्चों के उत्पीड़न की कुल 75 शिकायतें ही मिली। इनमें से दिल्ली से 13 और उप्र से 6 शिकायतें थीं। इनमें भी ज्यादातर शिकायतें स्कूली छात्रों के साथ हुई मारपीट की थीं। सफेद हाथी बने इन आयोगों से भला कौन पूछे कि इतने भारी भरकम बजट की कीमत पर इन्होंने कितने बच्चों को उत्पीड़न से बचाया? हमारी जानकारी में तो एक भी बच्चे को बंधुआ मजदूरी से छुटकारा दिलाकर पुनर्वासित करने की कोई घटना नहीं है। न ही बलात्कार, अपाहिज बनाकर जबरिया भीख मंगवाने, बाल वेश्यावृत्ति की किसी घटना पर उनका ध्यान जाता है, इंसाफ दिलाना तो दूर की बात है।

संविधान और अंतरराष्ट्रीय संधि

बच्चों के अधिकारों से सम्बंधित अन्तरराष्ट्रीय संधि से बंधे होने के साथ-साथ हम अपने देश के संविधान द्वारा बच्चों से किए गए उन वादों के लिए भी जवाबदेह हैं, जो उन्हें स्वस्थ और सम्मानपूर्ण हालात में विकास करने का सम्पूर्ण अवसर देने के लिए किए गए थे। लेकिन आज स्थिति यह है कि बच्चों के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। हम हर अन्तरराष्ट्रीय संधि पत्र पर हस्ताक्षर तो कर देते हैं पर बदकिस्मती से जमीनी स्तर पर उसे लागू करने का प्रयास ही नहीं करते। गरीबी और अशिक्षा इसके लिए दो सबसे बड़े उत्पादक कारक हैं। इन्हीं कारणों से जमीनी स्तर पर कोई कार्यवाही शुरू नहीं हो पाती। बच्चों के अधिकार सुनिश्चित करने के लिए बजट में जो प्रावधान होने चाहिए वह आज भी उपलब्ध नहीं कराया गया है। हमारे पास जरूरतमंद बच्चों के पुनर्वास के लिए आश्रय तक नहीं हैं। जो हैं वे अपराधी बच्चों के सुधार-गृह हैं। मजबूरी में हम मासूम बच्चों को भी अपराधी या आरोपित बच्चों के साथ रखते हैं। यह असंवेदनशीलता धड़ल्ले से बरती जा रही है। पुनर्वास व्यवस्था की कमी के चलते ही हम फुटपाथों पर बच्चों को भीख मांगते देखते हैं पर कुछ हस्तक्षेप नहीं कर पाते। हमारे देश की पुलिस की मानसिकता आज भी औपनिवेशिक दौर में है जबकि बच्चों के मामले में पुलिस से ज्यादा मानवीय और संवेदनशील रवैया रखने की अपेक्षा होती है। पुलिस के प्रशिक्षण पर आज विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

समस्या के त्रि-आयाम

बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराध की समस्या को हमें तीन तरह से देखना होगा। एक तो हमारे देश में एक दीर्घकालिक नीति की आवश्यकता है जिसके तहत बच्चों का पुनर्वास एक लम्बी प्रक्रिया में किया जा सके। बच्चों के मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए अब तक इस दिशा में कुछ भी नहीं किया जा सका है। जिन पाश्चात्य देशों की तर्ज पर हमने अपने रिमांड होम्स बनाए हैं, उन्होंने अपने यहां उन्हें पूरी तरह बदल लिया है पर हम किसी किस्म के बदलाव की दिशा में नहीं सोच रहे। देश के सुधार-गृहों पर सरकार को एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए ताकि देश की जनता उनकी वास्तविक स्थिति का पता चल सके। सरकार ने मुश्किल परिस्थितियों में फंसे बच्चों की हिफाजत और उनके पुनर्वास के लिए बाल कल्याण समितियों की स्थापना तो कर दी पर उन्हें बिल्कुल अक्षम बना कर रखा है। इन समितियों में जहां प्रतिबद्ध और जानकार लोगों की जरूरत थी, वहां आज केवल राजनीतिक सम्पकरे की वजह से ही उनमें लोग रखे जा रहे हैं और इसका खमियाजा बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। इस व्यवस्था में बच्चों के लिए नियुक्त ज्यूडिशियरी काम के बोझ से इतनी दबी हुई होती है कि वह बच्चों की जरूरतों को समझ ही नहीं पाती।

नोडल एजेंसी की जरूरत


देश के पुलिस थानों की तरह वे भी सीमा-विवाद में उलझे रहते हैं और इस कारण समय पर बच्चों को समुचित मदद नहीं मिल पाती। जरूरत इस बात की है कि बच्चों के सम्पूर्ण विकास और उनके संरक्षण के लिए एक ही नोडल एजेंसी हो तथा इस मकसद के लिए आम नागरिकों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाए। वर्तमान कानूनों की वजह से अक्सर आम नागरिक बच्चों की मदद करने से घबराते हैं। बच्चों के खिलाफ अपराधों की रोकथाम में बाल सुरक्षा आयोग की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो सकती थी पर चूंकि उसके पास कोई न्यायिक अधिकार नहीं है, इसलिए वह भी प्रभावकारी हस्तक्षेप नहीं कर पा रहा। वह अभी एक सलाहकार समिति भर है। इतने सीमित संसाधनों के होते हुए वह कोई योगदान कर पाएगा ऐसा सोचना बेवकूफी ही होगी। जब तक इसे भी एससीएसटी आयोग की तरह प्रभावकारी बनाने के लिए संसद द्वारा पारित नहीं किया जाएगा, यह कोई भी प्रभावकारी भूमिका निभाने में सक्षम नहीं हो सकेगा। पर यह सब करने के लिए बच्चों के प्रति एक जिम्मेदारी का अहसास और कुछ बदलाव लाने की इच्छाशक्ति का होना बहुत जरूरी है। फिलहाल तो ये दोनों ही चीजें दृश्यपटल से ओझल हैं।



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