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Tuesday, March 20, 2012

बाल अपराधों में मध्य प्रदेश सबसे आगे


Posted by harpalkhabar on Monday, February 13, 2012

भोपाल : जब हम बाल अपराधों की बात करते हैं तो मध्य प्रदेष बाल अपराधों के मामले में प्रथम स्थान पर है, खासकर लड़कियों के मामले में राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड व्यूरो 2009-10 के अनुसार मध्य प्रदेष में बाल अपराध के 4646 केस दर्ज किए गए जिनमें से 337 केस इंदौर शहर के हैं। इसमें 1071 बालिकाओं के साथ योन हिंसा जैसे घिनौने कृत्य हुए हैं। जो पूरे भारत के केस के 20 प्रतिषत हैं। इसमें भी मध्य प्रदेष प्रथम स्थान पर है।

इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए हिफाजत नेटवर्क द्वारा क्षेत्रीय ग्रामीण विकास प्रषिक्षण केन्द्र, राऊ, इंदौर में एक दिवसीय कंसल्टेषन का आयोजन किया। इस आयोजन में विभिन्न संस्थाओं एवं विभागों के प्रतिनिधियों ने भागीदारी की। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में श्रम विभाग मध्य प्रदेष के प्रदेष कमिष्नर सी.एल. पांडे उपस्थिति थे। श्री पांडे ने अपने उद्बोधन में कहा कि एक योजना के रहते हुए हमें नई योजना लागू करने की जरूरत नहीं हैं इसके वजाय जो योजना पहले से चल रही है हम उसे बेहतर तरीके से संचालित करें और विभागों के बीच समन्वय कायम कर वंचित समूह को लाभ दिलाएं।

कार्यक्रम के शुभारंभ में हिफाजत संस्था की रेखा श्रीधर ने अपने प्रस्तुतिकरण में जे.जे. एक्ट के प्रमुख बिंदुओं को प्रस्तुत करते हुए असुरक्षा में रहने वाले बच्चों की स्थिति के बारे में जानकारी दी। आपने बताया कि मध्य प्रदेष में 12777 बच्चे प्रतिवर्ष गुम हो रहे हैं। प्लेटफार्म पर रहने वाले बच्चों की स्थिति पर बात करते हुए बताया कि हर रोज 4 नए बच्चे प्लेटफार्म पर आते हैं। इसके साथ ही पूरे मध्य प्रदेष में 22321 बच्चे ऐसे हैं जो प्लेटफार्म पर तो आए लेकिन इनकी पहचान नहीं हो सकी यानी ये बच्चे वापस अपने घर नहीं जा सके।
दीनबंधु संस्था इंदौर की बेलू जी ने बार -बार विस्थापन द्वारा किस तरह एक बच्चे के विकास के अधिकार को छीनता है, और उसे हासिए पर बना रहने को मजबूर करता है।

मध्य प्रदेष लोक संघर्ष साझा मंच, के राजेष भदौरिया ने षिक्षा के अधिकार पर बात करते हुए कहा कि षिक्षा का अधिकार कानून में बच्चों को शारीरिक दंड और मानसिक उत्पीड़न पर रोक लगा दी गई है फिर भी आए दिन षिक्षकों द्वारा बच्चों को दंड देने की घटनाएं जारी हैं। बच्चों के साथ हो रहे इस उत्पीड़न को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने की जरूरत है। उन्होंने मंच द्वारा म.प्र. के 170 स्कूल में किए गए अध्ययन के प्रमुख अंष रखते हुए बताया कि इनमें से 21 शालाओं में बच्चों के साथ मारपीट, मुर्गा बनाना, बंेच पर खड़े करना, घुटने के नीचे कंकड़ रखकर घुटनों के बल खड़ा करना, गाली देना, आदि उत्पीड़न की घटनाएं होती है।

म.प्र. में बच्चों की सुरक्षा की स्थिति से संबंधित स्थितियों को कैसे बेहतर किया जाए इस बारे में भागीदार संस्था के प्रतिनिधियों द्वारा रणनीति तैयार की गई।

sources- http://www.harpalkhabar.com

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