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Wednesday, March 21, 2012

मध्यप्रदेश लोक संघर्ष साझा मंच द्वारा योजना आयोग के गरीबों की संख्या की रिपोर्ट को लेकर जारी प्रेस नोट


प्रेस नोट
दिनांक 21 मार्च 2012



भोपाल -; आज दिनांक  21 मार्च २०१२ को भोपाल के गाँधी भवन में मध्यप्रदेश  लोक संघर्ष साझा मंच द्वारा   योजना आयोग  के दिनांक 19 मार्च 2012 को जारी की गई गरीबों की संख्या  की रिपोर्ट को लेकर एक प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया गया .

योजना आयोग ने 19 मार्च 2012 को जारी की गई अपनी रिपोर्ट में जो  दावा किया है कि देश में गरीबों की संख्या कम हो गई है। इस बारे में आयोग ने राज्यवार आंकड़े भी दिए हैं कि किस राज्य में अब कितने गरीब रह गए हैं। गरीब परिवारों की कमी के मामले में हमारा मध्य प्रदेश भी उन तथाकथित श्रेष्ठ राज्यों की श्रेणी में गिना गया है जहां गरीबी 10 प्रतिशत से अधिक कम हुई है। 

तेंदुलकर समिति के फार्मूले पर तैयार इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2004-05 में देश में गरीबों की संख्या 40.72 करोड़ थी, जो वर्ष 2009-10 में घट कर 35.46 करोड़ हो गई है. दूसरे शब्दों में कहें तो पहले 37.2 प्रतिशत आबादी गरीब थी, जिनकी संख्या घट कर वर्तमान में 29.8 प्रतिशत हो गई है.

सवाल यह है कि सरकार आखिर यह पता कैसे करती है कि कितने रूपए खर्च करने के बाद आदमी गरीब नहीं रह जाता है। मौजूदा आंकड़ों को देखें तो मध्य प्रदेश  के ग्रामीण क्षेत्रों में 631.9 रूपया मासिक यानी 21 रूपए प्रतिदिन तक राशि  प्रतिदिन खर्च करने वाला व्यक्ति गरीबी रेखा सूची में शामिल होगा। और नगरीय क्षेत्र में 771.7 रूपए मासिक यानी 25.72 रूपए तक राषि प्रतिदिन खर्च करने वाला व्यक्ति ही गरीबी रेखा सूची में शामिल होगा।

मध्य प्रदेश के संदर्भ में योजना आयोग के इन आंकड़ों से गत 5 वर्षों में 53.9 लाख गरीब बी.पी.एल. की सूची से बाहर हुए हैं। जब कि प्रदेष में कुपोषण की स्थिति लगातार कई वर्षों से गंभीर बनी हुई है और सरकार के तमाम दावों के बाद भी 50 प्रतिश त से अधिक बच्चे प्रदेश  में कुपोषित हैं। प्रधान मंत्री जिस कुपोषण को स्वीकार कर चुके हैं उस कुपोषण की इतनी भयावह स्थिति के बाद भी प्रदेश  में गरीबी घटने का दावा करते योजना आयोग के यह आंकड़े प्रदेश की सच्चाई से अलग कुछ और ही तस्वीर पेश कर रहे हैं। 

कुपोषण की यह स्थिति इस बात को साफ करती है कि प्रदेश  के गरीब परिवारों में खाद्य सुरक्षा नहीं है जिसकी वजह से बच्चों को मिलने वाले पोषक आहार पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहे हैं। और भारी तादाद में प्रदेश के बच्चे कुपोषण की जकड़ में आ रहे हैं। मौजूदा आंकड़ों के अनुसार जो 53.9 लाख गरीब परिवार अब गरीबी रेखा से बाहर हो जाएंगे उनकी खाद्य सुरक्षा पर संकट होने के साथ बच्चों का भविष्य भी खतरे में है।    

ज्ञात हो कि, माह सितंबर 2011 में देश के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की अध्यक्षता के अंतर्गत आधारभूत संरचना और मानव विकास के लिए पुख्ता योजना बनाने का दावा करने वाली केन्द्र सरकार की संस्था योजना आयोग ने उच्चतम न्यायालय को बताया था कि खानपान पर शहरों में 965 रुपये और गांवों में 781 रुपये प्रति महीना खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीब नहीं माना जा सकता है. गरीबी रेखा की नई परिभाषा तय करते हुए योजना आयोग ने कहा था कि, इस तरह शहर में 32 रुपये और गांव में हर रोज 26 रुपये खर्च करने वाला व्यक्ति बीपीएल परिवारों को मिलने वाली सुविधा को पाने का हकदार नहीं है. अपनी यह रिपोर्ट योजना आयोग ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष हलफनामे के तौर पर पेश की थी. 

योजना आयोग ने गरीबी की इस नई परिभाषा को तय करते समय 2010-11 के इंडस्ट्रियल वर्कर्स के कंस्यूमर प्राइस इंडेक्स और तेंडुलकर कमिटी की 2004-05 की कीमतों के आधार पर खर्च का लेखा-जोखा दिखाने वाली रिपोर्ट पर गौर किया है. 
इस हलफनामें पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का कहना था कि 2004 में दिहाड़ी मजदूरी 12 रु. और 17 रु. थी, लेकिन वर्तमान समय में क्या वास्तव में इतने पैसे में गुजारा हो सकता है. न्यायाधीशों का यह भी कहना था कि सरकारी कर्मचारियों के वेतन में भी साल में कम से कम दो बार बदलाव होता है, लेकिन गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने के मानदंडों में सात साल में कोई बदलाव नहीं करना आश्चर्य पैदा करने वाला है.

वर्तमान में योजना आयोग द्वारा गरीबी रेखा के लिए जो आंकड़े तय किए गए हैं वे योजना आयोग द्वारा दिए गए अपने हलफनामें की राशि  से भी कम हैं। जोकि बहुत ही दुखद  हास्यास्पद और दुर्भाग्यपूर्ण है। 

आज देश का गरीब आदमी अपने ही नीतिनिर्धारकों द्वारा तय किये गए आर्थिक उदारीकरण की मार झेल रहा है. उसकी जमीन, पानी और रोजी-रोटी राज्य द्वारा ही कब्जाई जा रही हैं ताकि सब कुछ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और धन्ना-सेठों की खनन, सेज और दूसरे प्रोजेक्टों, आदि के लिए दी जा सके। जहाँ एक ओर पिछले 10 सालों में देश के कारपोरेट घरानों को 22 लाख करोड रूपये टेक्स आदि में छूट के माध्यम से दे दिया गया है, वहीं देश के गरीब आदमी को सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी को खत्म करने की सोची-समझी रणनीति के तहत, योजना आयोग, मनमोहन सिंह के नेतृत्व में शर्मनाक तरीके से गरीबी नहीं गरीबों को हटाने का काम कर रहा है. 
सवाल यह है कि आखिर योजना आयोग के योजनाकारों के समझ में यह क्यों नहीं आता कि जिस देश में महंगाई दर 10 फीसदी की दर से बढ़ रही हो वहां का आम आदमी गांव में 22 रूपए प्रतिदिन और शहर में 28.6 रूपए प्रतिदिन में कैसे गुजारा कर सकता है.

वही वल्र्ड बैंक जिसके बारे में कहा जाता है कि वह आम आदमी के बारे में नहीं सोचता वह केवल अपने निवेशकों के बारे में सोचता है, नें भी गरीबी रेखा के ऊपर की न्यूनतम आय 2 डॉलर यानि 96 रूपये तय की है और हमारे जन हितैशी  कही जाने वाली और तथाकथित रूप् से गरीबों की पक्षधर सरकार बहुत ही बेषर्मी से 22 रूपए और 28.6 रूपए प्रतिदिन से ज्यादा खर्च करने वाले को गरीब नहीं मान रही है। कुल मिलाकर योजना आयोग की रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि सरकार का लक्ष्य गरीबी को कम करना नहीं वल्कि वह आंकड़ों की बाजीगरी दिखाकर कागजों में ही विकास दरसा  रही है। 

सरकार की इन्हीं नीतिओं के कारण अब तो चिकित्सा, शिक्षा, रोजगार, और आवास की बात करना भी बेमानी है देश की गरीब जनता के सामने तो अब दो जून की रोटी का सवाल ही मुंह बाए खड़ा हो गया है.
मध्यप्रदेष लोक संघर्ष साझा मंच एवं सहयोगी संस्थाएं  इसका पुरजोर विरोध करते हैं और सरकार से यह मांग करती हैं कि केंद्र सरकार योजना आयोग के इस अमानवीय रिपोर्ट को तत्काल  वापस ले  .
साथ ही साथ हम मध्य परदेश सरकार से येः मांग करते हैं की वोह योजना आयोग के इस रिपोर्ट पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए मध्य प्रदेश के वस्तुस्थिति  और जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए इसका विरोध करे , ताकि प्रदेश में बड़े पैमाने पर गरीब योजना आयोग के इस आंकड़ों की बाजीगरी  के चलते जो थोड़ी बहुत योजनाओं का लाभ पा रहे हैं उससे भी वंचित न रह जायें 

इस प्रेस कांफ्रेंस को मध्य प्रदेश लोक साँझा मंच की ओर से जावेद अनीस ,रोली शिवहरे , राजेश भदौरिया , उपासना बेहार, ललित दुबे , विभा मिश्र ने संबोधित किया .

मध्यप्रदेश  लोक संघर्ष साझा मंच

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