Sunday, March 25, 2012

म.प्र. बजट 2012 - दिशाहीन


जसविंदर सिंह


 कुपोषण और शिशु मृत्यु दर के मामले में मध्यप्रदेश की स्थिति तो राष्ट्रीय की तुलना में कहीं अधिक बदतर है। हाल ही में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की रिर्पोट ने खुलासा किया है कि मध्यप्रदेश में 578 बच्चे अपना पहला जन्मदिन मनाने से पहले ही इस दुनियां से विदा हो जाते हैं। डायरिया, मलेरिया बुखार जैसी बीमारियां भी बच्चों की मौत का कारण हो जाती हैं। प्रदेश के 82 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। आदिवासी क्षेत्रों में तो 93 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। इनमें से 15 प्रतिशत बच्चे तो अति कुपोषित हैं। आप पूरे बजट पर नजर डालें तो कुपोषण को दूर करने के लिए राज्य सरकार ने कोई गंभीर पहल नहीं की हैं।

28 फरवरी को विधानसभा में पेश बजट और उससे एक दिन पूर्व विधानसभा में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण 2011-12 को यदि एक साथ जोड़कर देखा जाये तो प्रदेश की असली तस्वीर साफ दिखाई देती है। जब भाजपा प्रदेश को स्वर्णिम प्रदेश कह रही है। और विपक्ष ने इस बजट को दिशाहीन बताया है। तब यह बजट प्रदेश के संसाधनों की कारपोरेट घरानों, राजनेताओं और माफियाओं को लूट का औजार है। यह बजट प्रदेश की सात करोड़ जनता की कीमत पर कुछ औद्योगिक घरानों को की तिजोरियों को भरने का बजट है।

वित्त मंत्री के बजट भाषण और आर्थिक सर्वेक्षण में जिन आंकड़ों के सहारे प्रदेश के विकास की पटकथा लिखी जा गई है, उन्हीं आंकड़ों को खंगाल कर देखने से समझा जा सकता है कि विकास की इन ऊंची मचानों को खड़ा करने के लिए कितनी झौंपडिय़ों को राख किया गया है। वित्त मंत्री ही नहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा नेताओं ने भी प्रदेश की विकास दर की बात कह कर कहा है कि पिछले एक साल में राज्य में प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हुई है। लेकिन इस वृद्धि को यदि हम राष्ट्रीय स्तर पर हुई प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के साथ तुलना करके देखते हैं तो हमें अपना पिछड़ापन साफ दिखाई देता है। भाजपा की राज्य सरकार खुश है कि राज्य में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 32222 रुपये हो गई है, किंतु इसी समय राष्ट्रीय पैमाने पर प्रति व्यक्ति आय 53331 हो गई है।

इस वृद्धि को दो तरह से देखना होगा। एक तो राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर आय के बीच अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्ष 1999-2000 में राष्ट्रीय स्तर पर प्रति व्यक्ति 15839 रुपये थी, तब प्रदेश की प्रति व्यक्ति औसत आय 12 384 रुपये थी। उल्लेखनीय है कि 1999-2000 में राज्य की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्र की प्रति व्यक्ति औसत आय की तुलना में 3455 रुपये कम थी। अब जब राज्य की प्रति व्यक्ति आय के 32222 रुपये पर पहुंचने के ढोल पीटे जा रहे हैं, तब राष्ट्रीय और राज्य की प्रति व्यक्ति औसत आय में अंतर बढ़कर 21109 रुपये हो गया है। हमारा पिछडऩा जारी है।

दूसरा जो वृद्धि बताई जा रही है, वह भी राज्य के असमान विकास को ही रेखांकित करती है। विधानसभा में 27 फरवरी को प्रस्तुत मध्यप्रदेश आर्थिक सर्वेक्षण के में वर्ष 2009-10 के विभिन्न जिलों की प्रति व्यक्ति आय का ब्यौरा दिया गया है। इस ब्यौरे के अनुसार तब जब राज्य की प्रति व्यक्ति आय 28571 रुपये थी, तब इंदौर जिले में प्रति व्यक्ति आय राज्य की औसत आय के दुगने से भी ज्यादा थी तथा व राष्ट्रीय प्रतिव्यक्ति आय से भी उपर थी। इस सर्वेक्षण में प्रदेश के 45 जिलों के प्रति व्यक्ति आय को दर्शाया गया है, इसमें इंदौर की प्रति व्यक्ति आय 64 हजार 573 रुपये है। इसके अलावा राजधानी भोपाल में प्रति व्यक्ति आय 58 हजार 174 रुपये, जबलपुर जिले में प्रति व्यक्ति आय 45 हजार 326 रुपये, ग्वालियर जिले में यह आय 39328 रुपये और उज्जैन में 38 हजार 611 रुपये थी। इसके अलावा होशंगाबाद, हरदा, रतलाम, सीधी, शाजापुर और छिंदवाड़ा सहित 12 जिलों की प्रति व्यक्ति आय 30 हजार रुपये से ज्यादा है। जबकि 33 जिलों की प्रति व्यक्ति आय राज्य की प्रति व्यक्ति औसत आय से कम हैं, इनमें से 11 जिलों की आय तो 20 हजार रुपये से भी कम है। इनमें मंडला जिले की प्र्रति व्यक्ति आय 16 601 रुपये, डिंडोरी जिले की 17701 रुपये, बड़वानी की 17683 रुपये टीकमगढ़ की 18879 रुपये, पन्ना की 19730 रुपये मुरैना की 19907 रुपये, श्योपुर जिले की 19833 रुपये, रीवा की 18 316 रुपये, उमरिया की 18978 रुपये,झाबुआ की 18391 रुपये, और शिवपुरी जिले की प्रति व्यक्ति आय 19728 रुपये है। इसके अलावा तीन जिलों भिंड की यह आय 20202 रुपये, छतरपुर की 20032 रुपये और खरगौन की 20429 रुपये है।

इस तस्वीर से स्पष्ट हो जाता है, कि प्रदेश में चंद बड़े शहरों में चकाचौंध और वहां के लिए जुटाये जा रहे संसाधनों को ही भाजपा सरकार ने विकास समझ लिया है। कुछ विकसित जिलों को छोड़कर प्रदेश भर में पिछड़ेपन और गरीबी का बोलबाला है। जिसे दूर करने के कोई ठोस प्रयास राज्य सरकार के इस बजट में दिखाई नहीं देते हैं।

विडंबना यह है कि राज्य और राज्य की प्राथमिकताएं राज्य सरकार की प्राथमिकताएं नहीं हैं। इसमें दो राय नहीं हो सकती है कि कृषि संकट ओर कुपोषण हमारे प्रदेश की दो बड़ी और बुनियादी समस्यायें हैं। विधानसभा में प्रस्तुत किसान आत्महत्याओं के आंकड़े ही कृषि संकट को समझने के लिए पर्याप्त हैं। विधान सभा के इसी बजट सत्र में गृह मंत्री द्वारा विधानसभा में प्रस्तुत इन आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में हर रोज पांच कृषक आत्महत्या करते हैं। मध्यप्रदेश की गिनती उन पांच राज्यों में होती है, जिनमें सबसे ज्यादा आत्महत्यायें होती हैं। उनमें भी राज्य का स्थान चौथा है।

राज्य सरकार ने अफवाहों का बाजार गर्म किया था कि अलग से किसान बजट पेश किया जाने वाला है। मगर इस बजट में बातों बातों में तो कृषि राज्य सरकार की प्राथमिकता में है, लेकिन कृषि संकट को दूर करने के लिए राज्य सरकार ने कोई ठोस पहल नहीं की है। आज भी जब राज्य की कुल जनसंख्या का 68.84 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करता है, कृषि व्यवसाय पर ही ग्रामीण आबादी की निर्भरता है। इसके बाद भी राज्य की जीडीपी यानिकि कुल घरेलु सकल उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी सिकुड़ती जा रही है। वर्ष 2004-05 में जब संभवत: राज्य के वित्त मंत्री ने अपना पहला बजट पेश किया था, उस समय राज्य की जीडीपी में कृषि का हिस्सा 25.97 प्रतिशत था। जोकि अब 2010-11 घटकर 20.53 प्रतिशत रह गया है। यह वित्तमंत्री और भाजपा की राज्य सरकार की आठ साल की सरकार की कृषि विरोधी नीतियों का नतीजा है कि जिस व्यवसाय से प्रदेश की तीन चौथाई आबादी की जीविका निर्भर है, उस क्षेत्र की जीडीपी में हिस्सेदारी आठ सालों में 5.44 प्रतिशत कम हुई है। वित्तमंत्री ने अपने पिछले साल के बजट पर भी ढींगे हांकते हुए कहा है कि किसान उनकी पहली प्राथमिकता है। किंतु आंकड़े कुछ और ही कहते हैं। वर्ष 2009-10 में राज्य की जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 21.94 प्रतिशत था, जो 2010-11 में घटकर 20.53 फीसद रह गया है। इसका अर्थ है कि एक साल में ही कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी में 1.41 प्रतिशत की कमी आई है।

अब यह अर्थशास्त्र तो भाजपा और राघव जी ही समझा सकते हैं कि जब राज्य के कुल घरेलू सकल उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी कम होती जा रही है, तब राज्य सरकार किसानों के लिए कल्याणकारी नीतियों और किसानों के विकास की बात कर रही है।

सही बात तो यह है कि भाजपा प्रदेश सरकार को अपने वायदे ही याद नहीं। चुनाव घोषणापत्र में भाजपा ने किसानों के 50 हजार रुपये तक के ऋण माफ करने का वादा किया था। मगर धीरे धीरे सरकार इस वायदे से पीछे हट गई है। पिछले बजट तक वित्तमंत्री का कहना हुआ करता था कि चुनावी वायदे पांच साल में पूरे करने होते हैं, एक बजट में नहीं। मगर इस बार वित्तमंत्री ने इस वादे को पूरा करने से साफ इनकार करते हुए कहा है कि 1 प्रतिशत की ब्याज दर से ऋण उपलब्ध करवा कर राज्य सरकार इस वायदे को पूरा कर दिया है। जबकि यह कर्ज किसानों को सहकारी समितियों से खाद उपलब्ध करवाकर ही मिलना था। सहकारी समितियों तक तो केवल 30 प्रतिशत किसानों की ही पहुंच है। प्रदेश में खाद की किल्लत और कालाबाजारी के कारण इनमें से भी कई किसानों को बाजार से कालाबाजारी में खाद खरीदने के लिए साहूकारों और महाजनों से कर्ज लेना पड़ा है। जो उन्हें 36 प्रतिशत से लेकर 60 फीसद की ब्याज दर पर लेना पड़ा है।

कृषि संकट के समाधान के लिए जरूरी है कि कृषि में सार्वजनिक निवेश को बढ़ाया जाये। मगर राज्य सरकार ने इम मामले में केवल जुबानी खर्च ही किया है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार ही राज्य की कुल कृषि का मात्र 32.24 प्रतिशत ही सिंचित है। जबकि गैर सरकारी अनुमानों के अनुसार केवल 24 प्रतिशत कृषि भूमि ही सिंचित है। जब सरकार प्रदेश में कृषि विकास के ऊंचे दावे कर रही है, तब सिंचाई के मामले में प्रदेश का स्थान 13वां है। सिंचाई के विस्तार के लिए राज्य सरकार ने कोई पहल नहीं की है। बजट में सिंचाई के विस्तार के लिए 1550 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। जबकि पिछले साल की तुलना में मंहगाई की वृद्वि दर भी इसी के आसपास है। कुल मिलाकर इस बजट से न तो कृषि संकट का समाधान होने वाला है और न ही कृषि लाभ का व्यवसाय बनने जा रही है, जैसा कि दावा किया जा रहा है।

हाल ही में प्रधानमंत्री ने भी बाल कुपोषण को राष्ट्रीय शर्म बताया है। कुपोषण और शिशु मृत्यु दर के मामले में मध्यप्रदेश की स्थिति तो राष्ट्रीय की तुलना में कहीं अधिक बदतर है। हाल ही में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की रिर्पोट ने खुलासा किया है कि मध्यप्रदेश में 578 बच्चे अपना पहला जन्मदिन मनाने से पहले ही इस दुनियां से विदा हो जाते हैं। डायरिया, मलेरिया बुखार जैसी बीमारियां भी बच्चों की मौत का कारण हो जाती हैं। प्रदेश के 82 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। आदिवासी क्षेत्रों में तो 93 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। इनमें से 15 प्रतिशत बच्चे तो अति कुपोषित हैं। आप पूरे बजट पर नजर डालें तो कुपोषण को दूर करने के लिए राज्य सरकार ने कोई गंभीर पहल नहीं की हैं।

प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधायें इस हद तक बदतर हो गई हैं। कि केन्द्रीय लेखा परीक्षक कैग की वर्ष 2009 की तक में इस मिशन को लेकर बड़े घोटाले की संभावना बताई गई है। यह तब है जब इस मिशन पर अमल के कागजी घोड़ों पर सवार होकर राज्य सरकार वाहवाही भी लूट चुकी है, तथा केन्द्र से पुरस्कार भी प्राप्त कर चुकी है। मगर कैग की रिर्पोट के अनुसार इस मिशन पर हजारों करोड़ रुपये करने के बाद भी जमीनी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। इसलिए जब सरकार इनाम पा रही है, तब गांवों में डाक्टरों की भर्ती का कोई प्रावधान नहीं हो पाया है। जो प्रस्ताव था भी उसे वित्त विभाग दबा कर बैठा हुआ है।

इसके चलते पैसा खर्च हो जाने के बाद भी न तो कुपोषण में कमी आई है न ही खून की कमी की शिकार गर्भवती महिलाओं की संख्या में कमी हो पायी है।

कैग की रिर्पोट ने प्रदेश के स्वास्थ्य की जो तस्वीर पेश की है, उसके अनुसार प्रदेश के 90 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र बंद होने की कगार पर हैं। मातृ मृत्यु दर को कम न करने के पीछे एक कारण यह भी है कि प्रदेश के 334 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में से 249 केन्द्रों पर निश्चेतन विशेषज्ञ ही नहीं है। निश्चेतन विशेषज्ञ न होने के कारण सीजेरियन प्रसव नहीं हो पा रहे हैं, जाहिर है कि इसका खामियाजा जच्चा और बच्चा दोनों को ही भुगतना पड़ रहा है। सरकार की महिला सशक्तिकरण का दावा करने वाली सरकार महिलाओं को लेकर कितनी संवेदनशील है, इसका अंदाजा इस बात से लग जाता है कि प्रदेश के 334 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में से 289 पर स्त्री रोग विशेषज्ञ नहीं हैं। जिसका अर्थ यह है कि स्त्री रोग विशेषज्ञों के स्वीकृत 334 पदों में से केवल 45 ही भरे हुए हैं, बाकी 289 पद रिक्त हैं।

शिशु मृत्यु दर कम करने के सरकार के दावों और मुख्यमंत्री द्वारा बच्चों को गोद में लेकर प्रदेश भर में फोटो टंगवाने के सस्ते प्रचार पाने की जमीनी सच्चाई यह है कि प्रदेश में शिशु रोग विशेषज्ञों के 572 पद स्वीकृत होने के बावजूद वर्तमान में 322 पद ही भरें जा सके हैं, तथा शिशु बाल रोग विशेषज्ञों के भी 250 पद रिक्त पड़े हुए हैं। कैग की इस रिर्पोट के अनुसार प्रदेश में 27 फीसद बच्चों की मृत्यु केवल बुखार आने, 45 प्रतिशत की मृत्यु निमोनिया से 8 प्रतिशत की डायरिया से हो जाती है। सरकार की लापरवाही को उजागर करते हुए रिर्पोट में कहा गया है कि भरपूर बजट होने के बावजूद प्रदेश में आशा ऊषा के 50 पद भरे ही नहीं गए हैं। यह भी माना जा रहा है कि 2009 के बाद स्थिति में सुधार होने की बजाय बिगाड़ ही हुआ है। इसके बाद भी राज्य सरकार का बजट देखने से लगता ही नहीं है कि यह बजट उस राज्य का है, जहां स्वास्थ्य की स्थिति इतनी बदतर है।

पिछले नौ साल से सरकार दावा कर रही है कि उसकी नीतियां रोजगारोन्मुखी हैं। लेकिन राज्य के औद्योगिक विकास और रोजगार की जमीनी हकीकत तो आर्थिक सर्वेक्षण में ही सामने आई है। इसके अनुसार 2007 में सरकारी विभागों में काम करने वाले नियमित कर्मचारियों की संख्या 4 लाख 63 हजार 813 थी। मगर 2011 में यह संख्या 4 लाख 45 हजार 856 रह गई है, यानिकि इसमें 17 हजार 956 की कमी आई है। इसी प्रकार इसी अवधि में राजकीय सार्वजनिक उपक्रमों व शासकीय संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या 76 हजार 516 से घटकर 61855 रह गई है। जहां भी 14 हजार 661 रोजगार कम हुए हैं। विकास प्राधिकरण व विशेष क्षेत्र विकास संस्थानों में इसी दौरान कार्यरत कर्मचारियों की संख्या 1905 से घटकर 1804 रह गई है। जहां 101 रोजगार कम हुए हैं। प्रदेश के विभिन्न विश्व विद्यालयों में इसी अवधि में कर्मचारियों की संख्या 9645 से घटकर 7666 पर आ गई है। जहां भी 1979 रोजगार कम हो गये है।

सार्वजनिक क्षेत्र में भी रोजगार की कमी तो इससे कहीं ज्यादा है। वर्ष 2005-06 में राज्य में सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या 9 लाख 6 हजार 100 थी, जबकि 2009-10 में यह संख्या घटकर 8 लाख 46 हजार 908 रह गई है। साफ है कि सार्वजनिक क्षेत्र में 59 हजार 192 रोजगार कम कर दिये गये हैं। राज्य सरकार जब महिला सशक्तिकरण का राग अलाप रही है, तब 2005-06 में सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं की संख्या 1 लाख 23 हजार 717 थी, जो 2009-10 में घटकर 1 लाख 21 हजार 67 रह गई है। इस प्रकार सशक्तिकरण के नारों के बीच 2650 महिलाओं के रोजगार कम हो गए हैं। इस प्रकार रोजगार देने के ऊंचे दावों के बीच इस सरकार द्वारा बीते पांच सालों में 93 हजार 889 रोजगार कम कर दिये गये हैं। सरकार ने राज्य कर्मचारियों को केन्द्र के समान मंहगाई भत्ता देने की बात तो की है, मगर उनके एरियर को डकार लिया है।

सरकार की ओर से रोजगार के नए अवसर पैदा करने के दावों की हवा तो इस बजट में ही निकल गई है जब कहा गया कि इस दौरान केवल 17 नए उद्योग लगे हैं। निजी क्षेत्र के इन उद्योगों में तो प्रदेश भर में स्थाई रोजगार लगातार कम हो रहे हैं। ठेके पर काम करवा कर न केवल श्रम कानूनों की धज्जियां उड़ रही हैं, बल्कि न्यूनतम वेतन कानून को उल्लधन कर श्रमिकों का अधिकतम शोषण हो रहा है।

इस बजट में पैट्रोल पर वैट में 1.75 प्रतिशत कम किया गया है। हांलाकि इसके बाद भी यह वैट 27 प्रतिशत है, जो दूसरे राज्यों से बहुत अधिक है। किंतु इसके बाद भी इससे राजस्व को कोई नुकसान शायद ही हो, क्योंकि यदि आने वाले दिनों में पैट्रोल की कीमतें बढ़ जाती हैं तो उससे राज्य की वेट की ऊंची दर से इसकी भरपाई हो जायेगी। इस बजट में राज्य सरकार ने 145 करोड़ की कर राहत जनता को दी है। इसके साथ ही 260 करोड़ के नए कर लगाये गये हैं। जिससे साफ है कि इस बजट के माध्यम से सरकार जनता से 115 करोड़ रुपये वसूलने जा रही है। विद्युत पर भी वैट लगाकर तो इस सरकार ने विद्युत कंपनियों की लूट को ही वैधानिकता दे दी है।

इस सरकार का जनता को लूटने का जरिया है सेल्स टैक्स। सेल्स टैक्स लगाने को लेकर सरकार का अर्थशास्त्र भी समझ से परे है। जब प्रदेश में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों की संख्या 44.6 फीसद से बढ़कर 48.6 फीसद हो गई है, तो जाहिर है कि जनता की क्रय शक्ति कम हुई है। इसके साथ ही जब राज्य सरकार राज्य की प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि की बात कर रही है, तो इसे भी दूसरे राज्यों से तुलना करके देखा जाना चाहिये। वर्ष 2009-10 में जब राज्य की प्रति व्यक्ति आय 28 571 रुपये थी, तब दिल्ली की प्रति व्यक्ति आय 1 लाख 16 हजार रुपये थी। इससे साफ होता है कि दिल्ली की जनता की क्रय शक्ति अधिक है। किंतु दिल्ली में सेल्स टैक्स 8 प्रतिशत है और मध्यप्रदेश में 28 प्रतिशत। इसके साथ ही 1 प्रतिशत प्रवेश शुल्क अलग से लगा है।

कुल मिलाकर इस बजट में न तो सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत करने की सरकार की मंशा दिखाई देती है। न सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों दलित आदिवासी महिलाओं व अल्पसंख्यकों के कल्याण की योजनायें इस बजट में हैं। कुल मिलाकर यह बजट महंगाई बढ़ाने वाला बजट है। यह बजट जनता पर बोझ थोपाने वाला तथा उसकी तकलीफों को बढ़ाने वाला बजट है। सूत्र रूप में कहें तो जनविरोधी बजट।


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