Monday, March 12, 2012

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक-2011 में बच्चों की खाद्य सुरक्षा

मध्यप्रदेश लोक संघर्ष साझा मंच  द्वारा संसदीय समिति को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 के सन्दर्भ में भेजा गया सुझाव



मध्यप्रदेश लोक संघर्ष साझा मंच 
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक-2011 में बच्चों की खाद्य सुरक्षा



प्रति,
अध्यक्ष एवं सभी सदस्य,
संसदीय समिति,
उपभोक्ता मामलों, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय,
संसद सचिवालय,
नई दिल्ली
,
विषय: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 के सन्दर्भ में सुझाव.

आदरणीय सभी महोदय,

अभिवादन,

उपरोक्त विषय के सन्दर्भ में हम, मध्यप्रदेश लोक संघर्ष साझा मंच की ओर से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 में बच्चों की खाद्य सुरक्षा के नज़रिए से अपने विश्लेकषणात्मक सुझाव प्रस्तुत कर रहे हैं. भारत में विस्तार और गहराई से फैले कुपोषण के संकट के सन्दर्भ में जरूरी है कि इस विधेयक में ईमानदारी से पोषण की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले हक़ प्रदान किये जाएँ. यहाँ ईमादारी से आशय यह है कि सरकार बार-बार अपनी सीमाओं का हवाला देकर हकों को इतना सीमित करने की कोशिश न करे, जिनसे हमारा मकसद ही भटक जाए. मध्यप्रदेश लोक संघर्ष साझा मंच  एक बच्चों के अधिकारों पर काम करने वाला स्वेच्छिक  संगठनों, संस्थाओं और व्यक्तियों का समूह है, जो पिछले 4 वर्षों से मध्यप्रदेश बच्चों के भोजन के अधिकार के मुद्दे पर काम कर रहा है. इसीलिए हमें लगता है कि आप लोगों की उपस्थिति में इस विधेयक को बाल केद्रित बनाए जाने की कुछ संभावनाएं शेष हैं.
मध्यप्रदेश के नज़रिए से यह विधेयक और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है. यहाँ राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण - 3 के मुताबिक़ 60 प्रतिशत बच्चे कुपोषण की श्रेणी में आते हैं, राज्य में शिशु मृत्यु दर 62 है, जो की देश में सबसे  ज्यादा है. मध्यप्रदेश में खाद्य असुरक्षा का प्रत्यक्ष कारण आजीविका की असुरक्षा और संसाधनों पर से लोगों के घटते हक़ हैं. इसलिए बच्चों की खाद्य असुरक्षा को उन नीतियों की सन्दर्भ में देखे जाने की जरूरत है, जिनके कारण प्रदेश के बच्चों में भुखमरी और पोषण की असुरक्षा लगातार बढती जा रही है. कुपोषण को ख़त्म  करने के सभी प्रयास ज्यादा संस्थाओं और केन्द्रों की स्थापना के साथ जुड़े रहे हैं. हमें कुपोषण और भुखमरी के बुनियादी कारणों, (जैसे कृषि और खाद्यान्न उत्पादन के संकट, केवल गेहूं और चावल के उत्पादन को प्रोत्साहनस्थानीय खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर नीति बनाने वालों की कोई समझ न होना और केन्द्रीयकरण की नीतियां बनना, दालों और खाद्य तेलों तक लोगों की पंहुच कम होना;) को ईमानदारी से समझना और स्वीकार करना होगा.  यदि यह विधेयक इन पक्षों पर मौन रहता है, तो यह तय है कि यह क़ानून बिलकुल बेकार साबित होगा.
गरीबी हमारे लिए बड़ी चुनौती है; परन्तु हमें इस सवाल का जवाब तो खोजना ही होगा कि गरीबी के कारण कुपोषण बढ़ रहा है या फिर कुपोषण के कारण गरीबी बढ़ रही है. मध्यप्रदेश के सन्दर्भ में हमारा अबुभाव बताता है कि कुपोषित होने के कारण लोगों की शारीरिक और मानसिक क्षमताएं प्रभावित हुई है, जिनके कारण वे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं और आजीविका की साधनों का उपयोग भी नहीं कर पा रहे हैं.  हमें पहले उनका कुपोषण दूर करना होगा, तभी वे विकास की धारा में शामिल हो पायेंगे. मध्यप्रदेश ही एक ऐसा राज्य है जहाँ वर्ष 1990 के स्थिति में 43.56 प्रतिशत लोग गरीब थे, जो वर्ष 2010 में बढ़ कर 48.6 प्रतिशत हो गए. यही वह दौर भी था जब कुपोषण भी 54 प्रतिशत से बढ़ कर 60 प्रतिशत हो गया. सह्त्राब्दी विकास लक्ष्यों के तहत गरीबी के स्तर  को 43.56 प्रतिशत से घटा कर 21.78 प्रतिशत पर लाया जाना था, परन्तु हम इस लक्ष्य से बहुत दूर होते गए हैं. इसका मतलब है कि जब तक खाद्य असुरक्षा और कुपोषण को पहले दूर नहीं किया जाएगा तब तक ना तो गरीबी कम होगी न ही विकास के दावों पर विश्वास किया जा सकेगा.
  • सबसे पहले सरकार के प्राथमिक-सामान्य और इनसे बची हुई तीसरी श्रेणी के भेदभाव को ख़त्म करना होगा. देश में गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोगों का कभी भी सही चुनाव नहीं हो पाया है। इसके चलते वे भुखमरी की स्थिति में तब तक बने रहने के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं, जब तक कि वे मर ना जाएँ. कृपया इस भेदभाव को मिटाईए. इसके बाद सबसे वंचित लोगों के लिए अतिरिक्त और विशेष प्रावधानों की बात की जाए. गरीब-अमीर की रेखा के विभाजन का सबसे पहला असर बच्चों पर पड़ता है.
  • जब तक लोगों को उनकी जरूरत का पूरा भोजन नहीं मिलेगा तब तक  समाज का एक वर्ग भूख के साथ ही जिएगा. कृपया 7 किलो और 3 किलो के प्रावधान को 14 किलो के प्रावधान में बदलिए.
    केवल अनाज से भुखमरी  और कुपोषण नहीं मिटेगा; जब तक अनिवार्य रूप से इसमें दालों और खाने के तेल का प्रावधान नहीं होगा. प्रति व्यक्ति एक किलो दाल और 800 ग्राम तेल का प्रावधान किया जाए.
  • यह  विधेयक एकीकृत बाल विकास परियोजना को मौजूदा रूप में ही और केवल पोषण वितरण के कार्यक्रम के साथ लागू करने की बात करता है. जबकि इस परियोजना में ढांचागत बदलाव करने की जरूरत है. सरकार को कहना चाहिए कि यह परियोजना बच्चों के पोषण, स्वास्थय और समग्र विकास के कार्यक्रम के रूप में स्थापित की जाएगी और इसमें बदलाव किए जायेंगे.
    मध्यान्ह भोजन योजना और आईसीडीएस का सभी सेवाओं के साथ गुणवत्तापूर्ण सर्वव्यापीकरण किया जाएगा.
  • बहुत जरूरी है कि बच्चों के कार्यक्रमों (मध्यान्ह भोजन योजना और आईसीडीएस) में हितो के टकराव (Conflict of Interest) को ख़त्म किया जाए. निजी कंपनियों और संस्थाओं, जिनके पोषण आहार या पोषक तत्वों के व्यापार में हित हैं,  उन्हें नीतियों के निर्माण की प्रक्रिया और संचालन से बाहर किया जाए.
  • फ़ूड  फोर्टिफिकेशन के प्रावधान को हटाया जाए और यह लिखा जाए कि सरकार की अधिकृत एजेंसियां ही यह तय करेंगी कि फ़ूड  फोर्टिफिकेशन की क्या नीति होगी.
    बच्चों को गरम और पके हुए भोजन का अधिकार होना चाहिए। डिब्बाबंद या पैकेट बंद आहार पर प्रतिबन्ध अनिवार्य है.
  • साथ ही यह प्रावधान भी जोड़ा जाए कि ये कार्यक्रम पंचायतों, महिला मंडलों और स्वयं सहायता समूहों के जरिये ही संचालित किये जायेंगे.
  • इस विधेयक में कहीं पर भी कुपोषण के समुदाय आधारित प्रबंधन की बात का उल्लेख नहीं है। इसे शामिल किया जाए.
  • मध्यान्ह भोजन योजना और आईसीडीएस सहित बच्चों के कार्यक्रमों में स्वास्थ्य और पेयजल विभाग की भी भूमिका है; यह विधेयक कहीं पर भी यह उल्लेख नहीं करता है कि विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की जवाबदेह व्यवस्था बनायी जायेगी.
  • सरकार को यह कहना होगा कि बच्चों को कुपोषण और भुखमरी से मुक्त करने के लिए आर्थिक संसाधनों की कोई कमी नहीं आने दी जायेगी.
कुल मिलाकर बच्चों के नज़रिए से इस विधेयक के परिक्षण की आवश्यकता है. हम अधिकार पूर्वक यह निवेदन करते हैं कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 में बच्चों के लिए ऐसे प्रावधान शामिल किये जाएँ, जिनसे वे भुखमरी के साए से मुक्त हो सकें.

हमें अपना पक्ष
विस्तार से संलग्न दस्तावेज में प्रस्तुत किया है। कृपया इसे देखें और विचार करें.

मध्यप्रदेश लोक संघर्ष साझा मंच  समूह की ओर से

                                                                                           

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक-2011 में बच्चों की खाद्य सुरक्षा
परिचय
केंद्रीय खाद्य, उपभोक्‍ता मामले और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय की तरफ से दिसंबर 2011 में संसद के पटल पर पेश राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक-2011 का मकसद देश के सभी लोगों को खाद्य व पोषण सुरक्षा का अधिकार देने का है। लेकिन इस विधेयक में बच्‍चों के यही अधिकार गुमशुदा हैं।
हमें  ऐसे  किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि मौजूदा रूप में यह विधेयक भारत में रहने वाले लोगों भुखमरी और कुपोषण की समस्या को ख़त्म कर देगा या बहुत सीमित  भी कर पायेगा। जब तक गरीबी की जनविरोधी रेखा को सरकार विकास की रेखा मानती रहेगी तब तक लगभग 30 करोड़ लोग जो भुखमरी के साथ जीते हैं या फिर भुखमरी की सीमा पर लड़खड़ाते हुए खुद को जिंदा रखने की कोशिश करते रहेंगे।
बच्चों की खाद्य सुरक्षा के मायने - बच्चों की खाद्य सुरक्षा का मतलब है, उनकी उम्र और शारीरिक विकास की जरूरत के मुताबिक पर्याप्‍त भोजन उपलब्‍ध कराना। बच्चों को यदि सभी तरह के पोषक तत्व, विटामिन, वसा, कार्बोहाइड्रेट्स,  प्रोटीन्स और मिनरल्स (खनिज पदार्थ) नहीं मिलते तो यह तय है कि वे पूरी तरह से पनप नहीं पाएंगे। जब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून की बात हो रही है, तब जरूरी है कि हम ऐसा क़ानून बनाएं जो बच्चों की इन जरूरतों को विविध प्राकृतिक खाद्य पदार्थों से पूरा करने में सक्षम हो बच्चों की पोषण सम्बन्धी जरूरतें विविध अनाजों, दालों, खाने के तेल, अंडे, मांस, फल-सब्जियों, दूध और कंद के जरिये पूरी होनी चाहिए यदि देश में खाद्यान उत्पादन व्यवस्था केंद्रीयकृत और कमज़ोर होगी तो बच्चों के  पोषण के अधिकार का उल्लंघन होता रहेगा
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011  का आधार वक्तव्य
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011  का आधार वक्तव्य कहता है कि ‘‘यह विधेयक मानव जीवन चक्र में सस्ती दर पर पर्याप्त मात्र में गुणवत्तापूर्ण भोजन के जरिये खाद्य और पोषण सुरक्षा उपलब्ध करने के मकसद से पेश किया जा रहा है, जिससे लोग सम्मानजनक जीवन जी सकें।’’
लेकिन विधेयक बच्चों के भोजन के अधिकार को एकीकृत बाल विकास परियोजना और मध्यान्‍ह भोजन योजना के दायरे तक ही सीमित करके देखता है। आधार वक्तव्य के बाद पूरे विधेयक में कहीं पर भी इस मंशा को लागू करने वाले प्रावधान दिखाई नहीं देते हैं। सुप्रीम कोर्ट छह साल पहले यह निर्देश दे चुका है कि एकीकृत बाल विकास परियोजना का गुणवत्तापूर्ण सर्वव्यापीकरण किया जाए, परन्तु केंद्र सरकार ने कहीं पर इसका उल्लेख नहीं किया है। इसका असर आज की पीढ़ी पर भी पढ़ेगा और भावी पीढ़ी पर भी। प्रस्तावित विधेयक के विश्लेषण से पता चलता है कि इसमें बच्चों और महिलाओं के नज़रिए से बनाया नहीं गया है। यह क़ानून बच्चों को कानूनी  हक़दार नहीं, बल्कि कुछ योजनाओं का हितग्राही बनाए रखेगा.
गरीबी की रेखा और बच्चों के भोजन का अधिकार
पिछले 15 वर्षों में भारत सरकार गरीबी के जो अनुमान लगाती रही, वे कभी भी वास्तविकता के करीब नहीं रहे। 1996 में भारत में 36 प्रतिशत परिवारों को गरीब कहा गया था और ठीक पांच वर्ष बाद यानी 2002 में सरकार ने बताया कि अब 26 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं। एक तरफ तो भुखमरी बढ़ रही थी, रोज़गार के अवसर कम हो रहे थे, कुपोषण में कोई गिरावट नहीं हो रही थी, पर सरकार के मुताबिक गरीबी कम हो रही थी। यह तर्क भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने नहीं माना। तब केंद्र सरकार को मानना पड़ा कि देश में गरीबों की संख्या 36 प्रतिशत पर ही बरकरार है।
लेकिन यह आंकड़ा भी सही नहीं माना जा सकता क्योंकि अर्जुन सेन गुप्ता समिति ने वर्ष 2005-06 में बताया कि भारत में 77 प्रतिशत जनसँख्या केवल 20 रूपए प्रतिदिन खर्च करके जिन्दा रहती है। उस दौर में योजना आयोग की परिभाषा के मुताबिक़ गरीब उन्‍हें ही माना गया जो गाँव में रोजाना 15 रूपए और शहर में 20 रूपए से कम खर्च कर पा रहे थे। प्रोफ़ेसर सेनगुप्ता ने एक तरह से यह सिद्ध किया कि यदि गाँव के स्तर पर भी 20 रूपए के खर्च को जीवन जीने का न्यूनतम खर्च मान लिया जाए तो गरीबी की रेखा में 41  प्रतिशत जनसँख्या जुड़ जायेगी। सरकार ने इस संख्या को कम करने के लिए खर्च की सीमा को नीचे रखा। ऐसे में गरीबी की चयन की प्रक्रिया कभी भी दोषमुक्त नहीं हो पायी।  केवल मध्यप्रदेश में ही 27 लाख परिवार इस विसंगति के कारण सस्ते राशन, सामजिक सुरक्षा और अन्य अधिकारों से वंचित बने रहे।   राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 की कोई भी विसंगति बच्चों के पोषण और भोजन के अधिकार को वयस्कों से ज्यादा प्रभावित करेगी।
देश की 76.8 प्रतिशत जनसंख्या को तय मानकों के मुताबिक़ पूरा पोषण आहार नहीं मिलता है मत भूलिए कि गेहूं और चावल सिर्फ पेट भर सकते हैं परन्तु पूरा पोषण  पाने के लिए दालें, दूध, पशु उत्पाद, सब्जियां, फल, जमीन कंद, तेल और फलियाँ अनिवार्य जरूरत होती है सरकार यह मानने को तैयार नहीं है वह रासायनिक सूक्ष्म पोषक तत्वों (माइक्रो न्यूट्रीएंट्स) को सस्ता हल मानती है और उसी पर आधारित नीतियां बना रही है
 गरीबी रेखा से हटाने वाली सूची !
गरीबी रेखा की सूची में प्राथमिक और सामान्य और इसके अलावा बचे परिवारों की श्रेणियों का निर्धारण योजना आयोग के जिन अनुमानों के आधार पर हो रहा है, उनके कारण 41 करोड़ लोग प्राथमिक परिवार की श्रेणी से बाहर होने वाले हैं।
इन 41 करोड़ लोगों में से 4.5 करोड़ की उम्र छह वर्ष से कम है। यदि एपीएल और बीपीएल के प्रावधान को मिटाकर इस क़ानून का सर्वव्यापीकरण नहीं किया गया तो 4.5 करोड़ बच्चे सम्मानजनक जीवन के हक़ से सीधे तौर पर वंचित रह जायेंगे। देश की 121 करोड़ जनसँख्या में से लगभग 63 करोड़ लोगों को इस क़ानून का लाभ मिलेगा, जबकि अभी 93.17 करोड़ लोगों (वर्तमान जनसँख्या का 77 प्रतिशत) को पर्याप्त भोजन पोषण नहीं मिल रहा है। इस नज़रिए से यह क़ानून लक्षित नहीं, बल्कि सार्वभौमिक होना चाहिए।
केवल अनाज से नहीं मिटेगा कुपोषण - राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 कहता है कि प्राथमिक परिवारों को प्रति व्यक्ति सात किलो के हिसाब से सस्ता राशन दिया जाएगा और सामान्य परिवारों को तीन किलो प्रति व्यक्ति प्रति माह अनाज मिलेगा भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के मानकों के मुताबिक़ पांच सदस्यीय परिवार को लगभग 49 किलो अनाज की जरूरत होती है। परन्तु यह क़ानून ऐसे  गरीब परिवारों को अधिकतम 35 किलो अनाज उपलब्ध करवाएगा लगभग 25 प्रतिशत जनसंख्या यानी 30 करोड़ लोगों को सामान्य परिवारों की श्रेणी में रखा गया है इन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य (अनाज का वह मूल्य जो सरकार किसानों को देती है) से आधी कीमत पर तीन किलो प्रति व्यक्ति प्रतिमाह के हिसाब से अनाज मिलेगी, यानी पांच सदस्यों के एक परिवार को केवल 15 किलो ही अनाज मिल पायेगा भोजन का यह अभाव सबसे पहले बच्चों पर असर डालेगा
बिना तेल और दाल के कोई खाद्य सुरक्षा नहीं -  देश में बाल कुपोषण का एक बड़ा कारण लोगों के भोजन में प्रोटीन और वसा या चर्बी का अभाव है यह पोषक तत्व हमें दालों और खाद्य तेल से मिलते हैं खाद्य सुरक्षा विधेयक केवल अनाज के हक़ की बात करता है, जिनसे प्रोटीन और वसा की जरूरतें पूरी नहीं हो पाएंगी। जब तक अनाज के साथ-साथ लोगों को इस क़ानून के तहत खाने का तेल और दालें नहीं दिए जायेंगे तब तक इस विधेयक की शुरूआती पंक्तियों के, जिनमें पोषण की सुरक्षा का दावा किया गया है, कोई मायने नहीं होंगे।
छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों के जीवन को कुपोषण से सबसे ज्यादा खतरा होता है। पोषण संस्थान और केंद्र सरकार के आंकडे बताते हैं कि फिलहाल बच्चों के भोजन में  550 से 1000 किलो कैलोरी का अभाव है। देश में अभी दो साल तक के बच्चों के लिए किसी भी तरह के डिब्‍बाबंद पोषण आहार के विज्ञापन और प्रोत्साहन पर प्रतिबन्ध हैलेकिन  दो से पांच तक के बच्चों के लिए पूरा बाज़ार ऐसे आहारों से पटा पड़ा है,  जो उन्हें ना केवल गर्म और पके हुए भोजन से वंचित कर रहा है, बल्कि उनके स्वास्थ्य और विकास पर नकारात्मक प्रभाव भी डाल रहा है। इस कानूनी रूप से नियंत्रित करने और उस पर निगरानी रखने के लिए कोई तंत्र नहीं है। 
 एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम  में बदलाव की बात नहीं - विधेयक के पहले अध्याय में सबसे पहले जिस संस्था की बात की गयी है, वह है– आंगनवाड़ी। सरकार ने इसे बाल देखभाल और विकास केंद्र के रूप में परिभाषित किया है गौरतलब है कि आंगनवाड़ी केवल पोषण आहार बांटने का काम नहीं करती है यहां  टीकाकरणस्वास्‍थ्य जांचबच्चों के विकास की निगरानी, स्कूल पूर्व शिक्षा और पोषण-स्वास्‍थ्य शिक्षा की जिम्मेदारी भी निभाई जाती है कुपोषण से मुक्ति के लिए हमें बच्चों को संपूर्ण टीकाकरण,  बीमारी से बचाने, बीमार पड़ने पर तत्काल स्वास्‍थ्य सेवा उपलब्ध कराने बच्चों की भोजन-पोषण सम्बन्धी जरूरतों के बारे में परिवार को समझाने और उन्हें पूरा करने की तकनीकों के प्रतिजागरूक करने का काम भी करना होगा परन्तु सरकार ने यह मंशा नहीं दिखाई है कि वह एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम के ढाँचे में आमूल-चूल बदलाव करके उसे प्रभावी बनाने को तैयार है
गर्म पके भोजन के स्थान पर तैयार पैकेट बंद खाने को तवज्‍जो - मौजूदा विधेयक एक जगह पर तो गर्म पके हुए भोजन से पोषण देने की बात करता है; परन्तु पहले ही अध्याय के 11वें बिंदु में खाने के लिए तैयार भोजन (जो पैकेट में आएगा)  का भी प्रावधान किया गया है यह प्रावधान केंद्र सरकार को यह मौका देता है कि वह गर्म, स्थानीय खाद्य वस्तुओं से निर्मित पके हुए भोजन के स्थान पर पैकेट बंद और निजी कंपनियों द्वारा खाने के लिए तैयार भोजन की व्यवस्था लागू कर दे
·         विधेयक में जिस तरह खाने को तकनीकी भाषा में परिभाषित किया गया है (जैसे जो खाना बनेगा उससे निर्धारित सूक्ष्‍म पोषक तत्वों की 50 फीसदी जरूरत पूरी होनी चाहिए); उससे बच्चों के भोजन कार्यक्रम का केन्द्रीयकरण होगा और महिला मंडल, स्वयं सहायता समूहों को काम ही नहीं मिल पायेगा, जबकि उन्हें काम देने के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश हैं
·         जब सरकार पोषण युक्त  डिब्बाबंद भोजन की बात करती है तब उसका आशय होता है कंपनियों को भोजन के व्यापार की अनुमति देना हमें कुपोषण को केवल पोषण आहार कार्यक्रम की नज़र से देखने की प्रवृत्‍ति छोड़नी होगी। निरंतर बढ़ती मंहगाई और आजीविका की असुरक्षा से यह तय है कि देश का माध्यम वर्ग भी आगे चलकर कुपोषण के मकड़जाल में फंस जाएगा
खाद्य सुरक्षा व्‍यवस्‍था का केंद्रीकरण- यह एक खतरनाक कदम है। इससे समुदाय आधारित खाद्य सुरक्षा व्यवस्था ख़त्म हो जायेगी बच्चों को  पशु उत्पाद, फल और सब्जियों से युक्त गर्म पके हुए भोजन का हक़ दिया जाना चाहिए। इसके लिए आंगनवाडी़ और मध्‍यान्‍ह भोजन योजना में ठेकेदारों, कंपनियों, सूक्ष्म रासायनिक तत्वों के परीक्षणों पर प्रतिबन्ध होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायलय के निर्देशों के मुताबिक़  इन योजनाओं में महिला मंडलों, स्वयं सहायता समूहों और पंचायती राज व्यवस्था को केन्द्रीय भूमिका दी जानी चाहिए।
रासायनिक सूक्ष्म पोषक तत्व और ठेकेदारी की व्यवस्था के प्रावधान - विधेयक के दूसरे अध्याय में यह प्रावधान किया जा रहा है कि राशन की दुकान से लोगों को गेहूं के बजाये आटा दिया जाए। इसका मतलब यह है कि सरकार राशन प्रणाली में आटे में रासायनिक सूक्ष्म पोषक तत्वों को मिलाने की व्यवस्था को कानूनी रूप देने जा रही है कई अध्ययन बताते हैं कि इस तरह के रासायनिक सूक्ष्म पोषक तत्व स्‍वास्‍थ्‍य, ख़ासतौर पर बच्चों के लिए नुकसानदायक भी होते हैं। इस तरह के आटे को 20 दिन से ज्‍यादा सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। सरकार ने छह माह तक के बच्चों के लिए स्तनपान को प्रोत्साहित करने के मंशा दिखाई है यह एक अच्छा प्रावधान है शहरी इलाकों में केंद्रीकृत रसोईघरों का प्रावधान किया गया है। हमने यह पाया है कि इस प्रावधान का लाभ कारपोरेट, गैर सरकारी संस्थाएं या धार्मिक संस्थाएं उठाती रही है वे मशीनों से खाना बनाती हैं, जिसे खाना बच्चों की मजबूरी बन जाता है धार्मिक संस्थाएं सभी बच्चों को एक धर्म के सिद्धांतों से खाना खिलाना  चाहती हैं, जिससे उन्हें अंडे या पशु आहार नहीं मिल पाते बेहतर होगा कि यह काम शहरों में भी महिला मंडलों और स्वयं सहायता समूहों को दिए जाएँ इस काम के लिए उन्हें आर्थिक सहायता या ऋण भी दिया जाना चाहिए   
कुपोषण की रोकथाम और प्रबंधन - सरकार के मुताबिक़ विधेयक का बिंदु क्रमांक -6  कुपोषण की रोकथाम और प्रबंधन के लिए है। परन्तु इस प्रावधान में कुपोषित बच्चों को केवल पोषण आहार देने की ही बात कही गयी है। उनके स्वास्‍थ्‍य पर ख़ास ध्यान, उनके लिए समुदाय स्तर पर कुपोषण प्रबंधन की रूपरेखा बनाने का उल्लेख नहीं है, जो कि केवल सामुदायिक प्रयासों से ही संभव है। पिछले छह साल से यह मांग की जाती रही है कि कामकाजी परिवारों और कुपोषित बच्चों की देखभाल के लिए आँगनवाड़ी केन्द्रों को झूलाघर में तब्दील किया जाए, जहाँ दिन भर बच्चों की निगरानी हो, सही पोषण भी मिले और समाज को प्रशिक्षित भी किया जा सके। विधेयक में कहीं भी झूलाघर या सामुदायिक प्रबंधन शब्द का उपयोग नहीं है।
मध्यान्‍ह भोजन पर सीमित नजरिया - विधेयक केवल 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए भोजन के अधिकार की बात कर रहा है, जबकि इसे बारहवीं कक्षा तक बढ़ाया जाना चाहिए। 6 से 14 साल तक के बच्चों के लिए मध्यान्‍ह भोजन को एक अधिकार के रूप में परिभाषित किया गया है; परन्तु जिन विसंगतियों, भ्रष्टाचार, गुणवत्ता के अभाव और निगरानी तंत्र की कमी से यह कार्यक्रम जूझ रहा है, उसमें बदलाव के लिए कोई ढांचा बनाने की मंशा विधेयक में नहीं है।
मातृत्व हकों की बात - मातृत्व हकों के बिना कुपोषण की बात अधूरी है। खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 में पहली बार असंगठित क्षेत्र की महिलाओं के लिए एक हद तक ठोस प्रावधान किया गया है। इसके मुताबिक एक योजना बनाकर मातृत्व हक़ के रूप में छह माह तक 1000 रूपए की आर्थिक  सहायता दी जायगी। इस प्रावधान में एक डर यह है कि जब योजना बनेगी तो सरकार कहीं गरीबी की रेखा या योजना में दो बच्चों का प्रावधान  डाल दे। समस्या यह है कि सरकार यह प्रावधान नहीं कर रही है कि महिलाओं को यह हक़ छह माह अवकाश के साथ न्यूनतम मजदूरी के साथ मिले। यह भी जरूरी है कि 1000 रूपए की राशि के प्रावधान को मंहगाई  सूचकांक  से भी जोड़ा जाए।

विधेयक में ये बदलाव तो चाहिए ही!
1.    गुणवत्तापूर्ण सर्वव्यापीकरण - अनुच्छेद 4, 5 और 6 में यह प्रावधान होना चाहिए कि एकीकृत बाल विकास परियोजना का सभी सेवाओं के साथ गुणवत्तापूर्ण सर्वव्यापीकरण किया जाएगा। साथ ही जरूरी है कि आंगनवाडी़ और मध्यान्‍ह भोजन योजना में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पोषक अनाजों (मिलेट्स) के उपयोग को प्राथमिकता दी जाए।  अध्याय 7 में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में ढांचागत बदलावों के प्रावधान किये गए हैं, परन्तु उसमे इसके सर्वव्यापीकरण का उल्लेख नहीं है। 
2.    ढांचागत बदलाव और ठोस जवाबदेहिता - बेहतर होगा कि अध्याय 2 में, जहाँ बच्चों और महिलाओं के भोजन के अधिकारों की बात कही जा रही है, वहां एकीकृत बाल विकास परियोजना, मध्यान्‍ह भोजन योजना और मातृत्व हक़ कार्यक्रम में ढांचागत बदलावों और ठोस जवाबदेहिता वाली व्यवस्था बनाने के लिए प्रावधान जोड़े जाएँ। इन कार्यक्रमों के ग्राम सभा और हितग्राहियों की सहभागिता के साथ वार्षिक सामाजिक अंकेक्षण की व्यवस्था का स्पष्ट प्रावधान किया जाए। 
3.    शिकायत निवारण व्यवस्था - शिकायत निवारण व्यवस्था को केवल शिकायतों की सुनवाई तक ही सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे इस क़ानून में शामिल होने वाले कार्यक्रमों के आर्थिक, गुणात्मक और हक़ आधारित पक्षों के सालाना अंकेक्षण की शक्तियां भी दी जाएँ। 
4.    हितों के टकराव (कनफ्लिक्ट आफ इंटरेस्ट) - यहीं पर सरकार को बच्चों के प्रति अपनी जवाबदेहिता सिद्ध करने की जरूरत है, इसलिए विधेयक में यह साफ़ उल्लेख होना चाहिए कि बहुराष्ट्रीय और निजी कंपनियों और गैर सरकारों संस्थाओं को भी इन योजनाओं के संचालन का काम ठेके पर नहीं दिया जाएगा। इतना ही नहीं हितों के टकराव (कनफ्लिक्ट आफ इंटरेस्ट) के मद्देनज़र क्रियान्‍वयन की एक ठोस निगरानी व्यवस्था बनायी जायेगी। 
5.    रासायनिक और चिकित्सकीय पोषक तत्वों के सम्मिश्रण (Medicalisation and Fortification of Food) - बच्चों के भोजन में रासायनिक और चिकित्सकीय पोषक तत्वों के सम्मिश्रण को पूरे कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा। इस सन्दर्भ में यह सुनिश्‍चित किया जाएगा कि भारत सरकार और राज्य सरकारों के अधिकृत शोध संस्थान इस सन्दर्भ में शोध करके अपने निष्कर्ष देंगे। उन पर विस्तृत चर्चा के उपरान्त ही रासायनिक और चिकित्सकीय पोषक तत्वों के सम्मिश्रण पर कोई भी निर्णय लिया जाएगा। ऐसी कम्पनियाँ, जिनके इस कार्य में व्यावसायिक हित हैं या हो सकते हैं, उनके अध्ययनों को सरकारी नीतियों का आधार नहीं बनाया जा सकता है। 
6.    महिला सशक्तिकरण - अनुच्छेद 8 में महिला सशक्तिकरण के लिए प्रावधान हैं। यह अत्यंत आवश्यक है कि इसी के तहत यह भी उल्लेख किया जाए कि आंगनवाडी़ और मध्यान्‍ह भोजन योजना में पोषण युक्त भोजन बनाने और उसकी व्यवस्था करने का काम महिला मंडलों, स्वयं सहायता समूहों को सौंपा जाएगा। इसके साथ की इन कार्यक्रमों की निगरानी करने में महिला पंचायत प्रतिनिधियों की अधिकार संपन्न भूमिका सुनिश्चित की जायेगी। 
7.    संसाधनों का आवंटन - बच्चों के भोजन और पोषण के अधिकार पर फिलहाल वास्तव में औसतन  3.40  रूपए  का व्यय किया जा रहा है। जिस देश में 42 प्रतिशत  बच्चे  कुपोषित  हैं, क्या  वहां इतने प्रावधान पर्याप्त है सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा विधेयक में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत दी जाने वाली रियायतों का तो उल्लेख है, परन्तु एकीकृत बाल विकास परियोजना, मध्यान्‍ह भोजन योजना और मातृत्व हक़ कार्यक्रम के लिए कितना धन चाहिए होगा, इसका कोई उल्लेख नहीं किया गया है सिर्फ इतना कहा गया है कि जिस तरह मौजूदा कार्यकरण चल रहे हैं, वैसे ही ये कार्यक्रम  चलते रहेंगे इस रूप में तो बच्चों को कुपोषण से मुक्ति पाने और सम्मानजनक जीवन का हक़ नहीं ही मिल पायेगा 
8.    विभागों के बीच जवाबदेहिता आधारित समन्वय  - एकीकृत बाल विकास परियोजना, मध्यान्‍ह भोजन योजना और मातृत्व हक़ कार्यक्रम अलग-अलग मंत्रालयों द्वारा संचालित किये जा रहे हैं। पीने के साफ़ पानी की व्यवस्था के लिए अलग विभाग है। इन विभागों के बीच  जवाबदेहिता  आधारित समन्वय  की व्यवस्था कैसे बनेगी इसका कोई उल्लेख नहीं है।
9.    केंद्र सरकार के हाथ में पूरे अधिकार न हों - इस क़ानून के जरिये केंद्र सरकार राज्य सरकारों के क्षेत्रों का अतिक्रमण कर संघीय ढाँचे को नुकसान पंहुचा रही है पोषक मानकों को तय करने का काम, पैकेट बंद भोजन के बारे में निर्णय और यहाँ तक कि लगभग हर कार्यक्रम में राज्य सरकार के खर्च की सीमा भी केंद्र सरकार तय करेगी

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