Sunday, February 19, 2012

बच्चों के भुखमरी को बनाए रखने वाला राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011


सचिन कुमार जैन

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 संसदीय प्रक्रिया के तहत संसद की स्थाई समिति के पास भेज दिया गया है. इस विधेयक का मकसद देश से भुखमरी और कुपोषण को मिटाना है; परन्तु मौजूदा रूप में यह विधेयक, यदि क़ानून बना तो देश में ये दोनों संकट बरकरार रहेंगे. कुपोषण, जिसे प्रधानमन्त्री ने राष्ट्रीय शर्म कहा है, विकास के दावों पर काले धब्बे की तरह टिमटिमाता रहेगा, और जैसा की होता है बहुत बहस के बाद इसे हमेशा के लिए बनी रहने वाली समस्या के रूप में मान्यता दे दी जायेगी. कुपोषण सबसे पहले बच्चों को खाता है और फिर समाज को. हमें यह जरूर देखना चाहिए कि क्या यह विधेयक बच्चों की खाद्य सुरक्षा पर कोई ईमानदार पहल करता है? जवाब है - नहीं!


बच्चों की खाद्य सुरक्षा का मतलब है, उनकी उम्र और शारीरिक विकास की जरूरत के मुताबिक पर्याप्‍त भोजन उपलब्‍ध कराना। बच्चों को यदि सभी तरह के पोषक तत्व, विटामिन, वसा, कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन्स और मिनरल्स (खनिज पदार्थ) नहीं मिलते तो यह तय है कि वे पूरी तरह से पनप नहीं पाएंगे। जब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून की बात हो रही है, तब जरूरी है कि हम ऐसा क़ानून बनाएं जो बच्चों की इन जरूरतों को विविध प्राकृतिक खाद्य पदार्थों से पूरा करने में सक्षम हो। बच्चों की पोषण सम्बन्धी जरूरतें विविध अनाजों, दालों, खाने के तेल, अंडे, मांस, फल-सब्जियों, दूध और कंद के जरिये पूरी होनी चाहिए। यदि देश में खाद्यान उत्पादन व्यवस्था केंद्रीयकृत और कमज़ोर होगी तो बच्चों के पोषण के अधिकार का उल्लंघन होता रहेगा। मौजूदा विधेयक के प्रावधान कुपोषण के विस्तार को रोकने वाले क़ानून की भूमिका नहीं निभा पायेगा एक तरफ यह पोषण की सुरक्षा नहीं दे रहा है, तो वहीँ दूसरी और इसमें कुपोषण के सामुदायिक प्रबंधन की कोई चर्चा नहीं की गयी है वर्तमान स्थिति में आंगनवाड़ी और मध्यान्न भोजन योजना में ढांचागत बदलावों की जरूरत है, इनके बिना भोजन का अधिकार एक और औपचारिकता बन कर रह जाएगा


खाद्य असुरक्षा का प्रत्यक्ष कारण आजीविका की असुरक्षा और संसाधनों पर से लोगों के घटते हक़ हैं. इसलिए बच्चों की खाद्य असुरक्षा को उन नीतियों की सन्दर्भ में देखे जाने की जरूरत है, जिनके कारण प्रदेश के बच्चों में भुखमरी और पोषण की असुरक्षा लगातार बढती जा रही है. कुपोषण को ख़त्म करने के सभी प्रयास ज्यादा संस्थाओं और केन्द्रों की स्थापना के साथ जुड़े रहे हैं. हमें कुपोषण और भुखमरी के बुनियादी कारणों, (जैसे कृषि और खाद्यान्न उत्पादन के संकट, केवल गेहूं और चावल के उत्पादन को प्रोत्साहन, स्थानीय खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर नीति बनाने वालों की कोई समझ न होना और केन्द्रीयकरण की नीतियां बनना, दालों और खाद्य तेलों तक लोगों की पंहुच कम होना;) को ईमानदारी से समझना और स्वीकार करना होगा. यदि यह विधेयक इन पक्षों पर मौन रहता है, तो यह तय है कि यह क़ानून बिलकुल बेकार साबित होगा.

गरीबी हमारे लिए बड़ी चुनौती है; परन्तु हमें इस सवाल का जवाब तो खोजना ही होगा कि गरीबी के कारण कुपोषण बढ़ रहा है या फिर कुपोषण के कारण गरीबी बढ़ रही है. मध्यप्रदेश के सन्दर्भ में हमारा अबुभाव बताता है कि कुपोषित होने के कारण लोगों की शारीरिक और मानसिक क्षमताएं प्रभावित हुई है, जिनके कारण वे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं और आजीविका की साधनों का उपयोग भी नहीं कर पा रहे हैं. हमें पहले उनका कुपोषण दूर करना होगा, तभी वे विकास की धारा में शामिल हो पायेंगे. मध्यप्रदेश ही एक ऐसा राज्य है जहाँ वर्ष 1990 के स्थिति में 43.56 प्रतिशत लोग गरीब थे, जो वर्ष 2010 में बढ़ कर 48.6 प्रतिशत हो गए. यही वह दौर भी था जब कुपोषण भी 54 प्रतिशत से बढ़ कर 60 प्रतिशत हो गया. सह्त्राब्दी विकास लक्ष्यों के तहत गरीबी के स्तर को 43.56 प्रतिशत से घटा कर 21.78 प्रतिशत पर लाया जाना था, परन्तु हम इस लक्ष्य से बहुत दूर होते गए हैं. इसका मतलब है कि जब तक खाद्य असुरक्षा और कुपोषण को पहले दूर नहीं किया जाएगा तब तक ना तो गरीबी कम होगी न ही विकास के दावों पर विश्वास किया जा सकेगा. सरकार को यह कहना होगा कि बच्चों को कुपोषण और भुखमरी से मुक्त करने के लिए आर्थिक संसाधनों की कोई कमी नहीं आने दी जायेगी.

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 का आधार वक्तव्य

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 का आधार वक्तव्य कहता है कि ‘‘यह विधेयक मानव जीवन चक्र में सस्ती दर पर पर्याप्त मात्र में गुणवत्तापूर्ण भोजन के जरिये खाद्य और पोषण सुरक्षा उपलब्ध करने के मकसद से पेश किया जा रहा है, जिससे लोग सम्मानजनक जीवन जी सकें।’’

लेकिन विधेयक बच्चों के भोजन के अधिकार को एकीकृत बाल विकास परियोजना और मध्यान्‍ह भोजन योजना के दायरे तक ही सीमित करके देखता है। आधार वक्तव्य के बाद पूरे विधेयक में कहीं पर भी इस मंशा को लागू करने वाले प्रावधान दिखाई नहीं देते हैं। सुप्रीम कोर्ट छह साल पहले यह निर्देश दे चुका है कि एकीकृत बाल विकास परियोजना का गुणवत्तापूर्ण सर्वव्यापीकरण किया जाए, परन्तु केंद्र सरकार ने कहीं पर इसका उल्लेख नहीं किया है। इसका असर आज की पीढ़ी पर भी पढ़ेगा और भावी पीढ़ी पर भी। प्रस्तावित विधेयक के विश्लेषण से पता चलता है कि इसमें बच्चों और महिलाओं के नज़रिए से बनाया नहीं गया है। यह क़ानून बच्चों को कानूनी हक़दार नहीं, बल्कि कुछ योजनाओं का हितग्राही बनाए रखेगा.

गरीबी की रेखा और बच्चों के भोजन का अधिकार

पिछले 15 वर्षों में भारत सरकार गरीबी के जो अनुमान लगाती रही, वे कभी भी वास्तविकता के करीब नहीं रहे। 1996 में भारत में 36 प्रतिशत परिवारों को गरीब कहा गया था और ठीक पांच वर्ष बाद यानी 2002 में सरकार ने बताया कि अब 26 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं। एक तरफ तो भुखमरी बढ़ रही थी, रोज़गार के अवसर कम हो रहे थे, कुपोषण में कोई गिरावट नहीं हो रही थी, पर सरकार के मुताबिक गरीबी कम हो रही थी। यह तर्क भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने नहीं माना। तब केंद्र सरकार को मानना पड़ा कि देश में गरीबों की संख्या 36 प्रतिशत पर ही बरकरार है।

लेकिन यह आंकड़ा भी सही नहीं माना जा सकता क्योंकि अर्जुन सेन गुप्ता समिति ने वर्ष 2005-06 में बताया कि भारत में 77 प्रतिशत जनसँख्या केवल 20 रूपए प्रतिदिन खर्च करके जिन्दा रहती है। उस दौर में योजना आयोग की परिभाषा के मुताबिक़ गरीब उन्‍हें ही माना गया जो गाँव में रोजाना 15 रूपए और शहर में 20 रूपए से कम खर्च कर पा रहे थे। प्रोफ़ेसर सेनगुप्ता ने एक तरह से यह सिद्ध किया कि यदि गाँव के स्तर पर भी 20 रूपए के खर्च को जीवन जीने का न्यूनतम खर्च मान लिया जाए तो गरीबी की रेखा में 41 प्रतिशत जनसँख्या जुड़ जायेगी। सरकार ने इस संख्या को कम करने के लिए खर्च की सीमा को नीचे रखा। ऐसे में गरीबी की चयन की प्रक्रिया कभी भी दोषमुक्त नहीं हो पायी। केवल मध्यप्रदेश में ही 27 लाख परिवार इस विसंगति के कारण सस्ते राशन, सामजिक सुरक्षा और अन्य अधिकारों से वंचित बने रहे। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 की कोई भी विसंगति बच्चों के पोषण और भोजन के अधिकार को वयस्कों से ज्यादा प्रभावित करेगी।


गरीबी रेखा से हटाने वाली सूची !

गरीबी रेखा की सूची में प्राथमिक और सामान्य और इसके अलावा बचे परिवारों की श्रेणियों का निर्धारण योजना आयोग के जिन अनुमानों के आधार पर हो रहा है, उनके कारण 31 करोड़ लोग प्राथमिक परिवार की श्रेणी से बाहर होने वाले हैं।

इन 31 करोड़ लोगों में से 4.5 करोड़ की उम्र छह वर्ष से कम है। यदि एपीएल और बीपीएल के प्रावधान को मिटाकर इस क़ानून का सर्वव्यापीकरण नहीं किया गया तो 4.5 करोड़ बच्चे सम्मानजनक जीवन के हक़ से सीधे तौर पर वंचित रह जायेंगे। देश की 121 करोड़ जनसँख्या में से लगभग 63 करोड़ लोगों को इस क़ानून का लाभ मिलेगा, जबकि अभी 93.17 करोड़ लोगों (वर्तमान जनसँख्या का 77 प्रतिशत) को पर्याप्त भोजन व पोषण नहीं मिल रहा है। इस नज़रिए से यह क़ानून लक्षित नहीं, बल्कि सार्वभौमिक होना चाहिए।

केवल अनाज से नहीं मिटेगा कुपोषण - राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 कहता है कि प्राथमिक परिवारों को प्रति व्यक्ति सात किलो के हिसाब से सस्ता राशन दिया जाएगा और सामान्य परिवारों को तीन किलो प्रति व्यक्ति प्रति माह अनाज मिलेगा। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के मानकों के मुताबिक़ पांच सदस्यीय परिवार को लगभग 49 किलो अनाज की जरूरत होती है। परन्तु यह क़ानून ऐसे गरीब परिवारों को अधिकतम 35 किलो अनाज उपलब्ध करवाएगा। लगभग 25 प्रतिशत जनसंख्या यानी 30 करोड़ लोगों को सामान्य परिवारों की श्रेणी में रखा गया है। इन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य (अनाज का वह मूल्य जो सरकार किसानों को देती है) से आधी कीमत पर तीन किलो प्रति व्यक्ति प्रतिमाह के हिसाब से अनाज मिलेगी, यानी पांच सदस्यों के एक परिवार को केवल 15 किलो ही अनाज मिल पायेगा। भोजन का यह अभाव सबसे पहले बच्चों पर असर डालेगा।

बिना तेल और दाल के कोई खाद्य सुरक्षा नहीं - देश में बाल कुपोषण का एक बड़ा कारण लोगों के भोजन में प्रोटीन और वसा या चर्बी का अभाव है। यह पोषक तत्व हमें दालों और खाद्य तेल से मिलते हैं। खाद्य सुरक्षा विधेयक केवल अनाज के हक़ की बात करता है, जिनसे प्रोटीन और वसा की जरूरतें पूरी नहीं हो पाएंगी। जब तक अनाज के साथ-साथ लोगों को इस क़ानून के तहत खाने का तेल और दालें नहीं दिए जायेंगे तब तक इस विधेयक की शुरूआती पंक्तियों के, जिनमें पोषण की सुरक्षा का दावा किया गया है, कोई मायने नहीं होंगे। कुल मिलाकर बच्चों के नज़रिए से इस विधेयक के परिक्षण की आवश्यकता है. हम अधिकार पूर्वक यह निवेदन करते हैं कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 में बच्चों के लिए ऐसे प्रावधान शामिल किये जाएँ, जिनसे वे भुखमरी के साए से मुक्त हो सकें.

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