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Tuesday, January 5, 2016

नए साल में एक और संकल्प: चार दशक से लगातार घट रही है लड़कियों की संख्या

निखिल कुमार वर्मा

धर्म और जाति आधारित 2011 की जनगणना के आंकड़ों को लेकर हर दिन सियासी दलों में खींचतान जारी है. लेकिन इसी जनगणना के एक आंकड़े को लगभग नजरअंदाज़ कर दिया गया. यह आंकड़ा लड़के-लड़कियों के अनुपात का है. लगातार चौथे दशक में लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या कम हुई है. 
इसका एक और चिंताजनक पहलू यह भी है कि लड़कियों का अनुपात कम होने की दर सभी धार्मिक समूहों में एक सी है. हिंदू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध समेत ज्यादातर धर्मों में लड़कों के मुकाबले लड़कियों की जन्म दर गिरी है. सिर्फ दो धार्मिक समूह हैं जिनमें यह दर थोड़ी सुधरी है- सिख और जैन. हालांकि यह सुधार भी पहले से ही बेहद बिगड़ चुके अनुपात में थोड़ा सुधार भर है. 
''बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ'' जैसी योजना और लगभग दो दशकों से लगातार आर्थिक विकास की लहर पर सवार होने के बावजूद भारत में महिला लिंगानुपात में खास सुधार नहीं हो रहा है. 2011 के लैंगिक जनसंख्या आंकड़ों में 0-6 आयुवर्ग की लड़कियों की संख्या प्रति हजार बालकों की तुलना में 918 है. प्रति हजार बच्चों पर 2001 की जनगणना में यह आंकड़ा 927 था.
भारत में बेटियों पर बेटों को प्राथमिकता देने का पुराना रिवाज है. पिछले दो दशकों की आर्थिक तरक्की भी भारतीय समाज में लैंगिक समानता की भावना को स्थापित नहीं कर सकी है. बल्कि इस आर्थिक तरक्की ने स्त्री-पुरुष लिंगानुपात को असंतुलित करने का काम किया है. लोगों की पहुंच उन अत्याधुनिक तकनीकों तक हुई है जिनसे वे बेटे की चाहत आसानी से पूरी कर सकते हैं, बेटियों की जान की कीमत पर.
इसी से जुड़े कुछ और तथ्य:
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सिख समुदाय में बढ़ा लड़कियों का अनुपात
सिख समुदाय अक्सर बेटियों की जन्म दर को लेकर आलोचनाओं का शिकार होता रहा है. 2001 की जनगणना में सिखों का लिंगानुपात आठ सौ के नीचे गिर गया था. 2001 की जनगणना में 0-6 आयुवर्ग की बच्चियों की संख्या सिखों में प्रति हजार बालकों की तुलना में 786 थी. 2011 की जनगणना में इसमें थोड़ा सुधार देखने को मिला है. यह बढ़कर 828 हो गई है.
इसके अलावा जैन समुदाय में भी लैंगिक अनुपात सुधरा है. 2001 की जनगणना में 0-6 आयुवर्ग की बच्चियों की संख्या जैनों में प्रति हजार बालकों की तुलना में 870 थी, जो 2011 में बढ़कर 889 हो गई. इसके अलावा बाकी सभी समुदाय लिंग अनुपात के मामले में पिछड़ रहे हैं.
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हिंदू-मुसलमानों में गिर रहा है लिंगानुपात
2001 की जनगणना में 0-6 आयुवर्ग की बच्चियों की संख्या हिंदुओं में प्रति हजार बालकों की तुलना में 925 थी, जो 2011 में 913 रह गई. हिंदुओं के मुकाबले ईसाई और मुस्लिम समुदाय के लिंग अनुपात में कम गिरावट आई है. ईसाईयों में यह अनुपात 964 से घटकर 958 हो गया है.
वहीं, मुस्लिमों में यह आंकड़ा 950 से 943 तक आ पहुंचा. बौद्ध समुदाय में 2001 में यह आंकड़ा 942 का था जो दस साल में 933 पर आ गया है.
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हर साल 6 लाख लड़कियां कोख में मार दी जाती हैं
एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल 6 लाख लड़कियों को कोख में ही मार दिया जाता है. साल 1981 की जनगणना के मुताबिक में 6 साल की उम्र तक के 1000 लड़कों के मुकाबले 962 लड़कियां थीं, लेकिन 1991 की जनगणना में 1000 लड़कों के मुकाबले इनकी संख्या सिर्फ 945 रह गई.
साल 2001 में तो ये आंकड़ा प्रति 1000 लड़कोंं पर 927 लड़कियों तक सिमट गया था. देश के 328 जिलों में 1000 लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या 950 से कम है.
पड़ोसी देशों की बात करें तो नेपाल में प्रति एक हजार पुरुषों पर 1041 महिलाएं हैं. इंडोनेशिया में एक हजार पुरुषों पर 1004 महिलाएं व चीन में यह अनुपात 944 का है.
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लड़कों से ज्यादा लड़कियों की होती है मौत
अक्टूबर महीने में जारी संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 5 साल तक के बच्चों में लड़कियों की मृत्यु दर लड़कों से कहीं ज्यादा है. रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में लिंग आधारित गर्भपात के खिलाफ 1996 से ही कानून है इसके बावजूद लिंगानुपात लगातार गिर रहा है.
5 साल से कम उम्र के बच्चों की मौत के मामले में भारत का सेक्स अनुपात दुनिया में सबसे खराब है. बाल मृत्यु दर का अनुपात 93 रहा, जिसका अर्थ हुआ कि 5 साल से कम उम्र के बच्चों में प्रति 100 लड़कियों की मौत के मुकाबले 93 लड़कों की मौत होती है. दुनिया के किसी और देश में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में कोई अंतर नहीं पाया गया है.
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05
10 लाख बच्चे भारत में हर साल कुषोपण से मारे जाते हैं
स्वास्थ्य पत्रिका द लांसेट जर्नल के मुताबिक भारत में 5 साल से कम उम्र के करीब 10 लाख बच्चे हर साल कुपोषण के कारण मारे जाते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि लड़कियों की मौत ज्यादा होती है क्योंकि स्वास्थ्य केंद्रों में लड़कियों के मुकाबले लड़कों को ज्यादा ले जाया जाता है.
2005 में भारत में पांच साल से कम उम्र के दो लाख 35 हजार बच्चों की मौत हुई थी. यह विश्वभर के आंकड़ों का 20 प्रतिशत है. सर्वे के मुताबिक एक से लेकर 59 महीने के बच्चों में लड़कियों की मौत लड़कों से 36 फीसदी ज्यादा रही.
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धार्मिक आधार पर जनसंख्या के आंकड़े
2011 के धार्मिक जनगणना डाटा के अनुसार देश में 2011 में कुल जनसंख्या 121.09 करोड़ थी. इसमें हिंदू जनसंख्या 96.63 करोड़ (79.8 प्रतिशत), मुस्लिम आबादी 17.22 करोड़ (14.2 प्रतिशत), ईसाई 2.78 करोड़ (2.3 प्रतिशत), सिख 2.08 करोड़ (1.7 प्रतिशत), बौद्ध 0.84 करोड़ (0.7 प्रतिशत), जैन 0.45 करोड़ (0.4 प्रतिशत) और अन्य धर्म और मत (ओआरपी) 0.79 करोड़ (0.7 प्रतिशत) रही.
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जनगणना के धर्म आधारित ताजा आंकड़ों के अनुसार 2001 से 2011 के बीच 10 साल की अवधि में मुस्लिम समुदाय की आबादी में 0.8 प्रतिशत का इजाफा हुआ है और यह 13.8 प्रतिशत से बढ़कर 14.2 प्रतिशत हो गई है. हिंदू जनसंख्या में 0.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और इस अवधि में यह 96.63 करोड़ हो गई.
hindi.catchnews.com से साभार 

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