Friday, December 4, 2015

बच्चों के यौन हमले बताते हैं कि सुधार की जरूरत हम बड़ों को है


गायत्री आर्य



बच्चों के यौन हमलों की घटनाएं और बढ़ सकती हैं क्योंकि हमारा ध्यान अभी भी ऐसा होने के कारणों की बजाय बाल अपराधियों की उम्र को कम या ज्यादा करने जैसी चीजों पर ही है कुछ समय पहले एंग्लो अरेबिक मॉडल स्कूल दिल्ली में एक बेहद खौफनाक घटना सामने आई. एक मामूली झगड़े के बाद छठी कक्षा के एक छात्र के साथ उसके सहपाठियों ने क्लास में ही कुकर्म किया! ऐसी ही एक घटना उत्तर प्रदेश के हरचंदपुर में हुई जहां छठी कक्षा के एक लड़के ने अपनी ही कक्षा की छात्रा का स्कूल परिसर में बलात्कार किया!! ये चिंता और तनाव पैदा करने वाली बेहद खौफनाक घटनाएं हैं. बच्चों का यौन हिंसा और बलात्कार जैसी घटनाओं में लिप्त होना रोंगटे खड़े करता है!! यह किसी बढ़ते पेड़ की जड़ में कीड़ा लगने जैसा है. असल में ऐसी घटनाएं बच्चों से ज्यादा बडे लोगों, परिवार और समाज को कटघरे में खड़ा करती हैं. बच्चों का यह व्यवहार उस पूरे परिवेश पर सवाल खड़े कर रहा है जहां से वे अपना विचार और व्यवहार तय करते हैं.
10-12 साल के किशोरों की कोई परिपक्व सोच या विचार नहीं होता. इस उम्र का बढ़ता हुआ दिमाग हर वक्त सीखने की प्रक्रिया में होता है. उनका मानस हर समय अपने आस-पास की चीजों और घटनाओं से बनता और बदलता रहता है. पिछले समय में बच्चों की सोच, विचार, व्यवहार, मानस को बनाने और प्रभावित करने वाली चीजों में जबरदस्त परिवर्तन आया है. बच्चों को सिखाने वाली पुरानी इकाइयों में सबसे पहले दादी-दादा, नानी-नाना, चाची-चाचा, ताई-ताऊ, बुआ, मौसी आदि के साथ माता-पिता भी थे. कुल मिलाकर संयुक्त परिवार और स्कूल, बच्चों के व्यक्तित्व और वैचारिक विकास की महत्वपूर्ण कड़ी थी. आज के समय में बच्चों को सिखाने वाली कुछ परंपरागत इकाइयां खत्म हो गईं हैं और कुछ में जबरदस्त बदलाव आया है.
संयुक्त परिवार खत्म हो गए. एकल परिवारों में भी बहुत सारे घरों में माता-पिता दोनों कामकाजी हैं. एक परिवर्तन परिवारों के ढांचे में हुआ है. दूसरा पारिवारिक मूल्यों में. पहले परिवारों में जो नैतिक और मानवीय मूल्यों की सीख दी जाती थी वह अब लगभग बंद ही हो चुकी है. नए किस्म की नैतिकता और मूल्य पनप रहे हैं. देश, समाज, परिवार और अच्छे-बुरे की जगह व्यक्ति महत्वपूर्ण हो गया है. पहले से ज्यादा स्पेस लिया-दिया जाने लगा है.
बदलते समय में गुरू-शिष्य की स्वस्थ परंपरा लगभग खत्म हो चुकी है. यौन शोषण की घटनाओं के चलते अब बच्चों को अपने अध्यापकों से ही सजग रहने की सलाह ज्यादा दी जाने लगी है. कोर्स की किताबों से अलग भी अध्यापक बच्चों को कुछ बताएंगे ऐसा भाव न बच्चों में ज्यादा बचा है, न माता-पिता में और न ही स्वयं शिक्षको में. ऐसे में टीवी बच्चों को सिखाने वाला सबसे सशक्त माध्यम बन गया है. टीवी के साथ-साथ, फिल्में, पत्र-पत्रिकाएं, गाने, सार्वजनिक जगहों के विज्ञापन, इंटरनेट आदि आधुनिक समय में बच्चों के नए स्मार्ट गुरूहैं.
बच्चे परिवार से ज्यादा समय आजकल टीवी के साथ बिताते हैं. बच्चे टीवी के लिए पूरी तरह से तैयार हैं, लेकिन टीवी इतने सालों बाद भी उनके लिए तैयार होने को तैयार नहीं! टीवी में आने वाले ज्यादातर प्रोग्राम बच्चों के हिसाब से नहीं बनाए जाते. तमाम सीरियल, फिल्में, बड़ों के विज्ञापन, न्यूज आदि सभी की निर्माण प्रक्रिया में यह जरा भी ध्यान नहीं रखा जाता कि घर-परिवार में बच्चे भी इन सब चीजों के दर्शक हैं और चुपचाप सीख रहे हैं. बच्चों को ध्यान में रखकर सिर्फ विज्ञापन बनते हैं उन्हें लुभाने के लिए, उत्पाद की बिक्री बढ़ाने के लिए.
टीवी से लेकर तमाम दूसरे स्मार्ट गुरू‘ ‘सेक्स, सेक्सी और सेक्शुएलिटीके सिंड्रोम से भयंकर तरीके से ग्रसित हैं! सेक्स को लेकर दोतरफा अतिवादी रवैया अपनाया जा रहा है. एक तरफ जिस तरह से सेक्स जैसे अतिसंवेदनशील मुद्दे पर समाज में बात किये जाने की जरूरत है उस तरह से जरा भी नहीं होती. दूसरी तरफ इस मुद्दे को जिस अंदाज में कतई नहीं परोसा जाना चाहिए, उसी अंदाज में वह बार-बार हमारे सामने लाया जा रहा है. बिना इसके दुष्परिणाम सोचे. इसी के परिणामस्वरूप बच्चों, किशोरों और युवाओं में सेक्स के प्रति बीमार सोच और व्यवहार विकसित हो रहा है.
वह समाज जहां बलात्कार या यौन शोषण के वीडियो भी यौन आनंद के लिए देखे और दिखाये जायें, उस समाज के लोगों के दिमाग में सेक्स को लेकर कितनी विकृति होगी, इसकी कल्पना की जा सकती है. घर का माहौल, आपसी संवाद, स्कूल का माहौल, टीवी पर आने वाली हर एक चीज, फिल्म, अखबार और पत्रिकाओं में स्त्रियों की तस्वीरों और खबरों का नजरिया, सार्वजनिक जगहों पर लगाए जाने वाले पोस्टरों, विज्ञापनों की तस्वीरों और भाषा, गानों की भाषा, हर एक चीज से बच्चों के चेतन, अवचेतन मन में बैठ रहा है कि लड़कियां कोई मजे की चीजहैं! वे इंसान नहीं और साथी तो कतई नहीं हैं. इस तरह के माहौल में जीने और बढ़ने वाले बच्चों को खुद यौन हमलावर बनने से कैसे रोका जा सकता है?
6 से 17 साल के बच्चे का दिमाग सबसे ज्यादा सीखने के दौर में होता है. उस समय वह जो चीज अपने आस-पास हर तरफ देखेगा उससे कैसे अछूता रहेगा? जैसे ये सब चीजें सायलेंट टीचरहैं वैसे ही बच्चे भी सायलेंट लर्नरहैं. किशोरावस्था वह उम्र है जब सेक्स-हार्मोन बनने और सक्रिय होने शुरू होते हैं. ऐसे समय में बच्चों के आस-पास होने वाली हरएक सेक्सुअल गतिविधि उनके मानस को, उनकी सोच को और उनके यौन व्यवहार को प्रभावित और तय करती है. टीवी, वीडियो, इंटरनेट, फिल्में, विज्ञापन, पोस्टर हर एक चीज से उनकी यौनिकता का निर्माण होता है.
लेकिन घर-परिवार, स्कूल और समाज के किसी भी हिस्से में कहीं कोई संस्था नहीं जो उनकी विकसित होती यौनिकता, उनके यौन व्यवहार और उनकी सोच पर उनसे खुलकर बात कर सके. उन्हें सही और गलत को तार्किक और सहज तरीके से बता सके. कोई नहीं जो उन्हें बता सके कि कैसे उन्हें दूसरे लिंग के हमउम्र बच्चों के साथ पेश आना चाहिए. कोई नहीं जो उनकी किशोरावस्था में जन्म लेने वाली उनकी यौन इच्छाओं को स्वस्थ तरीके से चैनलाइज कर सके, उन पर बात कर सके.
बच्चों द्वारा यौन हमलों की ये छिटपुट घटनाएं असल में बड़ी चेतावनी हैं. आने वाले समय में इस तरह की घटनाएं और बढ़ सकती हैं. क्योंकि हमारा ध्यान अभी भी ऐसी घटनाओं के कारणों पर नहीं है. हमारा ध्यान अभी भी सिर्फ ऐसी घटनाओं के बाद बच्चों को सुधारगृह भेजने पर है या जुवेनाइल की उम्र को कम या ज्यादा करने पर है या बच्चों को सजा कितनी, कैसी दी जाए सिर्फ इसी पर है. बच्चे क्यों हिंसक हो रहे हैं, क्यों यौन हमलावर बन रहें हैं ये हमारी चिंता के कारण अभी भी नहीं है. हम अभी भी बच्चों को यौन हमलावर बनने के लिए प्रेरित करने वाली चीजों पर लगाम कसने को तैयार नहीं हैं. समस्या के परिणामों पर दुख और अफसोस जताने से बेहतर है कि समस्या की जड़ पर ध्यान दिया जाए.

satyagrah.com से साभार 


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