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किशोर न्याय अधिनियम में बदलाव ..ताकि सुधार की संभावना समाप्त न हो

शंकर सिंह यादव 

बालिग होने की उम्र बदलने की कवायद फिर चल रही है। फिलहाल, देश में बालिग होने की उम्र 18 वर्ष है। उससे कम उम्र के किशोर-किशोरियों को नाबालिग मानते हुए जघन्य अपराधों में संलिप्तता साबित होने पर भी किशोर न्याय अधिनियम के तहत मुकदमा चला कर बहुत कम सजा दी जाती है।

करीब डेढ़ वर्ष पहले देश की राजधानी दिल्ली में चलती बस में सामूहिक बलात्कार में एक नाबालिग की संलिप्तता उजागर होने पर बालिग होने की उम्र घटाने पर राष्ट्रव्यापी बहस जोर-शोर से चली थी। बड़े वर्ग की मांग थी कि पीड़िता के साथ सबसे बर्बर व्यवहार के दोषी नाबालिग के विरुद्ध सामान्य कानून में मुकदमा चलाया जाए और कठोरतम सजा दी जाए।यह हो नहीं पाया और उसे केवल तीन वर्ष की सजा मिली।

इसके साथ ही बालिग होने की उम्र घटाकर 16 वर्ष करने की बहस भी समाप्त होती लगी थी, पर अब महिला व बाल विकास मंत्रलय के प्रस्तावित विधेयक-प्रारूप से वह बहस फिर से शुरू हो सकती है। इस प्रारूप में 16 वर्ष पूरे कर चुके उन किशोरों को बालिग मान उनके विरुद्ध सामान्य कानून के तहत मुकदमा चलाने की बात कही गई है, जो संगीन अपराध करते हैं।ऐसा लग सकता है कि यह प्रारूप भाजपानीत राजग सरकार की देन है, लेकिन वास्तविकता यह नहीं है।

दरअसल, दामिनी कांड के बावजूद संप्रग सरकार ने भले किशोर न्याय कानून में संशोधन से इंकार कर दिया था, मगर महिला और बाल विकास मंत्रलय लगातार ऐसे विधेयक के प्रारूप पर काम कर रहा था। इसके मुताबिक अगर 16 वर्ष से अधिक आयु वाला कोई किशोर हत्या, बलात्कार और अपहरण सरीखे जघन्य अपराध में फंसता है, तो एक महीने के अंदर ही शुरुआती जांच कर किशोर न्याय बोर्ड मामले को सामान्य अदालत के लिए हस्तांतरित कर देगा।हाल के वर्षो में जघन्य अपराधों में नाबालिगों की लिप्तता जिस तेजी से बढ़ी, उसके मद्देनजर किशोर न्याय अधिनियम में संशोधन की बात भी गलत नहीं है।

नाबालिग होना जहां अपराधियों के लिए कवच बन गया है, वहीं इसी कारण जघन्य अपराधों में उनके इस्तेमाल की प्रवृत्ति भी तेजी से बढ़ रही है। इसको रोकने के लिए किशोर न्याय कानून में संशोधन की जरूरत है, पर ऐसा करते वक्त किशोर न्याय अधिनियम की अवधारणा को भी ध्यान में रखना होगा। जघन्य अपराधों में दोषी नाबालिगों को सख्त सजा तो मिले, पर क्या उन्हें मृत्यु दंड और उम्र कैद सरीखे दंड देना उचित होगा, इस पर विचार व बहस की जरूरत है।

क्या सुधार की संभावना को खत्म करना सही होगा? यह आंकड़ा भी चौंकाने वाला है कि इस समय देश में लगभग 17 लाख नाबालिग आरोपी हैं, जबकि उन्हें रखने के लिए बने 815 नाबालिग सुधार केंद्रों की कुल क्षमता 35 हजार को ही रख पाने की है। अत: ये सुधार गृह एक तरह से जेलों में ही तब्दील हो चुके हैं। यह स्थिति किशोर न्याय अधिनियम की सोच के प्रतिकूल ही है। महिला व बाल विकास मंत्रलय के प्रस्तावित विधेयक-प्रारूप पर विचार के समय इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए, अनिवार्य रूप से।


वैसे, बालिग होने की उम्र में बदलाव में कुछ तकनीकी और व्यावहारिक बाधाएं भी हैं। भारत ने संयुक्त राष्ट्र की एक संधि पर हस्ताक्षर किए हुए हैं, जिसके अनुरूप हमारे यहां बालिग होने की उम्र 18 वर्ष है। अगर इसे कम किया जाता है, तो कुछ अड़चनें आएंगी। फिर, हमारे ही देश में बाल श्रम की आयु सीमा 14 वर्ष है। जाहिर है कि मामला इतना आसान है नहीं, जितना लगता है। इसलिए बेहतर यह होगा कि बदलती परिस्थितियों की चुनौतियों से निपटने के लिए इसके सभी पहलुओं पर खुले दिलोदिमाग से विचार किया जाए।

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