एल. एस. हरदेनिया
मंडेला से हमारे देश के उन लोगों को भी प्रेरणा लेना चाहिये जो सैकड़ों
साल हुई घटनाओं का बदला वर्तमान लोगों से लेना चाहते हैं। जो इतिहास के बदले लेते
हैं उनका स्थान इतिहास के कूड़ेदान में रहता है।
इंसानों
की मुक्ति के लिए छेड़े गई जंग के सबसे बड़े योद्धा नेल्सन मंडेला अब हमारे बीच
में नहीं रहे। उनका 05 दिसंबर 2013 को रात्रि के लगभग 8 बजे देहावसान हो गया। वे बीसवी शताब्दी के
महानतम नेताओं में से एक थे। उन्नीसवी और बीसवी शताब्दी ने दुनिया के अनेक महान
नेताओं को, जिनमें लैनिन, होचिमिन, माओत्सेतुंग, महात्मा गांधी और नेल्सन मंडेला शामिल हैं जन्म
दिया था। शायद ही किसी महान व्यक्ति ने अपने आदर्शों और उसूलों के लिए इतने लंबे
समय तक संघर्ष किया हो, जो नेल्सन मंडेला ने किया। विश्व के इतिहास में
उनका अदभुत स्थान है।
दक्षिण
अफ्रीका की फासिस्टी जेल से जब नेल्सन मंडेला रिहा हुए थे तब दुनिया के करोड़ों
लोगों ने चैंधियाती आंखों से आश्चर्यचकित होकर देखा था कि हाड़-मांस का बना यह
कैसा अद्भुत इंसान है जिसका दुनिया का क्रूरतम शासन 27 वर्ष की लंबी अवधि में बाल
बांका भी नहीं कर सका।
आखिर
यह कैसे संभव हुआ ? सत्ताईस वर्षों के दौरान अनेक बार दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने
नेल्सन मंडेला से उन्हें रिहा करने का प्रस्ताव किया, परन्तु हर बार उन्होंने यह प्रस्ताव यह कहते हुए ठुकरा दिया कि ”अकेले मुझे आजाद करने से
क्या होगा? जब मेरे सारे देशवासी एक तरह की जेल में रह रहे हों तो अकेले मेरी
आजादी का क्या मतलब?“ संभवतः अपने देशवासियों के प्रति उनकी यही
प्रतिबद्धता थी जिसने मंडेला को मौत के बीच भी जिन्दा रखा।
नेल्सन
मंडेला का जन्म 18 जुलाई, 1918 को
दक्षिण अफ्रीका के उमताती जिले के ट्रांसकाई नामक गांव में हुआ था। वे अपने
क्षेत्र के एक संपन्न परिवार में जन्मे थे। पिता को अंग्रेजों द्वारा दंडित किए
जाने के कारण मंडेला का बचपन विपरीत परिस्थितियों में बीता। वे अपने परिवार के
पहले सदस्य थे जिसने अपने पिछड़े हुए समुदाय की सीमाओं को लांघकर एक स्कूल में
दाखिला लिया। उसके बाद उन्होंने फोर्ट हारे विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में शिक्षा ग्रहण की। यह कॉलेज मूलतः
दक्षिण अफ्रीका के काले नवयुवकों के लिए था। इस कॉलेज को दक्षिण अफ्रीका के काले
नौजवान ”आक्सफोर्ड, केम्ब्रिज
हार्वर्ड और येल“ का मिलाजुला संस्थान कहते थे।
अफ्रीकन
नेशनल कांग्रेस की स्थापना 1912 में हुई थी। इस संगठन का मुख्य उद्धेश्य
दक्षिण अफ्रीका में गोरे लोगों के शासन का विरोध था। मंडेला को यह महसूस हुआ कि उन्हें उन अपमानों को नहीं सहना चाहिए जो उनके
समाज के अनेक लोग एक काला आदमी होने के नाते प्रतिदिन सहते हैं। मंडेला के दिमाग
में अनेक नये-नये विचार आए और इसी तरह के विचारों और गतिविधियों के चलते उन्हें
कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया। इसी बीच अपने
कबीले के रीति-रिवाजों के अनुसार उनकी शादी तय हो गई परन्तु उन्हें इस तरह का
विवाह स्वीकार नहीं था। इसलिए बिना किसी को बताए वे जोहेन्सबर्ग चले गए।
जोहेन्सबर्ग
को सोने का शहर कहते हैं। उसके आसपास सोने की खदानें हैं। सोने की खदानों में काम
करने वाले मजदूरों की दयनीय स्थिति देखकर मंडेला को जबरदस्त आक्रोश हुआ। सोने की
खदानें चलाने वाले असीमित सम्पत्ति के मालिक बन गए थे। इन खानों में काम करने वाले
मजदूर, शोषण के शिकार थे। इसी बीच, मंडेला ने एक वकील के यहां नौकरी कर ली। साथ-साथ उन्होंने अपनी
शिक्षा भी पूरी की। इस दरम्यान उन्होंने शहरों की गंदी बस्तियों में रहने वालों के
नरकीय जीवन को देखा। इसी बीच उनका संपर्क अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के नेताओं से
हुआ। उनका संपर्क दक्षिण अफ्रीकी कम्युनिस्ट पार्टी, दक्षिण
अफ्रीकी इंडियन कांग्रेस इत्यादि अन्य संगठनों से भी हुआ !
इसके
बाद मंडेला ने कानून की परीक्षा पास की। अपनी शिक्षा के दौरान उन्हें ऐसा महसूस
हुआ कि यदि उन्होंने वकालत शुरू कर दी तो वे एक ऐसे वर्ग के सदस्य बन जाएंगे जो
अंग्रेजी साम्राज्य को स्थायित्व प्रदान करता है।
यद्यपि
कई कम्युनिस्ट उनके मित्र थे तदापि उनकी आस्था थी कि अफ्रीकी राष्ट्रवाद से ही
दक्षिण अफ्रीका को आजाद किया जा सकता है। 1944 में मंडेला ने अफ्रीकन
नेशनल कांग्रेस की यूथ लीग की सदस्यता स्वीकार की। इस संस्था का उद्धेश्य अफ्रीकी
युवकों के दिलो-दिमाग में नयी स्फूर्ति पैदा करना था। इस बीच दक्षिण अफ्रीका में
स्थितियां और बिगड़ती गईं। दक्षिण अफ्रीका की 87 प्रतिशत कृषि योग्य जमीन पर गोरों का कब्जा हो
गया था। मूल निवासियों को गंदी बस्ती में रहने पर मजबूर किया जाने लगा। मूल
अफ्रीकी निवासियों का मताधिकार भी छीन लिया गया। इस बात की उम्मीद थी कि द्वितीय
विश्वयुद्ध के बाद स्थितियों में परिवर्तन होगा परन्तु ऐसा नहीं हुआ। दक्षिण
अफ्रीका की हालत और बिगड़ गई। दक्षिण अफ्रीका की नेशनल पार्टी, जिसने दुसरे विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर का समर्थन किया था, पुनः चुनाव जीत गई। इस पार्टी
का नारा था- ”काले लोगों को देश से निकालो“ या ”कुली बनाओ“।
ऐसे
मौके पर अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस पर एक नई जिम्मेदारी आ गई। उसने विकल्पों की तलाश
शुरू कर दी। क्या अफ्रीकी राष्ट्रवाद अपने ही बल पर संघर्ष करता रहे या दूसरों के
साथ जुड़े? मंडेला एक संतुलन बनाये रखना चाहते थे। वे चाहते
थे कि जहां एक ओर अफ्रीकी राष्ट्रवाद का परचम लहराता रहे, वहीं दूसरी ओर अन्य ताकतों से भी समन्वय स्थापित किया जाये। इस
दरमियान दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार ने अनेक कानून बनाकर काले लोगों का भयंकर
शोषण व दमन प्रारंभ कर दिया। इस समय तक अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस महात्मा गांधी के
पदचिन्हों पर चल रही थी। वह अहिंसक साधनों पर पूर्णरूपेण आस्था रखती थी।
उसकी
इस अहिंसक वैचारिक अवधारणा का दक्षिण अफ्रीका की वहशी सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा।
वहां की सरकार ने नये-नये कानून बनाये और नेशनल कांग्रेस ने अपने तौर-तरीके बदलने
का फैसला किया। इस दरम्यान मंडेला को गंभीर प्रतिकूल परिस्थितियों में अपना
जीवनयापन करना पड़ा। कभी ड्रायवर, कभी होटल बाय इन विभिन्न रूपों में भूमिगत रहते
हुये उन्होंने यह महसूस किया कि अब उन्हें अहिंसा का रास्ता छोड़ना पड़ेगा।
इसी
बीच मंडेला ने माओ, चेगोवेरा आदि क्रांतिकारियों के विचारों और जीवन
का अध्ययन किया। अहिंसा का रास्ता त्यागने के बाद अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस और
नेल्सन मंडेला ने सरकारी संस्थानों में तोड़-फोड़ का कार्यक्रम हाथ में लिया।
मंडेला ने यह तय किया कि व्यक्तियों को नहीं सरकारी संस्थाओं को निशाना बनाना
चाहिए। मंडेला द्वारा हिंसा का रास्ता अपनाने के बाद दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने
सघन जवाबी कार्यवाही शुरू कर दी। गोरी पुलिस उनका पीछा करती थी परन्तु वे हमेशा
पुलिस को छकाते रहे। इन गंभीर परिस्थितियों के बीच उन्होंने कुछ दिनों के लिए
दक्षिण अफ्रीका छोड़ दिया और अफ्रीका महाद्वीप के अनेक देशों के नेताओं से संपर्क
के लिए लम्बी यात्रा प्रारंभ की। उन्होंने अफ्रीकी देशों के एक सम्मेलन में भी भाग
लिया। अपनी महायात्रा के दौरान वे जाम्बिया, तन्जानियाँ, ट्युनिशिया, अलजीरिया, मोरक्को, सेनेगल, लाइबेरिया आदि गये। इन समस्त देशों में उन्होंने
अपने आंदोलन के लिये समर्थन जुटाया। अपने प्रवास के दौरान वे मिस्त्र भी गये। वहां
उन्होंने मिस्त्र के राष्ट्रपति नासिर द्वारा उठाये गये अनेक क्रांतिकारी कदमों का
अध्ययन किया। उन्हें नासिर की उद्योगों के राष्ट्रीयकरण की नीति काफी पसंद आई।
अफ्रीकियों के बारे में प्रायः यह कहा जाता है कि उनकी कोई सभ्यता-संस्कृति नहीं
है। मिस्त्र में मंडेला को जो कुछ देखने को मिला, विशेषकर
वहां की महान कलाकृतियां और वास्तु तथा वहां पाये गये विकसित सभ्यता के अन्य अवशेष, उससे उन्हें यह ज्ञात हुआ कि जब यूरोप के निवासी गुफाओं में निवास
कर रहे थे तब मिस्त्र, दुनियाँ का एक अत्यधिक विकसित राष्ट्र था।
मंडेला को अनेक अफ्रीकी देशों ने उनके संघर्ष में सहयोग का आश्वासन दिया। अपने
अफ्रीका प्रवास के दौरान उन्होंने सैनिक प्रशिक्षण भी प्राप्त किया।
1962 में वे दक्षिण अफ्रीका वापस
आ गये परन्तु थोड़े ही दिनों में उन्हें अफ्रीका की गोरी पुलिस ने गिरफ्तार कर
लिया। उन पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें आजन्म कारावास की सजा दी गई। उनपर आरोप था
कि उन्होंने दक्षिण अफ्रीकी सरकार के विरुद्ध लोगों को भड़काया और बिना पासपोर्ट
के अनेक देशों की यात्रा की। अपने जेल के दिनों का विवरण देते हुए वे अपनी आत्मकथा
में लिखते हैं कि पुलिस अत्यधिक वहशियाना ढंग से व्यवहार करती थी। बिना किसी कारण
कैदियों को पीटती थी, उनको घुटन भरे स्थानों पर रखती थी और उन्हें
बिजली का शॉक भी देती थी।
कुछ
दिनों में नेल्सन मंडेला को राबिन नाम के द्वीप में भेज दिया गया। इस द्वीप में
दक्षिण अफ्रीका का सर्वाधिक सुरक्षित जेल था। यहां नेल्सन मंडेला को नारकीय
यातनाएं दी गई। राबिन द्वीप में नौ महीने रहने के बाद उन पर पुनः एक मुकदमा लाद
दिया गया। इस मुकदमें में उन पर दक्षिण अफ्रीका की सरकार के विरुद्ध षड़यंत्र रचने
का आरोप लगाया गया। अदालत ने उन्हें फिर से आजीवन कारावास की सजा दी।
नेल्सन
मंडेला ने अपने जेल के दिनों का दिल दहला देने वाला वर्णन अपनी आत्मकथा में किया
है। यह विवरण इतना मार्मिक है कि आने वाली पीढि़यां उसे एक उपन्यास की तरह
पढ़ेंगी। मंडेला लिखते हैं कि हमें एक अंधेरी कोठी में रखा
जाता था। उसमें न कोई बिस्तर रहता था, न कुर्सी, न पानी और न शौच की सुविधा। खाना ऐसा दिया जाता था जिसे पशु भी न खा
सकें। इन
नारकीय स्थितियों के बावजूद अफ्रीकी कैदियों और जेल वार्डनों में दिन-रात झगड़े की
स्थिति बनी रहती थी। मंडेला को तेरह वर्षों तक एक खदान में काम करने के लिये मजबूर
किया गया। खान के मजदूर प्रायः कोई न कोई गाना गाते रहते थे। इनमें से अनेक गीत
राष्ट्रीय भावनाओं को जागृत करने वाले होते थे। इस तरह के गानों पर प्रतिबंध लगा
दिया गया। फिर मजदूरों ने सीटी बजाकर गीत गाना प्रारंभ किया तो सीटी बजाना
प्रतिबंधित कर दिया गया। एक अवसर तो ऐसा भी आया जब मजदूरों के बीच आपसी बातचीत भी
बंद करवा दी गई।
जेल
में मंडेला, कैदियों के नेता के रूप में उभर कर आये। समस्त
कैदियों ने एक संकल्प द्वारा जेल के भीतर व्याप्त तानाशाही के विरुद्ध आवाज उठाई।
कैदियों की मांग थी कि उनके रहन-सहन की स्थितियों में सुधार किया जाये। 1977 में
मंडेला से खदानों में काम करवाना बंद करवा दिया गया। उन्हें पढ़ने लिखने की और
टेनिस खेलने की इजाजत दे दी गई। 1982 में
उन्हें रोबिन द्वीप से हटाकर केपटाउन के पास स्थित एक जेल में भेज दिया गया। इसी
बीच मंडेला ने यह तय किया कि दक्षिण अफ्रीका की सरकार से बातचीत की जाये, परन्तु उनकी यह पहल खतरों से भरपूर थी। प्रश्न यह था कि यदि वे
बातचीत करेंगे तो यह आरोप तो नहीं लगेगा कि वे बिक गये हैं।
उस
समय मंडेला अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष भी नहीं थे। नेल्सन मंडेला का
स्वभाव ही था खतरों से खेलना। इसलिये उन्होंने समस्त संभावित खतरों के बावजूद
दक्षिण अफ्रीका की सरकार से बातचीत करना उचित समझा। इस दरम्यान समस्त दक्षिण
अफ्रीका में चारों तरफ राजनैतिक हिंसा और अराजकता का वातावरण निर्मित हो गया। देश
पर शासन करना असंभव हो गया । बातचीत का नतीजा निकला और अंततः दक्षिण अफ्रीका की एक
आततायी शासन से मुक्ति की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई। अनेक रंगभेद संबंधी कानून रद्द
किये जाने लगे। तीस प्रतिबंधित संगठनों पर से प्रतिबंध उठा लिये गये और अंततः 10 फरवरी 1990 को 27 वर्ष तक जेल की यातना सहने के बाद मंडेला को
रिहा किया गया।
उनकी
जेल यात्रा तो समाप्त हुई परन्तु नेल्सन मंडेला जानते थे कि भविष्य का रास्ता
कितना कठिन है। मुठ्ठीभर गोरे अल्पसंख्यकों ने दक्षिण अफ्रीका के बहुसंख्यकों पर
सैकड़ों वर्ष नाना प्रकार के अत्याचार किये थे। दक्षिण अफ्रीका की धरती पर ही
महात्मा गाँधी को अत्यधिक कमाई का धंधा-वकालत-छोड़कर साम्राज्यवादियों के विरुद्ध
एक लंबा संघर्ष छेड़ने की प्रेरणा मिली थी। अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस और मंडेला
वर्षों तक महात्मा गाँधी के रास्ते पर चले थे परन्तु जब दक्षिण अफ्रीका की
नस्लवादी सरकार की अत्याचारी गतिविधियां दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई, निहत्थे लोगों पर कातिलाना हमले होते रहे, बोलने, लिखने और संगठित होने के अधिकार पूरी तरह छीन
लिये गये, खुद की ही धरती पर खुद के ही देश में दक्षिण
अफ्रीका के बहुसंख्यक नागरिकों को लगभग जेल जैसी स्थितियों में रहने पर मजबूर किया
गया तो अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस और नेल्सन मंडेला ने हथियार उठाना उचित समझा।
इस
लंबे काल में वहां के मूल निवासियों और मुट्ठीभर गोरे लोगों के सबंध अत्यधिक कटु
हो गए थे। मंडेला के सामने सबसे बड़ी समस्या यही थी कि इन दोनों नस्लों के बीच इस
पारस्परिक घृणा को कैसे समाप्त किया जाये। इस मामले में मंडेला ने अत्यधिक मानवीय
उदारता का परिचय दिया। उनका कहना था कि जब तक हम भूतकाल को भुलायेंगे नहीं, तब तक उज्जवल भविष्य का निर्माण संभव नहीं है।
नेल्सन
मंडेला का व्यक्तित्व कितना उदार है इसका एक उदाहरण यहां पर प्रस्तुत करना उचित
होगा। एक भव्य समारोह में नेल्सन मंडेला की राष्ट्रपति के रूप में शपथ होनी थी।
समारोह में अनेक देशों के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राजा, महाराजा उपस्थित थे। इसी बीच मंडेला ने घोषणा की
कि वे सभा का परिचय उनके दो महत्वपूर्ण मेहमानों से करवाएंगे। जिस समय कार्यक्रमस्थल अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों से भरा हो, वह भी ऐसे अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों से जो एक दूसरे को जानते हों, उस समय मंडेला का यह कहना कि वे अपने दो अत्यधिक महत्वपूर्ण मेहमानों
से परिचय करवायेंगे, एक चैंकाने वाली बात थी। इसके बाद, अपने दोनों ओर खड़े दो गोरे सिपाहियों का परिचय कराते हुये मंडेला ने
बताया कि ये दो व्यक्ति ही मेरे महत्वपूर्ण अतिथि हैं। मेरे जेल के दिनों में इन
दोनों ने मुझे विभिन्न किस्म की यातनाएं दी थीं। मैं इस बात को जानता हूं कि
इन्होंने स्वयं की पहल पर ऐसा नहीं किया था इसलिये मैं इन दोनों को आज क्षमा कर
रहा हूं और इनके माध्यम से मैं उन तमाम गोरे लोगों को क्षमा कर रहा हूं जिन्होंने
कभी न कभी इस देश के बहुसंख्यक निवासियों पर जुल्म किये थे। मैं चाहता हूँ कि इस
देश के समस्त मूल निवासी हमारे पूर्व गोरे शासकों को माफ कर दें। हम जानते हैं कि
उन्हें हमारे बीच रहना है और इसलिये क्यों न हम मिल-जुलकर, अतीत को भुलाकर रहें। कड़वा इतिहास भुलाना ही उचित होता है।
नेल्सन
मंडेला इस दिशा में सतत प्रयासरत हैं। गाँधी जी भी कहा करते थे कि हमारी नाराजगी
अंग्रेज साम्राज्य से है अंग्रेजों से नहीं। महात्मा गाँधी के दिखाये इसी मार्ग पर
मंडेला चल रहे हैं। मंडेला से हमारे देश के उन लोगों को भी प्रेरणा लेना चाहिये जो
सैकड़ों साल हुई घटनाओं का बदला वर्तमान लोगों से लेना चाहते हैं। जो इतिहास के
बदले लेते हैं उनका स्थान इतिहास के कूड़ेदान में रहता है।
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