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Sunday, July 7, 2013

शिक्षा के अधिकार कानून (आरटीई) के 3 साल और आगे का सफ़र



बीते 1 अप्रैल 2013 को देश में शिक्षा के अधिकार कानून (आरटीई) को लागू करने के बाद सरकारों को जरूरी संसाधन जुटाने के लिए तीन साल की मोहलत दी गई थी, वो पूरी हो चुकी है। 

 2010 में यूपीए सरकार ने देश के हर बच्चे को शिक्षा के अधिकार का वादा किया था, सरकार द्वारा कहा गया था कि अगले तीन साल यानी 31 मार्च 2013 तक ये वादे हकीकत का रूप लेगें। लेकिन गैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश भर में महज सात फीसदी स्कूल ही ऐसे हैं, जिन्होंने पूरी तरह से शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया है। 

इस कानून को लागू करने में दो स्तरों में दिक्कतें हैं, एक बुनियादी चीजो की कमी और दूसरी शिक्षा में गुणवत्ता का आभाव।

अभी भी 6 से 14 साल के बच्चों को पढ़ाने वाले लगभग 12 लाख स्कूली शिक्षकों की कमी है। जबकि योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों का होने में ओर ज्यादा समय लग सकता है। अब भी छात्र-षिक्षक अनुपात, शालाओं में ढ़ांचागत् सुविधाऐं, पीने का पानी, शौचालय और खेल का मैदान सभी स्कूलों मे उपलब्ध नहीं है। 

हाल ही में शिक्षा के नीतिगत मामलों की राष्ट्रीय स्तर की सबसे बड़ी संस्था केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की बैठक दो अप्रैल को हुई है। इस बैठक में केन्द्र सरकार और सभी राज्यों ने मिल कर षिक्षा के अधिकार कानून के पूरा होने पर इसकी समीक्षा की। इस बैठक में ज्यादातर राज्यों के मंत्रियों की मांग थी कि चूंकि वे विभिन्न कारणों से अपने राज्यों में शिक्षा के अधिकार के कियान्वयन में पूरी तरह से सफल नही हुए है इस कारण आरटीई, कानून के अमल की मियाद कुछ और बढ़ाया जाये। लेकिन केन्द्र सरकार इस पर राजी नही हुई है। केन्द्र और राज्य सरकारें आरटीई के प्रभावी अमल के लिए साथ मिल कर काम करने के बजाय एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रही हैं। 

मध्यप्रदेश  में भी शिक्षा  के अधिकार कानून के कियान्वयन की स्थिति बहुत अच्छी नही है। प्रदेश  में शालाएं  शिक्षकों की कमी से जूझ रही हैं। शिक्षा  अधिकार कानून के मुताबिक प्रदेश  में जितने शिक्षक होने चाहिए, उनमें से 33.73 प्रतिषत शिक्षकों  की कमी है। 

हाल ही में म.प्र. लोक सधर्ष साझा मंच द्वारा अपने सहयोगी संस्थाओं के साथ मिल कर प्रदेश के 10 जिलों के 121 स्कूलों में शिक्षा  के अधिकार कानून के कियान्वयन को लेकर अध्ययन किया गया है। इस अध्ययन के निष्कषों से पता चलता है कि स्थिति चिंताजनक है। आज भी अध्ययन किये गये 68 प्रतिषत शालाओं में टी.सी यानी स्थानान्तरण प्रमाण पत्र के बगैर बच्चों को प्रवेष नहीं दिया जाता है। वहीं 53 प्रतिषत शालाओं में प्रवेष के समय जन्म प्रमाण पत्र को अनिवार्य माना गया है।

वही दूसरी तरफ अध्ययन से सामने आए तथ्यों के अनुसार 41 प्रतिशत प्राथमिक शालाएं सिर्फ 2 कमरों में लगती है, वहीं 15 प्रतिशत शालाओं में तो पहली से पांचवी कक्षा तक के बच्चे एक ही कमरे में बैठकर पढ़ते हैं।  अध्ययन से सामने आए तथ्यों के अनुसार 67 प्रतिषत शालाओ में पीने के पानी की सुविधा नहीं है। 

स्पष्ट है कि तीन वर्ष की समयसीमा पूरी हो जाने के बाद अभी भी देश  और प्रदेश  में षिक्षा अधिकार कानून को लागू करने की दिशा में कई ठोस एव सक्रिय कदम उठाने की जरूरत हैं। जिसमें बच्चों की शाला तक पहुंच बनाने, शालाओं में ढांचागत् सुविधाएं उपलब्ध कराने, गुणवत्ता षिक्षा सुनिष्चित करने के लिए सघन प्रयास करने होंगे और यह तभी हो सकता है जब केन्द्र और राज्य सरकारें अपनी जिम्मेदारी एक दूसरे पर डालने के बजाये साथ मिल कर काम करें और इसमें समुदाय,स्थानिय निकायों की भी सकिय भूमिका सुनिष्चित की जाये

मध्यप्रदेश  लोक संघर्ष साझा मंच के  अनियतकालीन संवाद पत्र साझी बात [अंक- अक्टूबर-दिसंबर 2013] का सम्पादकीय

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