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Tuesday, February 12, 2013

भारतः बाल यौन उत्पीड़न पर खामोशी और उपेक्षा का साया


(नई दिल्ली) ह्यूमन राइट्स वॉच ने आज जारी नई रिपोर्ट में कहा कि भारत सरकार को नई दिल्ली में दिसंबर, 2012 में एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या के बाद व्यापक सुधार प्रयासों के तहत यौन उत्पीड़न से बच्चों की सुरक्षा में सुधार लाना चाहिए।
यह परेशान करने वाली बात है कि भारत में बाल यौन उत्पीड़न घरों, स्कूलों तथा आवासीय देखभाल केंद्रों में आम बात है। दिल्ली बलात्कार कांड के बाद सरकार द्वारा कानूनी और नीतिगत सुधार सुझाने के लिए गठित की गई समिति ने पाया कि बाल सुरक्षा नीतियाँ “स्पष्ट रूप से उन लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रही हैं जिनका उन्होंने बीड़ा उठाया था।”
82-पृष्ठों की रिपोर्ट, “इस खामोशी को तोड़ना होगाः भारत में बाल यौन उत्पीड़न,” में इस बात की जाँच की गई है कि कैसे सरकार द्वारा इस समय उठाए जा रहे कदम बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने तथा पीड़ितों के साथ व्यवहार के मामलों में अपर्याप्त हैं।अनेक बच्चों को दोबारा दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ रहा है और उसका कारण है पीड़ादायक चिकित्सीय जाँच और पुलिस और अन्य अधिकारी जो या तो उनकी बात सुनना नहीं चाहते या फिर उन पर विश्वास नहीं करते।ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि यदि सुरक्षा की प्रक्रिया का सही तरह से कार्यान्वयन नहीं हुआ अथवा यह सुनिश्चित करने के लिए न्याय व्यवस्था में सुधार नहीं लाया गया कि बाल यौन उत्पीड़न की पूरी रिपोर्ट हो और उचित रूप से मुकदमा चलाया जाए तो इस समस्या से निबटने के सरकारी प्रयास विफल साबित होंगे।
ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली का कहना है, “भारत में बाल यौन उत्पीड़न से निपटने की प्रणाली अपर्याप्त है क्योंकि सरकारी तंत्र बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित कराने में विफल रहा है।” उनका कहना है, “वे बच्चे जो साहस दिखाते हैं और यौन उत्पीड़न की शिकायत करते हैं उनकी बात को पुलिस, चिकित्सा कर्मचारी और अन्य अधिकारी प्रायः अनसुना कर देते हैं या उसकी उपेक्षा करते हैं।”

यह रिपोर्ट बाल यौन उत्पीड़न रोकने और उससे निपटने के सरकारी तौर तरीके किस पैमाने पर जारी हैं इनका विश्लेषण करने के बजाय कुछ मामलों के विस्तृत अध्ययन पर आधारित है। ह्मूमन राइट्स वॉच ने बाल यौन उत्पीड़न झेल चुके बच्चों, उनके संबंधियों, सरकारी बाल सुरक्षा अधिकारियों तथा स्वतंत्र विशेषज्ञों, पुलिस अधिकारियों, डॉक्टरों, समाज सेवकों और बाल यौन उत्पीड़न के मामलों से जुड़े वकीलों के 100से अधिक साक्षात्कार किए।
ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि बाल यौन उत्पीड़न से निपटना वैसे तो दुनिया भर में एक चुनौती है किंतु भारत में राज्य और समुदाय स्तर दोनों पर कमियों ने इस समस्या को और उजागर कर दिया है।जिस समय से पुलिस को शिकायत मिलती है और जब तक मुकदमे का निपटारा होता है, इस पूरी आपराधिक न्याय व्यवस्था में तुरंत सुधार की ज़रूरत है।समुचित प्रशिक्षण से वंचित पुलिसकर्मी प्रायः शिकायतें दर्ज ही नहीं करते।इसके बजाय वे पीड़ित को दुर्व्यवहार तथा शर्मिंदगी झेलने को बाध्य कर देते हैं।
डॉक्टरों तथा अधिकारियों ने कहा कि संवेदनशील चिकित्सा उपचार और बाल यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चों की जाँच के लिए दिशानिर्देश और प्रशिक्षण के अभाव में यह प्रक्रिया और भी पीड़ादायक हो जाती है।ह्यूमन राइट्स वॉच ने जिन मामलों को रिकॉर्ड किया उनमें चार में डॉक्टरों ने यौन उत्पीड़न का शिकार हुई बालिका की जाँच के अंतर्गत “उंगली से परीक्षण” का इस्तेमाल किया था।हालाँकि फ़ॉरेन्सिक विशेषज्ञों का कहना है कि इस परीक्षण का कोई वैज्ञानिक महत्व नहीं है और एक शीर्ष स्तर की सरकारी समिति ने इसकी समाप्ति की मांग की है।
मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “बाल यौन उत्पीड़न का शिकार हुए बच्चों और उनके संबंधियों का वैसे ही सामने आना और सहायता की गुहार करना मुश्किल है, उस पर भारतीय अधिकारी इन मामलों से संवेदनशीलता से निपटने के बजाय उन्हें नीचा दिखाते हैं और उन्हें एक बार फिर यंत्रणा झेलने को मजबूर कर देते हैं,” उन्होंने कहा, “पुलिस को पीड़ितों के साथ व्यवहार में और अधिक संवेदनशील और सहयोगपूर्ण रवैया अपनाने के लिए आवश्यक सुधारों के कार्यान्वयन में विफलता के कारण पुलिस थाने ऐसी जगह बन गए हैं जहां जाते हुए लोग डरते हैं।”
ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि अनाथ और खतरे का सामना कर रहे अन्य बच्चों की देखरेख के आवासीय केंद्रों में बच्चों का यौन उत्पीड़न अन्य गंभीर समस्या है।देश के अधिकांश भागों में निरीक्षण व्यवस्था अपर्याप्त है।निजी तौर पर चलाई जा रही कई संस्थाओं का पंजीकरण तक नहीं हुआ है।इसके परिणामस्वरूप, सरकार के पास देश में संचालित सभी अनाथालयों तथा अन्य संस्थानों का न तो कोई रिकॉर्ड है न ही वहाँ रहने वाले बच्चों की कोई सूची है।खराब निगरानी व्यवस्था के कारण कई जाने-माने तथा प्रतिष्ठित माने जाने वाले संस्थानों में भी उत्पीड़न की घटनाएँ होती हैं।
दिल्ली बलात्कार के बाद सरकार द्वारा दिसंबर, 2012 में न्यायमूर्ति जे.एस.वर्मा की अध्यक्षता में गठित समिति ने यौन आक्रमण की घटनाओं से निपटने के लिए कई सिफ़ारिशें की हैं और विशेष रूप से आवासीय देखभाल संस्थाओं में बच्चों की दुर्दशा पर चिंता व्यक्त की है।इन संस्थाओं के प्रबंधक बाल यौन उत्पीड़न के आरोपों की जाँच के बजाय, शिकायतों को गलत ठहराने अथवा उन्हें खारिज करने के काम में जुटे रहते हैं।ऐसी ही एक संस्था में उत्पीड़न के आरोपों की जाँच के बाद राष्ट्रीय बाल अधिकार सुरक्षा आयोग के विनोद टिक्कू ने कहा कि इससे बहुत बड़ी खराबी का पता चला।उन्होंने ह्यूमन राइट्स वॉच से कहा, “यह लापरवाही नहीं है, यह व्यवस्थित विफलता है।”
मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “यह चौंका देने वाली बात है कि वही संस्थान जिन्हें असुरक्षित बच्चों की सुरक्षा करनी चाहिए उन्हें भयावह बाल यौन उत्पीड़न के खतरे का सामना करने के लिए छोड़ देते हैं।” उन्होंने कहा, “राज्य सरकारों को तत्काल ऐसी प्रभावी व्यवस्था कार्यान्वित करनी चाहिए जिसमें बच्चों की देखभाल की सरकारी, निजी और धार्मिक संस्थाओं के पंजीकरण और उनकी सख़्ती के साथ निगरानी का प्रावधान हो।”
ह्यूमन राइट्स वॉच ने 2012 में यौन उत्पीड़न से बच्चों की सुरक्षा वाला कानून बनाए जाने का स्वागत किया।इस कानून को पारित करके भारत सरकार ने देश के बच्चों के व्यापक यौन उत्पीड़न को स्वीकार करने और उससे निपटने के प्रयासों की ओर महत्वपूर्ण कदम उठाया है। कानून के अंतर्गत, भारत में पहली बार सभी प्रकार के बाल यौन उत्पीड़न विशिष्ट अपराध माने जाएँगे।कानून में पुलिस और न्यायालयों के लिए महत्वपूर्ण दिशानिर्देश हैं ताकि वे पीड़ितों के साथ संवेदनशीलता से व्यवहार करें तथा इसमें विशिष्ट बाल अदालतें गठित करने का भी प्रावधान है।
ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि फिर भी, सरकार को इस कानून और अन्य संबद्ध कानूनों और नीतियों का उचित कार्यान्वयन सुनिश्चित कराए जाने की ज़रूरत है ताकि चौकस सुरक्षा तंत्र बनाया जा सके।यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि प्रायः बच्चों का यौन उत्पीड़न वही लोग करते हैं जिन्हें वे जानते हैं और वे प्रभावशाली भूमिका में होते हैं, जैसे बड़े रिश्तेदार, पड़ोसी, स्कूल के कर्मचारी अथवा अनाथों और अन्य असुरक्षित बच्चों की देखरेख के लिए बने आवासीय संस्थानों के कर्मचारी या वहाँ रहने वाले बड़े बच्चे।देश के बच्चों की भलाई के लिए किए गए वर्तमान उपायों को अमल में लाया जाना अब भी चुनौती है जिनमें एकीकृत बाल सुरक्षा नीति, किशोर न्याय कानून और स्वतंत्र बाल अधिकार आयोग का गठन शामिल हैं।
भारत सरकार को पुलिस, डॉक्टरों, न्यायालयों के कर्मचारी तथा बाल कल्याण अधिकारियों, बच्चों के आवासीय देखरेख संस्थानों के प्रबंधकों सहित सरकारी तथा निजी सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्कूलों के अधिकारियों को प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बाल यौन उत्पीड़न के आरोप सामने आने पर वे उससे निबटने में सक्षम हों।सरकार को सरकारी संस्थानों में भरोसा न होने के मामले को सुलझाने के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए और इसके लिए बाल यौन उत्पीड़न मामलों पर तुरंत और संवेदनशील तरीके से कार्रवाई न करने वाले लोगों की जवाबदेही निश्चित करनी चाहिए, क्योंकि इसके कारण बहुत से लोग बाल यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराने से बचते हैं।
भारत अंतर्राष्ट्रीय नागरिक और राजनीतिक अधिकार समझौता (आईसीसीपीआर), बाल अधिकार संधि तथा महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव उन्मूलन संधि सहित बच्चों को सुरक्षा प्रदान करने वाले कई प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार समझौतों में शामिल है।इन समझौतों के अंतर्गत राष्ट्र इस बात के लिए बाध्य हैं कि वे सरकार में हर स्तर पर बच्चों को यौन हिंसा और उत्पीड़न से बचाने के लिए कदम उठाएँ और जहाँ मूलभूत सुरक्षा का हनन हुआ हो वहाँ उसका निवारण करें।आईसीसीपीआर न केवल व्यक्तियों की सरकार द्वारा उत्पीड़नकारी कार्रवाई से सुरक्षा के लिए बल्कि निजी संस्थानों द्वारा किए गए उत्पीड़न से उपयुक्त और प्रभावशाली तरीके से निबटने के लिए भी राष्ट्र को जिम्मेदार ठहराता है।
मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “भारत सरकार उच्चतम स्तरों पर यह मानती है कि बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए बहुत कुछ और करने की ज़रूरत है। किंतु उसे भेदभाव, पूर्वाग्रह तथा निरी असंवेदनशीलता की समस्याओं के निपटारे के लिए अभी भी महत्वपूर्ण कदम उठाने हैं,” उन्होंने कहा, “जैसा कि कई अधिकारियों ने हमसे कहा, कानून बनाना अथवा प्रशिक्षण देना महत्वपूर्ण कदम है, किंतु इसके बाद ठोस कार्रवाई करना भी आवश्यक है।और उतना ही आवश्यक है सोच में बदलाव जहाँ उत्पीड़न करने वाले और अपने काम के साथ लापरवाही बरतकर उन्हें बचाने वाले, दोनों को जिम्मेदार ठहराया जाए।”



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