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Thursday, January 31, 2013

"प्रथम" की "असर "वार्षिक सर्वेक्षण रपट 2012


 डॉ. गीता गुप्त


रकार नि:शुल्क शिक्षा अधिकार क़ानून ने बच्चों को पढ़ने का अधिकार तो दिलवा दिया है पर क्या बच्चे सचमुच पढ़ रहे हैं ?यह प्रश्न बहुत प्रासंगिक है। इसलिए कि अशासकीय संगठन 'प्रथम'के वार्षिक सर्वेक्षण रपट 2012 में ग्रामीण ज़िलों के प्राथमिक स्तर की शिक्षा की जो स्थिति उजागर हुई है उससे स्पष्ट है कि कागज़ पर विद्यालयों में बच्चों की संख्या अवश्य बढ़ी है, परन्तु वे पढ़ाई से कोसों दूर हैं। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. एम. एम. पल्लम राजू द्वारा जारी यह रपट 567 ज़िलों के 16 हज़ार गांवों पर आधारित है। इसमें 3.3 लाख परिवारों के 3 से 16 वर्ष उम्र समूह के छ: लाख बच्चों से संवाद किया गया। इस दौरान 'प्रथम' की टीम ने लगभग 14600 शासकीय विद्यालयों का अवलोकन भी किया।

ज्ञातव्य है कि माता-पिता का आकर्षण निजी विद्यालयों की ओर बढ़ा है। 6 से 14 वर्ष उम्र समूह के 96.5 प्रतिशत बच्चों ने विद्यालयों में प्रवेश लिया। निजी विद्यालयों में दाखिले में 10 प्रतिशत की वृध्दि दर्ज की गई। यही स्थिति रही तो वर्ष 2018 तक देश के आधो से अधिक बच्चे निजी विद्यालयों में दिखेंगे। जबकि 11 से 14 वर्ष उम्र समूह की 6 प्रतिशत लड़कियां विद्यालय नहीं जाती। विडम्बना यह भी है कि शासकीय विद्यालयों में बच्चे मध्यान्ह भोजन के आकर्षण के कारण उपस्थित रहते भी हों तो पोषण की दृष्टि से यह ठीक है। मगर पढ़ाई के नज़रिये से देखे तो सरकारी और निजी विद्यालयों में पढ़ने वाले पहली कक्षा के 57प्रतिशत से अधिक बच्चे अंग्रेजी का एक अक्षर भी पढ़ नहीं सकते। 50 प्रतिशत से अधिक बच्चों को किसी भी भाषा का ज्ञान नहीं है। वे न अक्षर पहचानते हैं, न ही शब्द। तीसरी कक्षा के भी 30प्रतिशत बच्चे ही पहली कक्षा की पुस्तकें पढ़ सकते हैं। पांचवी कक्षा के बच्चों का ये हाल है कि 53.2प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा की पुस्तक तक नहीं पढ़ पाते। सरकारी विद्यालयों में तो ऐसे 58.3 प्रतिशत बच्चे हैं। लगभग 46.5 प्रतिशत बच्चों को गणित में दो अंकों की संख्या को घटाना नहीं आता और लगभग 75.2 प्रतिशत बच्चों को भाग देना नहीं आता। मतलब यह कि शिक्षा में सुधार की सरकारी कवायद के बावजूद बच्चों के शैक्षणिक स्तर में निरंतर गिरावट आ रही है।

 यदि मध्यप्रदेश की बात करें तो यहां के हालात भी कम चिंताजनक नहीं। शासकीय विद्यालयों के 3 से 16 वर्ष आयु समूह के 51हज़ार बच्चों के सर्वेक्षण पर आधारित एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट 2012सचमुच विचारणीय है। उक्त सर्वेक्षण 43जिलों के 1250गांवों में अलग-अलग संगठनों द्वारा किया गया। पांचवी कक्षा के विद्यार्थियों की योग्यता परखने के लिए उनकी परीक्षा ली गई। तब पता चला कि 70प्रतिशत बच्चे साधारण जोड़ घटाव भी नहीं कर सके। 60 प्रतिशत बच्चे पहली की पुस्तक पढ़ने में असमर्थ पाए गए। सर्वेक्षण के अनुसार बच्चों की शैक्षणिक योग्यता में पिछले पांच सालों में लगातार कमी आयी है। वर्ष 2008 में ऐसे अक्षम बच्चों की संख्या मात्र 10 प्रतिशत थी। आश्चर्य की बात तो यह है कि सर्वेक्षण में राजधानी भोपाल के शासकीय विद्यालयों की स्थिति भी दयनीय पाई गई। कक्षा तीसरी से पांचवी के बीच 77 प्रतिशत बच्चे जोड़ घटाव नहीं कर पाए और 59 प्रतिशत बच्चे पुस्तक नहीं पढ़ सके। 2010 में 46.3 प्रतिशत बच्चे तथा वर्ष 2011 में 51.8 प्रतिशत बच्चे पुस्तक पठन और साधारण जोड़ घटाव में अक्षम पाए गए।
               
अशासकीय संस्था 'प्रथम' की उक्त शैक्षणिक रपट ने नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा कानून लागू होने के बाद विद्यालयों में अपनायी जा रही मूल्यांकन पध्दति पर प्रश्नचिन्ह लगा दिये हैं। क्या वर्षों से चली आ रही परंपरागत वार्षिक परीक्षा प्रणाली समाप्त कर उसके बदले अपनायी गई व्यापक मूल्यांकन पध्दति बच्चों के लिए हानिकारक सिध्द हो रही है ? यह बच्चों में पढ़ने-लिखने के प्रति लापरवाही पैदा कर रही है ? अनिवार्य शिक्षा अधिनियम के तहत किसी विद्यार्थी को अनुत्तीर्ण नहीं किया जा सकता। ऐसा माना गया कि हर बच्चे में भिन्न-भिन्न प्रकार की योग्यता होती है अत: केवल अक्षर ज्ञान या विद्या की पारम्परिक समझ के आधार पर उनका  मूल्यांकन करना उनके साथ न्याय नहीं है। यह उनके व्यक्तित्व के विकास में बाधक बनता है। अत: विभिन्न पहलुओं के आधार पर उनके मूल्यांकन की नवीन पध्दति अपनायी गयी। इस मूल्यांकन पध्दति के समर्थक मौजूदा  परिणामों और सर्वेक्षणों से चिंतित नहीं हैं। उनका तर्क है कि दो-तीन सालों के परिणामों से निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
              
 वस्तुत: व्यापक मूल्यांकन पध्दति वाली शिक्षा के लिए विद्यालयों का साधान संपन्न होना तथा शिक्षकों का भली भांति प्रशिक्षित होना नितांत आवश्यक है। तभी अपेक्षित परिणाम मिल सकते हैं। मगर संसाधनों का अभाव तो सरकारी विद्यालयों की नियति बन चुकी है। और शिक्षकों की गुणवत्ता या योग्यता के बारे में क्या कहा जाए, जब पात्रता परीक्षा में ही लाखों की संख्या में शिक्षक अनुत्तीर्ण हो रहे हैं। निजी विद्यालयों में तो बहुआयामी व्यक्तित्व के शिक्षक नियुक्त किये जाने को प्राथमिकता दी जाती है। मगर शासकीय विद्यालय तो साधनविहीन ही नहीं, शिक्षकविहीन भी हैं। हज़ारों विद्यालय एक ही शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। अब आठवीं कक्षा तक पास-फेल का सिरदर्द नहीं रहा, परीक्षा होनी ही नहीं है तो शिक्षकों की नियुक्ति किसलिए ? शायद यही सोचकर सरकारें धयान नहीं दे रही, जिसका ख़ामियाजा बच्चे भुगत रहे हैं।
             
  बेशक, अनिवार्य शिक्षा कानून के कारण विद्यालय जाने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है। परंतु गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव में उनकी उपलब्धि क्या होगी ? मेरे विचार से कक्षा पांचवी और आठवीं की मानक परीक्षा होना नितांत आवश्यक है। पारम्परिक परीक्षा पध्दति बच्चों को पढ़ाई से जोड़े रखती थी और लगनपूर्वक आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती थी। शिक्षकों को भी इसके लिए बहुत समय मिल जाता था और वे सचमुच बच्चों पर मेहनत करते थे। अब स्थितियां बदल गई हैं। औसत आमदनी वाले अभिभावक भी अपने बच्चों को सस्ते निजी विद्यालयों में पढ़ाते हैं, भले ही वह शासकीय विद्यालय से बदतर हो। गांवों में तो देखा गया कि कई बच्चों ने दोनों जगह दाखिले ले लिए है, निजी विद्यालय में पढ़ने के लिए और सरकारी विद्यालय में मध्यान्ह भोजन के लिए। निजी विद्यालयों को वित्तीय सहायता नहीं मिलती। फिर भी शासन के आदेशानुसार वे 25 प्रतिशत निर्धन बच्चों को प्रवेश भले दे दें मगर भोजन तो मुहैया नहीं ही करा सकते। अब इसके भी दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। निजी विद्यालयों में शिक्षा और महंगी होती जा रही है।
              
   बहरहाल, सरकारी विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने की चुनौती सरकार के सामने है। इसके लिए दृढ़तापूर्वक ठोस उपाय करने होंगे। संसाधानों की कमी तो दूर करनी ही होगी। पर योग्य शिक्षकों की नियुक्ति पर विशेष ध्यान देना होगा। शिक्षकों के प्रशिक्षण संस्थानों की दुकानदारी बंद करनी होगी। क्योंकि वे ही थोक के भाव में अयोग्य शिक्षकों की जमात पैदा कर रहे है, जिसका ख़ामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। सरकार को परीक्षा पध्दति और शिक्षा की तकनीक पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। वैश्विक प्रतिस्पर्धा के कारण बच्चों को उत्पाद की तरह तैयार करना बेमानी है। उन्हें अपनी धारती पर एक बेहतर इंसान और प्रबुध्द नागरिक की भांति तैयार करना समय की मांग है। चौदह वर्ष की उम्र तक बच्चों को देशी ज्ञान-विज्ञान, कलाओं, संस्कारों और पारंपरिक परीक्षा की स्वस्थ स्पर्धा से वंचित करके प्राथमिक शिक्षा की बुनियाद मज़बूत नहीं की जा सकती। यदि प्रयोग के नाम पर बच्चों की शिक्षा के साथ खिलवाड़ होता जा रहा तो बच्चे कभी विकास के उस सोपान तक नहीं पहुंच पाएंगे, जहां विश्व की अगुआई का स्वप्न देखने वाले राष्ट्र के नौनिहालों के लिए पहुंचना आवश्यक है।


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