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Wednesday, February 22, 2012

अनसुनी आवाजो का आर्तनाद.......


प्रशांत कुमार दुबे


नन्हीं बाई का पोता इसलिये सूख रहा है कि उन्होंने दूल्हादेव को कबूली हुई भेंट नहीं चढ़ा पाई हैं वे बसानन मामा के मंदिर पर कथा भी नहीं करा पाई है। बच्चे का गंभीर रुप से कुपोषित होना शायद इसी का प्रकोप है। यह अलग बात है कि इस गांव में आंगनवाड़ी आठ साल से नहीं खुली है । स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी दस्युओं के डर से कभी उस गांव में नहीं गये हैं । जॉब कार्ड कोरे पड़े हैं। इस गांव में पिछलं एक माह में तीन बच्चों की कुपोषण के कारण मौत हो गई है। स्वास्थ्य विभाग इस नन्हींबाई जैसे लोगों को अंधविश्वास से जकड़ा बताता है लेकिन बहुत आसानी से इन आदिवासियों को अंधविश्वास की गिरफ़्त में जकड़ा बताने वाला भला प्रशासन यह तो बताये कि आखिर आजादी के 60 वर्षों में इस प्रशासन ने उन्हें कब विश्वास दिया कि उनके बच्चों या उन्हें वह बचा पायेगा ? ये अनुसनी आवाजें अपना आर्तनाद तो करती हैं लेकिन इनकी आवाज सुनेगा कौन ? कईबारगी लगता है कि शायद आजादी के 65 वर्ष बाद भी ये आवाजें अभी तक अनसुनी ही रह गई हैं।

नन्हीं बाई ने अपने पोते-पोतियों की जीवन की सलामती के लिये बसानन मामा के मंदिर पर कथा कराना कबूला है और वे उसके लिये पाई-पाई इकट्ठा कर रही हैं। यही नहीं, नन्हीं बाई ने अपने कुल देवता (दूल्हादेव) के लिये भी मुर्गा और बकरा कबूला है, लेकिन वह कहती हैं लाखों प्रयासों के बाद भी अभी तक तो इतना पैसा नहीं जोड़ पाई है कि यह भेंट दूल्हादेव को चढ़ा सकें।
नन्हीं बाई अपने बेटे रामप्रकाष के साथ इस समय जंगल से कहवा (कौवा) नाम के वृक्ष की छाल इकट्ठा कर रही है। वह अलसुबह जाती है और दोपहर बाद वापस लौटती है। वह और रामप्रकाष दोनों 10 दिनों तक इकट्ठा करने के बाद लगभग 3 क्विंटल छाल इकट्ठा कर पाये हैं जो कि 1 रूपये प्रतिकिलो के अनुसार 300 रूपये में बिकेगी। 10 दिन की दो जनों की पूरी मेहनत का नतीजा है 300 रूपया। यानि 15 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन। कहवा नाम के इस वृक्ष से उच्च रक्तचाप की अचूक आयुर्वेदिक दवा अर्जुनारिष्ट बनाई जाती है। सतना से आने वाला ठेकेदार इस छाल को इनके गांव लेने आता है और फिर इसे 50-60 रूपये प्रतिकिलो पर बेच देता है। दरअसल मैं यह आलेख कहवा के अर्थषास्त्र को बताने के लिये नहीं लिख रहा हँ बल्कि इसका प्रयोजन दूसरा है। नन्हीं बाई ने अपने पोते-पोतियों की जीवन की सलामती के लिये बसानन मामा के मंदिर पर कथा कराना कबूला है और वे उसके लिये पाई-पाई इकट्ठा कर रही हैं। नन्हीं कहती है कि इस पर लगभग 1200 रूपये का खर्च आयेगा और उसके लिये अभी तो बहुत पैसा जोड़ना बाकी है।
यही नहीं, नन्हीं बाई ने अपने कुल देवता (दूल्हादेव) के लिये भी मुर्गा और बकरा कबूला है, लेकिन वह कहती हैं लाखों प्रयासों के बाद भी अभी तक तो इतना पैसा नहीं जोड़ पाई है कि यह भेंट दूल्हादेव को चढ़ा सकें। वे कहती हैं कि इसका नुकसान भी अब होने लगा है, बच्चा रोने लगा है, चिड़चिड़ाता है और सूखता जा रहा है। बहू बिटोल भी बीच में बोल पड़ती है कि अब तो उन्हें (नन्हीं बाई को) सर्प भी स्वप्न में दिखने लगे हैं और इसके कारण अब वह रातों को सो भी नहीं पाती है। वे कहती हैं कि लड़के के होने पर कबूलना पड़ते हैं और लड़की के होने पर नहीं। बड़ी मुष्किलों से तो यह बच पाया है।
उन्होंने अपने पुत्र लवकुष को टोटके के चलते बेचने की कुप्रथा भी अपना ली । उनका पोता, खरीदा गया पोता है। और इसलिये उसका नाम मोला है, यानी मोलख्1, लिया गया बच्चा।
दरअसल में यहीं से कहानी शुरू होती है। नन्हीं बाई की दो पोतियाँ क्रमषः ढाई वर्ष और डेढ़ वर्ष की उम्र में ही परलोक सिधार गई थीं। कारण वे बता न सकीं परन्तु कहा कि बहुत कमजोर हो गई थी। सूख के लकड़ी की तरह। ठीक-ठीक तो नहीं पता पर शायद कुपोषण रहा होगा। उसके बाद फिर एक बालिका हुई और फिर हुआ लवकुष। यह बालिका प्रियांषी भी मरते-मरते बचीं। नन्हीं ने इसलिये लवकुष को बचाने के लिये मानता (कबूलना) रख ली।
बात केवल दूल्हादेव और बसानन मामा तक ही सीमित नहीं है बल्कि उन्होंने अपने पुत्र लवकुष को टोटके के चलते बेचने की कुप्रथा भी अपना ली । उनका पोता, खरीदा गया पोता है। और इसलिये उसका नाम मोला है, यानी मोलख्2, लिया गया बच्चा। यह कहानी किसी फिल्मी कहानी सी लगती है, लेकिन यह सच्चाई है रीवा जिले के सिमरिया तहसील की ककरेड़ी पंचायत की। 150 परिवारों की इस बस्ती में या तो आदिवासी हैं या फिर सवर्ण। गोंड, कोल व खैरवार हैं आदिवासी और ब्राह्मण, यादव और ठाकुर हैं सवर्ण। नन्हीं बाई खैरवारख्, है। उनके पास ना तो चालू राषन कार्ड है और है तो वह भी पुराना और उज्जर (सफेद) कार्ड है। जॉब कार्ड बना है पर वह कोरा पड़ा है, उन्हें काम नहीं मिला है।
ऐसी स्थिति में वे गुजर-बसर के लिये ठाकुर की जमीन के एक हिस्से पर अधियाख्4, खेती कर रही हैं। वह घास-फूस की एक झोपड़ी में अपने पति/बेटा/बहू और दो पोता-पोतियों के साथ रहती हैं । नन्हीं बाई जब खाना खा रही थीं तो उनके खाने में चावल था पर दाल नहीं थी, पूछने पर उन्होंने बताया कि कई हफ्तों से दाल नहीं खाई । दाल अब उनके परिवार के लिये एक दिवास्वप्न है।
आज नन्हीं बाई के दोनों पोते-पोती गंभीर स्तर के कुपोषित हैं और जिसे वे दूल्हादेव की रूष्टता मान रही हैं । वह दरअसल कुपोषण है जिसके चलते लवकुष सूख रहा है और रोता है, चिड़चिड़ाता है। इस गांव में पिछले आठ साल से आंगनवाड़ी नहीं खुली है, कार्यकर्ता पास के गांव की है। अभी हाल ही में इस गांव में हुई बच्चों की मौत के बाद वे आकर पहली बार पोषणाहार का पैकट बांटकर गई हैं। लवकुष को और उनकी मां बिटोल को कोई भी टीके नहीं लगे हैं क्योंकि यहाँ पर स्वास्थ्य विभाग का कोई भी कर्मचारी नहीं आता है क्योंकि स्वास्थ्य विभाग के अनुसार यह डकैतों का क्षेत्र है। इसलिए इस गांव को उन्होंने भगवान भरोसे छोड़ दिया है।
जैसे कि स्वास्थ्य विभाग का रटा रटाया जुमला है कि इतने बच्चे करेंगे तो वे तो मरेंगे ही !!! लेकिन यही प्रशासन यह विश्लेषण क्यों नहीं करता कि आखिर यह समुदाय इतने बच्चे पैदा क्यूं करता है ? बहुत आसानी से इन आदिवासियों को अंधविश्वास की गिरफ़्त में जकड़ा बताने वाला भला प्रशासन यह तो बताये कि आखिर आजादी के 60 वर्षों में इस प्रशासन ने उन्हें कब विश्वास दिया कि उनके बच्चों या उन्हें वह बचा पायेगा ?

यहां पर अधिकांष प्रसव आज भी घरों में ही होते हैं। क्योंकि यहाँ पर आवागमन का कोई साधन नहीं है। जो साधन है तो वह है दूध गाड़ी। सांची दुग्ध संघ द्वारा दूध इकट्ठा करने वाली गाड़ी ही यहाँ पर जननियों से लेकर बच्चों तक की एंबुलैंस है। सबसे पास का अस्पताल अब 12 किलोमीटर दूर गांव रगौली है, दो दिन पहले ही उपस्वास्थ्य केन्द्र का उद्घाटन हुआ है। वहा भी डॉक्टर पदस्थ नहीं है। इससे पहले तो सिमरिया 21 कि.मी. या सिरमौर 30 किमी. ही जाना होता था या यूं कहें कि अब भी वहीं जाना होगा।

इस गांव में पिछले एक माह में तीन बच्चों की मौत कुपोषण के कारण हुई है। बच्चों की मौत के बाद अलसाये प्रषासन ने जैसे ही हड़बड़ाकर इन गांवों की ओर रूख करना शुरू किया तो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के पति और मध्यान्ह भोजन संचालित करने वाले स्व-सहायता समूह ने इन आदिवासियों के घरों में बंदूक के साथ दस्तक दी और कहा कि यदि किसी के खिलाफ कुछ कहा तो सभी को मार दिया जायेगा। प्रषासन की उपेक्षा और दबंगों का आतंक ही है जिसके चलते नन्हीं बाई जैसे लोगों को दूल्हादेव और बसानन मामा की शरण लेना पड़ती है और जिसके चलते वे गरीबी के ऐसे दुष्चक्र में फंस जाते हैं वहंा से निकलना उनके लिये असंभव हो जाता है। नन्हीं बाई और उनका परिवार अब कर्ज लेने की बात भी सोच रहा है ताकि किसी भी सूरत में लवकुष और प्रियांषी को बचाया जा सके।
राज्य जिस तरह से अपनी जिम्मदारियों से कन्नी काटता है और जिसके चलते जनसामान्य दुष्चक्र में फसता है उसका यह अत्यंत क्रूर उदाहरण है। दरअसल जब तंत्र अपने मूल स्वभाव या यूं कहें कि अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने लगता है तो वह कई जगह तो प्रत्यक्ष रुप में (बच्चों की मौतों के रुप में) सामने आता है । इसके अप्रत्यक्ष प्रभाव हम नन्हीबाई की कहानियों से समझ सकते हैं। यहां पर राज्य की भूमिका संदेह में आती है। यहीं से प्रशासन अपने मतलब की कहानियां गढ़ना शुरु करता है । जैसे कि स्वास्थ्य विभाग का रटा रटाया जुमला है कि इतने बच्चे करेंगे तो वे तो मरेंगे ही !!! लेकिन यही प्रशासन यह विश्लेषण क्यों नहीं करता कि आखिर यह समुदाय इतने बच्चे पैदा क्यूं करता है ? या अपने ही बच्चों को खरीदने और बेचने जैसा जघन्य कृत्य वह कैसे करता है ? बहुत आसानी से इन आदिवासियों को अंधविश्वास की गिरफ़्त में जकड़ा बताने वाला भला प्रशासन यह तो बताये कि आखिर आजादी के 60 वर्षाें में इस प्रशासन ने उन्हें कब विश्वास दिया कि उनके बच्चों या उन्हें वह बचा पायेगा ?
इसी गांव की एक और गंभीर कुपोषित बालिका जानम पिता हरिलाल को उनकी मां ने सिरमौर के पोषण पुनर्वास केन्द्र में भर्ती किया । वह 14 दिन वहां रहने के बाद अभी भी गंभीर रुप से कुपोषित ही है । उनकीं मां शीला उसे वहां फिर से ले जाने को तैयार नहीं है, वह कहती है कि जब वहां से मेरी बच्ची को कोई गोली-दवा नहीं मिलती है, तो वहां क्यों जायें । इतने दिन मजूरी (मजदूरी) और टूटती है और दूसरे बच्चों का ख्याल नहीं रख पाती हूं सो अलग । जानम, लवकुश और प्रियांशी की तरह इस गांव के लगभग 10 बच्चे गंभीर रुप से कुपोषित हैं, लेकिन सभी अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं । लेकिन अफसोस कि इस गांव में स्वास्थ्य विभाग का अमला स्वास्थ्य शिविर तो कर जाता है पर उनकी नजर इन बच्चों पर नहीं जाती है । दरअसल स्वास्थ्य शिविर सरपंच साहब के आंगन में किया गया था। अब जिसकी पहंुच है तो वह पहुच जाये और जिसकी नही तो वह ..........

यह प्रषासन की लापरवाही का नतीजा है कि रीवा में पिछले 60 माह में 21 हजार शिशुओ की मौत हुई है । वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2010-11) के हवाले से देखें तो हम पायेगे कि रीवा जिले की शिशु मृत्यु दर 73 प्रति हजार है और इसकी रैंक प्रदेष में 9वीं है, जबकि प्रदेष की शिशु म्रत्यु दर 67 है । वर्ष 2011 की जनगणना के प्रोविजनल आंकड़ें बताते हैं कि रीवा जिला उन 10 जिलों में शामिल हो गया है जिनमें बाल लिंगानुपात आष्चर्यजनक रुप से 900 के नीचे आ गया है । मध्यप्रदेश के हाल भी कमोबेश ऐसे ही हैं।

स्वास्थ्य विभाग का महकमा सरपंच साहब के घर पर बैठकर रबड़ी खाते हुये यह फौरी विश्लेषण कर देता है कि कौन कहता है इस गांव में गरीबी है !! यह तो संपन्नों का गांव है। प्रशासन का पूरा सूचना तंत्र और उसी के बनिस्बत उसकी तैयारी इसी संवेदनहीन और गैरजिम्मेदार व्यवस्था पर टिकी है ।

इंटरनेषनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ पापुलेषन साईंसेज ने देश के 593 जिलों में चुनिंदा स्वास्थ्य संकंेतांको को लेकर एक सर्वेक्षण किया, इस सर्वेक्षण का पैमाना अच्छे से खराब की ओर रहा । इस सर्वेक्षण में रीवा जिले की स्थिति और भी खराब रही । 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु के मामले में रीवा जिला 529 वें स्थान पर है । इसी प्रकार यहाँ पर प्रसव के दौरान उत्पन्न जटिलताओं के कारण रीवा में पिछले पाँच वर्षों में 1000 महिलाओं ने दम तोड़ा हैं । इन खराब स्वास्थ्य संकेतांकों के बाद भी प्रदेष सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी है और बच्चों की मौतों का सिलसिला लगातार जारी है।
इसे विडंबना ही कहा जाये कि जिस गांव में कुपोषण के कारण एक माह में तीन बच्चों की मौत हो जाती है, उसी गावं से प्रतिदिन सवा कुइंटेल दूध बिकता है । यह दूध इस गांव के सवर्णों द्वारा बेचा जाता है । आदिवासियों को तो दूध देखने को भी नसीब नहीं है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग का महकमा, सरपंच के घर पर बैठकर रबड़ी खाते हुये यह फौरी विश्लेषण कर देता है कि कौन कहता है इस गांव में गरीबी है !! यह तो संपन्नों का गांव है। प्रशासन का पूरा सूचना तंत्र और उसी के बनिस्बत उसकी तैयारी इसी संवेदनहीन और गैरजिम्मेदार व्यवस्था पर टिकी है ।
जब भी बच्चों की मौत होती है या फिर कोई दूसरी समस्या आती है तो फिर सरकार के संबंधित विभाग आपस में छीछालेदारी कर अपनी जवाबदेहिता से बचने का प्रयास करते हैं, लेकिन इस पूरी कवायद में नन्हीं बाई जैसे लोगों को मजबूरन देवी देवताओं की शरण लेनी पड़ती है और मजबूरन ही अपने बच्चों को अपने सामने मरते देखना होता है। सवाल आज यह भी है कि इस बात की जिम्मदारी कौन लेगा कि नन्हींबाई का सूखा पोता, जिसे वह अभी तक दूल्हादेव को मुर्गा ना चढ़ा पाने का प्रकोप मान रही है, उसको बचा पायें ? ये अनुसनी आवाजें अपना आर्तनाद तो करती हैं लेकिन इनकी आवाज सुनेगा कौन ? कईबारगी लगता है कि शायद आजादी के 65 वर्ष बाद भी ये आवाजें अभी तक अनसुनी ही रह गई हैं।

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