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भ्रष्टाचार नौनिहालों का निवाला तक खा रहा है


नीलेश द्विवेदी

अभी पिछले महीने की ही बात है. मध्य प्रदेश के विदिशा जिले से निकली एक खबर ने राज्य से केन्द्र तक मौजूद सरकारी तंत्र पर तमाचे सरीखी चोट की. इस जिले का एक गांव है, भिलाय. यहां रहने वाले दयाराम के सालभर के बेटे सुरेश की तबीयत उस रोज ज्यादा बिगड़ गई थी. आनन-फानन में उसे विदिशा के जिला अस्पताल लाया गया. मेडिकल स्टाफ ने यहां इलाज से पहले उसके खून का नमूना लेने की कोशिश. मगर उसकी रगों से खून का एक क़तरा भी न निकला. उसी रात उसकी मौत हो गई. वह कुपोषण का शिकार था. अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ एके गोयल ने खुद माना कि बच्चे के शरीर में खून और पानी की बेहद कमी थी. इस उम्र के बच्चे का वजन 10 किलो होना चाहिए था, लेकिन उसका सिर्फ 3.9 किलो ही था.
लेकिन यह कहानी सिर्फ इकलौते सुरेश की नहीं है. खबरों के मुताबिक, विदिशा जिले में ही करीब एक महीने में 45 से ज्यादा बच्चों की कुपोषण से मौत हो चुकी है. प्रदेश का श्योपुर जिला कुपोषण को लेकर अक्सर सुर्खियों में रहता है. इसी जिले से ताल्लुक रखने वाले कांग्रेस के विधायक हैं, रामनिवास रावत. उनके मुताबिक जिले में अप्रैल से अगस्त के बीच करीब 116 बच्चे कुपोषण के कारण जान से हाथ धो बैठे हैं. श्योपुर के अलावा झाबुआ, अलीराजपुर, खंडवा, गुना, रीवा, शिवपुरी आदि जिलों से भी कुपोषण की वजह से बच्चों की मौतों की खबरें आती रहती हैं. यहां तक कि राजधानी भोपाल के ग्रामीण इलाके भी कुपोषण से होने वाली मौतों की मार से अछूते नहीं हैं.
इस सिलसिले में रावत ने जुलाई के दौरान विधानसभा में सरकार से जवाब तलब किया था. तब लोक-स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री रुस्तम सिंह से जानकारी मिली कि ‘प्रदेश में जनवरी से मई 2016 के बीच छह साल तक के करीब 9,167 बच्चों की मौत कुपोषण से हुई है. जबकि नीमच में जिले में सबसे ज्यादा 22 फीसदी बच्चे कुपोषित पाए गए.’ ऐसे ही एक अन्य जवाब में सरकार ने माना कि प्रदेश के 51 जिलों में कराए गए सर्वे में करीब 13.31 लाख बच्चे कुपोषित मिले हैं.
मध्य प्रदेश के पड़ोसी राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र भी इस मामले में पीछे नहीं हैं
इसी साल फरवरी की बात है. टाइम्स ऑफ इंडिया ने खबर दी थी कि राजस्थान के करीब 13 जिलों में बच्चों में कुपोषण की स्थिति गंभीर है. बीते दो महीने में हद दर्जे के कुपोषण के कारण इन जिलों के 25 बच्चों की तो मौत भी हो चुकी है. इनमें 19 बच्चियां थीं. ऐसे ही 14 जून को जारी हुई ‘विश्व पौष्टिकता रिपोर्ट-2016’ के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस ने बताया कि गुजरात में करीब 1.45 लाख बच्चे कुपोषित हैं. और अभी चार अक्टूबर की ही बात है. मीडिया में आई इन खबरों पर कि महाराष्ट्र में कुछेक महीनों में करीब 500-600 आदिवासी बच्चों की मौत हुई है, सुप्रीम कोर्ट राज्य सरकार को डांट लगाई थी.
कोर्ट ने तल्ख अंदाज में सवाल पूछा, ‘आपको क्या लगता है, हम यहां मजे लेने के लिए बैठे हैं? क्या आप यह मानते हैं कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में कुछ बच्चों के मर जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता?’ लेकिन सच मानिए, फर्क शायद नहीं ही पड़ता होगा. क्योंकि विश्व पौष्टिकता रिपोर्ट के ही मुताबिक, ‘कुपोषण के कारण पांच साल से कम उम्र के बच्चों का विकास रुकने के मामले में भारत 132 देशों में 114 नंबर पर खड़ा है. जबकि एशिया के 39 देशों में 34वें (कुपोषित बच्चों की लंबाई के मामले में) और 35वें (कुपोषित बच्चों के वजन के लिहाज से) पायदान पर. यानी एशिया के सिर्फ चार-पांच देशों की हालत ही भारत से खराब है.
कुपोषण इसलिए क्योंकि पोषण तो भ्रष्टाचारियों का हो रहा है
इसी अगस्त में दैनिक भास्कर ने मध्य प्रदेश में पोषाहार वितरण व्यवस्था में चल रही बड़ी घपलेबाजी को उजागर किया था. इसके मुताबिक, राज्य में कई साल से सिर्फ तीन निजी कम्पनियों का ही ‘पोषण’ हो रहा है. ये हैं- एमपी एग्रो न्यूट्री फूड, एमपी एग्रो फूड इंडस्ट्रीज और एमपी एग्रोटॉनिक्स. सरकारी कम्पनी एमपी स्टेट एग्रो ने इन तीनों के साथ करार किया हुआ है, राज्य में पोषण आहार की आपूर्ति के लिए. लेकिन यह ‘आपूर्ति’ वास्तव में हुई किस तरह? एमपी स्टेट एग्रो साल-दर-साल अपना उत्पादन घटाती गई जबकि बाकी तीनों निजी कम्पनियों का उत्पादन बढ़ता गया.
खबरों के मुताबिक, 2007 में प्रदेश में पोषण आहार का बजट करीब 160 करोड़ रुपए था जो अब करीब 1,200 करोड़ रुपए हो चुका है. लेकिन इस बजट का अधिकांश हिस्सा ‘बंदरबांट’ में ही खर्च हो जाता है. इस बंदरबांट के लिए आंकड़ों की हेराफेरी कैसे की जाती है, इसकी मिसाल हैं प्रदेश के महिला एवं बाल विकास विभाग के हास्यास्पद आंकड़े. इनके मुताबिक राज्य में 2015-16 में 1.05 करोड़ बच्चों को पोषण आहार बांटा गया है. यानी इस हिसाब से राज्य के हर सातवें व्यक्ति को पोषाहार मिला है. क्योंकि प्रदेश की आबादी ही इस वक्त सात करोड़ के लगभग है.
कुछ और इस आंकड़े इस गड़बड़झाले की गंभीरता को उजागर करते हैं. मसलन, पिछले 12 साल में करीब 7,800 करोड़ रुपये का पोषण आहार राज्य में बांट दिया गया. लेकिन जैसा कि नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्टें (2006-07, 2008-10 और 2012-13) बताती हैं, राज्य के 32 फीसदी से ज्यादा बच्चों तक पोषाहार पहुंचता ही नहीं है. शायद इसीलिए बच्चों में कुपोषण और उससे हो रही मौतों के मामले में बिहार के बाद मध्य प्रदेश का नंबर देश में दूसरा है. फिलहाल मध्य प्रदेश सरकार ने इस मामले की जांच के लिए एक समिति बना दी है. सबसे ताज्जुब की बात है इस समिति के सामने एमपी एग्रो के जीएम रविंद्र चतुर्वेदी ने वर्तमान व्यवस्था को ही सबसे बेहतर बताया था. अब अगर सरकार इस रवैए पर चलेगी तो जाहिर है कि इस समिति से पोषण आहार की व्यवस्था में कोई विशेष सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती.
ऐसे ही, राजस्थान में ‘राजस्थान पत्रिका’ ने इस साल मार्च में करीब 85 लाख रुपए के पोषण आहार घोटाले को उजागर किया था. इसमें तुरंत ही आठ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज भी हुआ, लेकिन इसके बाद छोटे-मोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई के साथ ही मामला रफा-दफा कर दिया गया. यही हाल महाराष्ट्र का है. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी(एनसीपी) के प्रवक्ता नवाब मलिक ने जुलाई में राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री पंकजा मुंडे पर 12,000 करोड़ रुपए के पोषण आहार घोटाले का आरोप लगाया. उनके मुताबिक, राज्य की करीब 10,000 आंगनबाड़ियों में पोषण आहार की आपूर्ति के लिए फरवरी में पक्षपातपूर्ण तरीके से अपने अपनों को ठेके दिए गए.
यह सिर्फ आरोप ही होते तो दूसरी बात थी. लेकिन जब जुलाई में ही बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने इन ठेकों के आवंटन में हुई अनियमिताओं को स्वीकार करते हुए इन्हें रद्द कर दिया, तो इन आरोपों की गंभीरता का भी अहसास हुआ. हालांकि पंकजा को ऐसा कोई अहसास हुआ होगा, ऐसा नहीं लगता. उन्होंने भगवानगढ़ में हुए दशहरा समारोह के दौरान जो बयान दिया, उससे तो यही लगता है. पंकजा ने अपने समर्थकों के बीच कहा, ‘मैं हमेशा अपना इस्तीफा साथ लेकर घूमती हूं. जिस समय मुझे लगेगा कि मैंने कुछ गलत किया है, मैं सरकार में नहीं रहूंगी.‘
गुजरात में इसी तरह का घोटाला उस वक्त ही सामने आ चुका है, जब नरेन्द्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. नियंत्रक महालेखा परीक्षक ने इसे उजागर किया था. खबरोंके मुताबिक, आंगनबाड़ियों में बांटे जाने वाले पोषण आहार की आपूर्ति के लिए ठेके देने में नियमों को ताक पर रख दिया गया. इसकी वजह से एक कम्पनी को तीन इलाकों का ठेका मिला, जबकि दूसरी को सिर्फ दो क्षेत्रों का ही. सरकारी खजाने को इस घपले से 92 करोड़ रुपए की चपत लगी वह अलग.
आखिर इन चार राज्यों का ही जिक्र क्यों?
एक सवाल हो सकता है कि पोषण आहार घोटाले या कुपोषण से होने वाली मौतों जिक्र करते हुए इन चार राज्यों का ही संदर्भ क्यों लिया गया. तो इसकी वजहें, जिनके आपस में अंतरसंबंध हैं. पहला- मध्य प्रदेश ऐसा राज्य है, जो पिछले चार साल से लगातार केन्द्र सरकार की ओर से दिया जाने वाला ‘कृषि कर्मण पुरस्कार’ जीत रहा है. यह पुरस्कार सबसे ज्यादा कृषि उत्पादन करने वाले राज्य को दिया जाता है. इसीलिए यह विरोधाभास किसी को भी चुभ सकता है कि ‘अन्न और अन्नदाता’ के राज्य में मासूम बच्चे भूख से सूख-सूख कर दम तोड़ रहे हैं.
राजे-रजवाड़ों की धरती राजस्थान क्षेत्रफल के लिहाज से देश का सबसे बड़ा राज्य है. हर साल सबसे ज्यादा विदेशी सैलानियों को अपनी तरफ खींचने वाला यह देश का छठवां (2015 में आए पर्यटकों के हिसाब से) राज्य है. महाराष्ट्र देश का सबसे अधिक औद्योगीकृत राज्य है. जबकि गुजरात के बहुप्रचारित ‘विकास मॉडल’ के दम पर ही नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे हैं. इसके अलावा, ये चारों राज्य भाजपा शासित हैं. इनमें भी गुजरात मोदी का गृह राज्य है. महाराष्ट्र में भाजपा उनके नाम पर ही सत्ता में आई है. जबकि मध्य प्रदेश-राजस्थान के मुख्यमंत्रियों (शिवराज सिंह चौहान-वसुंधरा राजे) को एक समय कद के लिहाज से किसी भी तरह मोदी से कम नहीं समझा जाता था और आज वे उनका अनुसरण करते हुए ही लग रहे हैं.
इसलिए कुपोषण का सवाल सीधे मोदी की तरफ
चूंकि मामला किसी एक राज्य का नहीं बल्कि राज्यों का है. उन नौनिहालों की जिंदगी से जुड़ा है जो देश का भविष्य कहे और समझे जाते हैं. जिनकी तरफ प्रधानमंत्री मोदी अक्सर ही अपने कार्यक्रमों के दौरान खिंचे चले जाते हैं. उन बच्चों के पोषण के लिए सुरक्षित किए गए जनता के उस पैसे में भ्रष्टाचार का है, प्रधानमंत्री खुद जिसकी चौकीदारी करने का दम भरते हैं. और भ्रष्टाचार भी कहां? उन राज्यों में, जहां उस पार्टी का शासन है, जिसके शीर्ष नेता खुद नरेन्द्र मोदी हैं. और फिर आशंका यह भी है कि अगर राष्ट्रीय स्तर की किसी एजेंसी से जांच कराई जाए तो देश के अन्य राज्यों में भी पोषण आहार के घपले-घोटाले पकड़ में आ सकते हैं. कुपोषण की भयावह वजहें सामने आ सकती हैं. या ओडिशा-छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की कामयाबी का सच भी. इसीलिए इस मामले में सवाल सीधे प्रधानमंत्री मोदी से किया जा रहा है.
मध्य प्रदेश में पोषण आहार घोटाले का भंडाफोड़ होने के बाद अगस्त में ही दिल्ली में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने मीडिया से बातचीत में प्रधानमंत्री की तरफ सवाल दागा था. उन्होंने कहा था, ‘प्रधानमंत्री जी कहते हैं कि मैं न खाऊंगा, न खाने दूंगा. सरकारी खजाने के चौकीदार की तरह काम करूंगा. तो क्या अब वे इस मामले की जांच कराएंगे?’ लेकिन इस सवाल का जवाब अब तक मिला नहीं है!
satyagrah से साभार 

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