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Tuesday, September 3, 2013

बाल अधिकार व न्याय में संतुलन जरूरी

टोनी जोसेफ  



नई दिल्ली में 23 वर्षीय छात्रा के साथ दुष्कर्म और नृशंस हत्या करने वाले पांच अपराधियोंमें से एक बाल सुधारगृह में दो साल से थोड़ा ज्यादा वक्त गुजार कर मुक्त हो जाएगा। इसके तीन कारण हैं। एक तो यह कि अपराध के समय उसकी आयु 18 साल से छह माह कम थी। इसलिए उस पर किशोर न्यायालय बोर्ड में ही मुकदमा चलाया जा सकता था। दूसरी बात यह कि कोई भारतीय किशोर न्यायालय बोर्ड तीन साल तक सुधार गृह में रखने की ही अधिकतम सजा सुना सकता था और तीसरा यह कि यह नाबालिग अपराधी हिरासत में आठ माह पहले ही पूरे कर चुका है।

निचोड़ यही है कि इस हत्यारे को मौजूदा भारतीय कानून के तहत वाकई अधिकतम सजा दी गई है। पर क्या कानून के तहत न्याय हुआ है? ज्यादातर लोगों के लिए इस कानून के तहत हुआ गहरा अन्याय एक सदमे की तरह है। हालांकि नाबालिगों के अधिकारों से जुड़े कार्यकर्ता मानते हैं कि कानून के तहत न्याय हुआ है, क्योंकि 18 साल से कम आयु के अपराधियों के साथ वयस्कों से भिन्न व्यवहार जायज है। अब 18 साल से कम आयु के नाबालिग अपराधियों को दंडितकरने की बजाय सुधारनाक्यों चाहिए इसके पीछे उनकी दलील के तीन हिस्से हैं।

एक तो यही कि 18 साल से कम आयु के किशोर, मस्तिष्क में विकासात्मक अंतर के कारण वयस्कों से अलग होते हैं। इसी कारण अपनी हरकतों के लिए वे उतने जिम्मेदार नहीं होते।

दूसरा तर्क यह है कि कम आयु होने के कारण उनमें बदलने की संभावना अधिक होती है और
इसलिए उचित उपचार किया जाए तो अपराधी भी कानून का पालन करने वाले उत्पादक नागरिक में बदल सकते हैं।
तीसरा तर्क यह है कि इन बालकों को जेल में कट्टर अपराधियों के साथ रखा गया तो उनका हमेशा के लिए अपराधी बनना तय है। यहां तक कि हाल में दिए गए फैसले से उद्वेलित लोगों को भी यह तो मानना पड़ेगा कि इन दलीलों में कुछ सच्चाई तो है, क्योंकि पांच साल के नाबालिग में उतनी सामाजिक जागरूकता या जिम्मेदारी की भावना नहीं होती, जितनी दस साल के नाबालिग में होती है। इसी तरह दस साल के नाबालिग और 15 साल के नाबालिग में भी यही फर्क होगा। अब सवाल यह उठता है कि बाल अधिकार कार्यकर्ताओं की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए न्याय कैसे सुनिश्चित किया जाए?

अब तक ज्यादातर बहस इसी बात पर केंद्रित रही है कि नाबालिग अपराधी के लिए आयु सीमा घटाकर 15 या 16 वर्ष कर दी जाए। पर यह कोई समाधान नहीं है। इसका अर्थ तो समस्या को तब तक के लिए टाल देना होगा जब तक कि 15 साल का कोई नाबालिग भयानक अपराध नहीं कर देता। इसके बाद बाल अपराधी की आयु सीमा और घटाने की मांग शुरू हो जाएगी। तो क्या कोई दूसरा रास्ता भी है?

यदि दुनिया भर में नाबालिगों से जुड़े आपराधिक कानूनों का जायजा लें तो पता चलेगा कि अन्य देशों ने हमसे कहीं बेहतर समाधान खोज निकाले हैं। तथ्य तो यह है कि नाबालिग अपराधियों के लिए हमारा कानून सबसे निष्प्रभावी और दकियानूसी है, क्योंकि उम्र यह तय करने का एकमात्र मानदंड है कि किसे सजादेनी है और किसे सुधारनाहै।

बाकी दुनिया यह सुनिश्चित करने के लिए कि न्याय देते समय बाल अधिकारों का भी ख्याल रखा जा सके, तीन तरीके इस्तेमाल करती है। पहला तरीका सामान्य अपराध और जघन्य अपराध में फर्क करने का है। कई देशों में नाबालिग अपराधी पर सामान्य अदालत में ही मुकदमा चलाया जाता है यदि वह जघन्य अपराधी है। ऐसा करने के कारण भी हैं। नाबालिगों के अधिकारों की वकालत करने वाले कहते हैं कि 18 वर्ष से कम आयु के नाबालिग अपनी हरकतों के नतीजों से पूरी तरह वाकिफ नहीं होते और इसलिए वे अपनी करनी के लिए कम जिम्मेदार होते हैं। बाल अधिकारवादियों की यह दलील तब जायज होती है जब कोई नाबालिग मादक पदार्थों का सेवन करता पाया जाए या अंधाधुंध वाहन चलाता पकड़ा जाए। पर बात जब व्यक्तिगत फायदे या मौज-मस्ती के लिए हत्या और दुष्कर्म जैसी पूर्व नियोजित, हिंसक और विकृत अपराध की हो तो यह दलील मूर्खतापूर्ण और अधकचरी जानकारी पर आधारित लगती है।

17 वर्षीय नाबालिग की तो बात ही क्या 5 साल का बच्चा भी जानता है कि किसी निरपराध को शारीरिक पीड़ा पहुंचाना या उसके साथ खून-खराबा करना कितना घिनौना और भयानक गुनाह है। दूसरा तरीका है आयु-सीढ़ी का उपयोग। यानी आयु कम होने के साथ सजा के प्रावधान भी क्रमश: लचीले होते चले जाते हैं। पर आयु की ऐसी कोई एक सीमा नहीं होती कि जो अचानक अपराधी को सुधारके प्रावधानों से निकालकर सजाके दायरे में ले जाए। नाबालिगों के लिए बनाए गए भारतीय कानून में भी ऐसी आयु-सीढ़ी है। सात साल से कम आयु के नाबालिग किसी भी स्थिति में अपराधी नहीं ठहराए जा सकते।


सात और 12 वर्ष की आयु के बीच के नाबालिग भी अपराध के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराए जा सकते, बशर्ते उनमें उतनी परिपक्वता विकसित नहीं हो गई हो। पर परिणाम की दृष्टि से देखें तो यह निष्प्रभावी ही है, क्योंकि 18 साल से कम आयु के अपराधियों के लिए गंभीर अपराधों में भी अधिकतम सजा बहुत कम है। तीसरा तरीका है जुवेनाइल कोर्ट को अपराध की प्रकृति और उसके नतीजे को ध्यान में रखकर मामले को सामान्य अदालत को सौंपने का विवेकाधिकार देना।

 मसलन, इंग्लैंड में आपराधिक जिम्मेदारी की उम्र 10 साल से शुरू होती है और जुवेनाइल कोर्ट 18 साल तक की उम्र के नाबालिग अपराधियों के मामले लेती है। लेकिन हत्या जैसे जघन्य अपराध के मामले में नाबालिग अपराधियों पर वयस्कों की तरह सामान्य अदालत में मुकदमा चलाया जाता है। कनाडा में भी 14 से 17 साल की उम्र के नाबालिग अपराधियों पर कुछ परिस्थितियों में वयस्कों की तरह मुकदमा चलाया जाता है। अमेरिका के अधिकतर राज्यों में बाल न्यायालय कुछ मानदंडों के आधार पर मामले सामान्य अदालत में हस्तांतरित कर सकते हैं। इस व्यवस्था को ज्युडिशियल वेवर कहते हैं। ऐसे ढेरों उदाहरण दिए जा सकते हैं जब तक कि इस तथ्य में कोई संदेह नहीं रह जाए कि नाबालिग अपराधों के लिए हमारे कानूनों में सुधार की सख्त जरूरत है और सवाल सिर्फ आयु सीमा घटाने भर का नहीं है।

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