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Friday, November 9, 2012

कविता- बच्चे


बच्चे
देश का भविष्य हैं
वे साईकिल दौड़ाते
अखबार बांट रहे हैं।

वे घरों में झाडू लगा रहे हैं
कूड़ा कचरा उठा रहे हैं
कपड़े धो रहे हैं

बच्चों के शोरगुल में
देश का भविष्य चहकता है
वे मैले फटे थैले में
पालिश की डिब्बी बु्रश लिए
चौड़ी सड़कों के फुटपाथों पर
भटक रहे हैं।

वे टेम्पुओं के पायदानों पर खड़े
चिल्ला चिल्ला कर
सवारियां बुला रहे हैं।

बच्चों की हँसी में
देश का भविष्य हँसता है।
वे ढाबों में लपक लपक
रोटी तरकारी परोस रहे हैं

courtesy- http://primarykamaster.blogspot.in

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