Tuesday, March 27, 2012

गरीबी नापने के लिए नया फार्मूला बनेगा

शुक्रवार, 23 मार्च, 2012 को 18:25 IST तक के समाचार


"केवल कैलोरी से व्यक्ति कि गरीबी नहीं तय की जा सकती. किसी व्यक्ति के पास कपड़े नहीं है, घर नहीं है लेकिन लंगर में खाना खा रहा और उसे कैलौरी मिल रही है. लेकिन भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक उसे गरीब नहीं माना जाएगा. ये पैमाना नाकाफी है. व्यक्ति की शिक्षा, शिक्षा की संभावना, उसका वस्त्र, उसका रहन-सहन, मकान इत्यादि का भी गणित करना चाहिए"

भरत झुनझुनवाला, अर्थशास्त्री




केंद्र सरकार ने गरीबी रेखा के फॉर्मूले पर फिर से विचार करने की घोषणा की है. सरकार ने कहा है कि वो एक विशेषज्ञ समूह का गठन करेगी जो देश में गरीबी आकलन के लिए पुराने तरीकों पर पुनर्विचार कर नए रास्ते सुझाएगा.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गुरुवार को कहा, "हमें गरीबी को मापने के लिए एक बहुआयामी तरीका अपनाना होगा. तेंदुलकर कमिटी की रिपोर्ट में में सभी कारक सम्मिलित नहीं है और वो संतोषजनक नहीं है.


योजना आयोग की ओर से गरीबी की नई परिभाषा दिए जाने के बाद जो हंगामा हुआ है, उसके बाद सरकार ने ये घोषणा की है.

इस परिभाषा में कहा गया था कि शहरों में 28 रुपए 65 पैसे प्रतिदिन और गांवों में 22 रुपये 42 पैसे खर्च करने वाले को गरीब नहीं कहा जा सकता.

इसके बाद संसद के दोनों सदनों में हंगामा हुआ था और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया को हटाए जाने की मांग तक की गई थी.

सच्चाइयों से जुड़ी हो

योजना राज्य मंत्री अश्विनी कुमार ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, "हमारा मानना है कि गरीबी रेखा मापने की प्रणाली पर पुनर्विचार की जरूरत है. सरकार ने गरीबी को मापने के तरीकों पर विचार करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाने का फैसला लिया है जो ऐसे तरीके ढूंढेगा जो देश में गरीबों से जुड़ी मौजूदा सच्चाइयों से जुड़ी हो."


सोमवार को योजना आयोग की ओर से जारी रिपोर्ट के मुताबिक 2004-05 से लेकर 2009-10 के दौरान देश में गरीबी सात फीसदी घटी है और गरीबी रेखा 32 रुपये प्रतिदिन से घटकर 28 रुपए 65 पैसे प्रतिदिन बताई गई थी.

अब शहर में 28 रुपए 65 पैसे प्रतिदिन और गांवों में 22 रुपये 42 पैसे खर्च करने वाले को गरीब नहीं कहा जा सकता. इसका मतलब है कि शहरों में महीने में 859 रुपए 60 पैसे और ग्रामीण क्षेत्रों में 672 रुपए 80 पैसे से अधिक खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है.

विश्लेषकों का कहना है कि योजना आयोग की ओर से निर्धारित किए गए ये आंकड़े भ्रामक हैं और ऐसा लगता है कि आयोग का मक़सद ग़रीबों की संख्या को घटाना है ताकि कम लोगों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का फ़ायदा देना पड़े.

कैलोरी से जोड़ना नाकाफी

भारत में ग़रीबों की संख्या पर विभिन्न अनुमान हैं. आधिकारिक आंकड़ों की मानें, तो भारत की 37 प्रतिशत आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे है. जबकि योजना आयोग के ही एक और दस्तावेज़ के मुताबिक़ ये आंकड़ा 77 प्रतिशत हो सकता है.

अभी तक जो व्यवस्था चली आ रही है उसमें व्यक्ति को दिन भर में कितनी कैलोरी उर्जा भोजन से मिलती है उसके आधार पर तय करते हैं कि व्यक्ति गरीब है या नहीं.

अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला का कहना है कि गरीबी रेखा तय करने के लिए ये पैमाना नाकाफी है कि कि कोई व्यक्ति रोजाना कितनी कैलोरी का भोजन कर रहा है.

उनका कहना है, "केवल कैलोरी से व्यक्ति कि गरीबी नहीं तय की जा सकती. किसी व्यक्ति के पास कपड़े नहीं है, घर नहीं है लेकिन लंगर में खाना खा रहा और उसे कैलौरी मिल रही है. लेकिन भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक उसे गरीब नहीं माना जाएगा. ये पैमाना नाकाफी है. व्यक्ति की शिक्षा, शिक्षा की संभावना, उसका वस्त्र, उसका रहन-सहन, मकान इत्यादि का भी गणित करना चाहिए."

अभी सरकार ने नए फार्मूले के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की है.


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